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Sister Nivedita Death Anniversary: क्या किया था इस आयरिश महिला ने भारत के लिए

सिस्टर निवेदिता (Sister Nivedita) ने भारत में शिक्षा, पीड़ितों की सेवा के साथ लोगों में आजादी की जागरुकता पैदा करने का काम किया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

सिस्टर निवेदिता (Sister Nivedita) ने भारत में शिक्षा, पीड़ितों की सेवा के साथ लोगों में आजादी की जागरुकता पैदा करने का काम किया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Freedom Movement of India) के दौरान बहुत से विदेशी खास तौर पर अंग्रेज भारत आए और भारत की आजादी के साथ समाज सुधार तक में योगदान दिया.

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    भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Freedom Movement of India) के दौरान बहुत से विदेशी खास तौर पर अंग्रेज भारत आए और भारत की आजादी के साथ समाज सुधार तक में योगदान दिया. इनमें एक प्रमुख नाम है सिस्टर निवेदिता का. आयरिश मूल की सिस्टर निवेदिता (Sister Nivedita) स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) की शिष्या थीं, लेकिन उन्होंने भी भारत के लिए बहुत से ऐसे कार्य किए हैं जो आज भी याद किए जाते हैं. उन्होंने भारत और हिंदू धर्म के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था. 13 अक्टूबर को देश उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहा है. केवल 43 साल की उम्र उन्होंने देशसेवा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे.

    बचपन से ही सेवा भाव
    सिस्टर निवेदिता का नाम मार्ग्रेट एलिजाबेथ नोबेल था. उनका जन्म 28 अक्टूबर 1867 को उत्तरी आयरलैंड के टायरोन काउंटी के डुंगानोन शहर में हुआ था. अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी मार्गरेट को बचपन से ही सेवाभाव का माहौल मिला. अपनी युवावस्था में वे शिक्षिका रहीं और मानवसेवा में काफी समय बिताया करती थीं.

    स्वामी जी से पहली भेंट
    बचपन में ईसाई धर्म के प्रति निष्ठा रखने वाली मार्गरेट का मन युवावस्था में उचटने लगा  और वे काफी बेचैन रहने लगीं थी और सत्य की खोज में परेशान भी रहा करती थीं. 1895 में जब स्वामी विवेकानंद शिकागो धर्म संसद से लौटते समय लंदन में रुके थे, तब मार्गरेट को स्वामी जी को वेदांत दर्शन के विषय पर सुनने का मौका मिला जिसके  बाद कई वक्तव्य सुनने और स्वामी जी से अपने सभी सवालों के जवाब मिलने पर उनमें आस्था और श्रद्धा जागृत हो गई.

    कन्या विद्यालय की स्थापना
    1898 में स्वामी जी ने मार्गरेट को भारत बुला लिया और वे कोलकता आ गईं जहां उन्होंने ब्रह्मचारिणी की व्रत लिया. इसी मौके पर  स्वामी विवेकानंद ने मार्गरेट को सिस्टर निवेदिता नाम दिया. उन्होंने स्वामी जी के एक उद्देश्य महिला शिक्षा का बीड़ा उठाया. और कोलकाता में कन्या शिक्षा के लिए एक स्कूल की स्थापना भी की.

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    स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) नहीं ही सिस्टर निवेदिता नाम दिया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    प्लेग के सेवा कर्मियों की सहायता
    1899 में जब कोलकाता में प्लेग फैला तो सिस्टर निवेदिता ने जन सेवा का फैसला लेते हुए दूसरों को भी सेवा के लिए प्रेरित किया. अंग्रेजी अखबारों में लोगों से सहायता की अपील, वे कोलकाता में पीड़ितों की सेवा करने वालों की मददगार बनी रहीं और रबींद्रनाथ टैगोर, जगदीशचंद्र बोस, अबला बोस, अबनींद्रनाथ टैगोर आदि की भी सहायता की.

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    भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
    भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनका योगदान रहा, उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाकर लोगों में भारतीय संस्कृति, इतिहास और विज्ञान से परिचित कर जागृत करने का प्रयास किया. इसमें उनके लेखों ने बहुत कारगर कार्य किया. श्री अरबिंदो की भी उन्होंने बहुत सहयता की. इसके अलावा बंगाल में सक्रिय रही अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों की उन्होंने सहायता की थी.

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    सिस्टर निवेदिता (Sister Nivedita) ने 1904 में भारत का एक झंडा भी बनाया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    भारत का झंडा भी बनाया
    उन्होंने अरविदो घोष से लेकर ऐनी बेसेंट सभी की सहायता की और अपने लेखन से लोगों के मन में आजादी की आग जलाने का प्रयास किया. बंगाल में कलाकारों को कला विद्यालय खोलने के लिए प्रेरित किया. 1904 में उन्होंने भारत का झंडा तक बनाया जिसमें इंद्र का वज्र बना था. उन्हें बंग भंग करने वाले लॉर्ड कर्जन का भी विरोध किया और उस समय के आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया.

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    साल 1911 को केवल 43 साल की उम्र में दार्जलिंग में सिस्टर निवेदिता ने अंतिम सांस ली. दार्जलिंग के रेलवे स्टेशन के नीचे विक्टोरिया फॉल्स के रास्ते पर उनके स्मारक पर लिखा है, “यहां सिस्टर निवेदिता लेटी हैं, जिन्होंने अपना सब कुछ भारत को दे दिया.”

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