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चीनियों ने सांप के तेल से किया था 100 साल पहले फैले फ्लू के इलाज का दावा, गईं करोड़ों जानें

बोतलों में बंद इस तेल के बारे में उनका कहना था कि चीन के समुद्र में मिलने वाले सांपों का तेल है

बोतलों में बंद इस तेल के बारे में उनका कहना था कि चीन के समुद्र में मिलने वाले सांपों का तेल है

साल 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू (Spanish flu) के दौरान इलाज के अजीबोगरीब तरीके निकलने लगे. इनमें से एक था सांप के तेल (s ...अधिक पढ़ें

    कोरोना संक्रमण रोकने के लिए दवा या टीके की तलाश में वैज्ञानिक लगे हुए हैं. दूसरी ओर एक बड़ा तबका घरेलू उपचार खोज रहा था. किसी का कहना है कि काढ़ा पीने से कोरोना वायरस का हमला रोका जा सकता है तो कुछ लोग जंगली जड़ी-बूटियों में इसका इलाज बता रहे हैं. हालांकि ऐसा कोई भी उपचार अब तक कारगर नहीं हुआ है. महामारियों के दौर में इलाज के ऐसे झूठे दावे आम हैं. जैसे स्पेनिश फ्लू के दौरान सांप का तेल फ्लू के मरीज को ठीक कर देता था.

    इस तरह से हुई शुरुआत
    18वीं सदी के मध्य में जब चीनी व्यापारी दूर देशों में जाने लगे तो व्यापार के दूसरे सामानों के साथ वे एक खास तेल भी ले जाया करते थे. बोतलों में बंद इस तेल के बारे में उनका कहना था कि चीन के समुद्र में मिलने वाले सांपों का तेल है. वे इसके अनोखे गुणों के बारे में बखानते हुए अपने दूसरे उत्पादों के साथ तेल भी बेच दिया करते थे. चूंकि सांप का तेल ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होता है इसलिए कई चीजों खासकर जोड़ों के दर्द में ये काफी कारगर हुआ करता था. लेकिन जल्दी ही अमेरिकी कंपनियों ने भी इसका वर्जन निकाल लिया, जिसमें ऑइल होने का झूठा दावा किया जाता था.

    बीमारी ठीक करने के लिए ऐसे कई घरेलू या हर्बल या यूनानी-ईरानी तरीके उस दौर में भी थे


    अमेरिकी भी बनाने लगे नकली तेल
    स्पेनिश फ्लू से ठीक पहले साल 1917 में जब अमेरिकी की एक तेल बनाने वाली कंपनी Clark Stanley’s Snake Oil Liniment की जांच हुई तो पाया गया कि उसमें न तो सांप का तेल था और न ही कोई औषधीय गुण. लेकिन इसके बाद भी फ्लू के दौरान इसी तरह की कई कंपनियों ने सांप के तेल से फ्लू खत्म करने जैसे दावों के साथ तेल बेचना जारी रखा. यहां तक कि अखबारों में भी इसके विज्ञापन होते. जैसे Scioto Gazette में एक खास ब्रांड Miller’s Antiseptic Oil का विज्ञापन आया, जो फ्लू का संक्रमण रोकने या फिर उसे क्योर करने का भी दावा करता था. उसपर लिखा होता था- “Don’t fail to have a bottle on hand when the attack comes on”. नतीजा, इसकी बिक्री काफी बढ़ गई लेकिन ये सरासर झूठा दावा था.

    कई तरीके साबित हुए और भी घातक
    बीमारी ठीक करने के लिए ऐसे कई घरेलू या हर्बल या यूनानी-ईरानी तरीके उस दौर में भी थे. जैसे इलाज का एक तरीका कहता था कि गर्म पानी में नमक मिलाकर उसे अपने हाथ-पैर के जोड़ पर मलें. ऐसा तब तक करें, जब तक कि फ्लू से संक्रमित खून जोड़ों पर इकट्ठा न हो जाए. इसके बाद सिरिंज लगाकर उस गंदे या संक्रमित खून को बाहर फेंकते जाएं. ऐसा रोज करें और कुछ ही दिनों में फ्लू चला जाएगा. बहुतों ने ऐसा किया और फ्लू ठीक भले न हुआ लेकिन वे मारे गए. ये भी एक चीनी इलाज पद्धति थी. उस दौरान U.S. Surgeon General Rupert Blue ने खूब कहा कि ऐसा कोई इलाज किसी को ठीक नहीं कर सकता, बल्कि इंजेक्शन की वजह से हुए संक्रमण या खून की कमी से मौत हो सकती है लेकिन किसी ने नहीं सुनी और इलाज के फेर में लोग मरते रहे.

