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क्या कुछ आदिवासी इलाकों में महिषासुर को माना जाता है पूर्वज, कुलगुरु और हीरो

महिषासुर का मर्दन करते हुए शेर पर बैठी हुई मां दुर्गा. (विकी कामंस)

महिषासुर का मर्दन करते हुए शेर पर बैठी हुई मां दुर्गा. (विकी कामंस)

नवरात्रि के दौरान देशभर में जो पूजा पंडाल सजते हैं. उसमें मां दुर्गा की प्रतिमा के पैरों के नीचे जिस राक्षस को संहार कर ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

05 राज्यों में आदिवासी जनजातियां करती हैं महिषासुर की पूजा और उसे मानती हैं वंशज
कई राज्यों में अब भी रहती हैं असुर नाम की जनजातियां, जिनकी नजर में महिषासुर हीरो
जनजातियां महिषासुर वध को आर्यों और अनार्यों के बीच हुई लड़ाई से जोड़ती हैं

नवरात्र के आने के साथ ही जब पूजा पंडाल सज जाते हैं और दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होने लगती है तो बंगाल से लेकर देश में सजे तमाम पंडालों में देवी दुर्गा को जिस राक्षस का वध करते हुए प्रतिमा बनाई जाती है, उसे महिषासुर कहा जाता है. देवी दुर्गा ने जिसका वध किया था. महिषासुर के बारे में कहा जाता है कि वह दानवों का राजा था. असीमित शक्तियों के बूते वह तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा था. महिषासुर को लेकर अक्सर विवाद भी होते रहते हैं. वैसे हकीकत ये भी है कि देश के कई राज्यों के आदिवासी और जनजाति के लोग उसकी पूजा करते हैं, उसे अपना पूर्वज मानते हैं.

सबसे पहले भारतीय माइथालॉजी में महिषासुर वध की जो कहानी प्रचलित है, उसके बारे में बताते हैं. फिर देश के कई राज्यों में जनजातियों और आदिवासियों का उससे क्या कनेक्शन है, उसके बारे में बताएंगे.

हिंदू माइथोलॉजी के मुताबिक महिषासुर एक असुर था. उसका पिता असुरों का राजा रंभ था. रंभ को एक महिषी (भैंस) से प्रेम हो गया. महिषासुर इन्हीं दोनों की संतान था. इंसान और भैंस के समागम से पैदा होने की वजह से महिषासुर जब चाहे मनुष्य और जब चाहे भैंस का रूप धारण कर सकता था. यही नहीं बेन थेरेसा की किताब एनसाइक्लोपीडिया ऑफ डेमोंस इन वर्ल्ड रिलीजंस एंड कल्चर कहती है कि महिषासुर एक दो नहीं बल्कि लाखों रूप बदल सकता था. हालांकि वह काफी सुस्त था.

तब दुर्गा ने जन्म लिया
महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की. ब्रह्मा ने उसे वरदान मांगने को कहा. महिषासुर ने वरदान मांगा कि कोई भी पुरुष उसे मार नहीं सके और ना ही उस पर विजय हासिल कर पाए-चाहे वो मानव हो या फिर देवता या राक्षस. वरदान मिलते ही महिषासुर आततायी हो गया. वो उत्पात मचाने लगा. उसने इंद्रदेव पर विजय पाकर स्वर्ग पर कब्जा जमा लिया. ब्रह्मा विष्णु महेश समेत सभी देवतागण परेशान हो उठे. महिषासुर के संहार के लिए सभी देवताओं के तेज से मां दुर्गा का