    साल 1918 में सबसे पहले मार्च के दूसरे हफ्ते में बीमारी का पहला मरीज सामने आया था


    अखबारों में आते थे इलाज के तरीके
    मोंटाना के एक अखबार Great Falls Tribune में एक लाइट के बारे में बताया गया कि उससे फ्लू के मरीज ठीक हो जाते हैं. ये विज्ञापन की तरह नहीं, बल्कि संपादकीय पेज पर छपा था कि कैसे एक स्वीडिश डॉक्टर ने अपने मरीजों को इसी लाइट के जरिए ठीक कर लिया. इसके बाद से डॉक्टरों के क्लिनिक में मरीज लाइट जलाकर इलाज के लिए कहने लगे. हालांकि इलाज का ये तरीका भी अवैज्ञानिक और झूठा निकला. आयोडीन और कुनैन के घोल को पीने से भी फ्लू के वायरस मर जाते हैं- कई देशों में ये दावे भी आए. कई बड़े अखबारों में जैसे अमेरिकी दैनिक The Ardmoreite में भी इसके विज्ञापन आते थे, जिसमें फ्लू को मारने का दावा होता था.

    क्या थी स्पेनिश फ्लू बीमारी
    साल 1918 में सबसे पहले मार्च के दूसरे हफ्ते में बीमारी का पहला मरीज सामने आया था. Albert Gitchell नाम का ये मरीज यूएम आर्मी में रसोइये का काम करता था. 104 डिग्री बुखार के साथ उसे कंसास के अस्पताल में भर्ती कराया गया. जल्द ही ये बुखार सेना के 54 हजार टुकड़ियों में फैल गया. मार्च के आखिर तक हजारों सैनिक अस्पताल पहुंच गए और 38 सैनिकों की गंभीर न्यूमोनिया से मौत हो गई.

    फेफड़ों के इस संक्रमण (lung infection) से पूरी दुनिया में 50 करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए


    बीमारी सैनिकों में पहले विश्व युद्द के दौरान खंदकों, कैंपों में खराब हालातों में रहने की वजह से आई थी. लड़ाई तो 1918 के अंत तक खत्म हो गई लेकिन लगभग 4 सालों तक साफ-सफाई न मिलने और ठीक खाना न मिलने के कारण स्पेनिश फ्लू पनपा. माना जाता है कि फ्रांस के सीमावर्ती खंदकों में भयंकर गंदगी के कारण वायरस सैनिकों के फेफड़ों तक पहुंचा. लड़ाई के बाद घर लौटे सैनिक अपने साथ ये बीमारी लेकर लौटे. मई तक इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और इटली के सैनिक और आम लोग भी स्पेनिश फ्लू का शिकार हो चुके थे.

    डॉक्टर तब फ्लू को बैक्टीरिया जन्य मानते थे
    तब उस दौर के टॉप डॉक्टरों का मानना था कि ये बीमारी Pfeiffer’s bacillus नामक बैक्टीरिया से फैलती है, जबकि असल में ये बीमारी Influenza A virus subtype H1N1 नामक वायरस से फैलती है जो इंफ्लुएंजा वायरस की एक श्रेणी है. बैक्टीरिया जन्य बीमारी मानते हु्ए वैज्ञानिकों ने इलाज में करोड़ों रुपए बहाए लेकिन चूंकि बीमारी वायरसजन्य थी इसलिए इसका इलाज नहीं हो सका. फेफड़ों के इस संक्रमण (lung infection) से पूरी दुनिया में 50 करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए और लगभग 5 करोड़ लोग मारे गए.

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    Tags: Corona, Corona positive, Corona Suspect, Coronavirus, Coronavirus in India, Coronavirus Update, Coronavirus vaccine

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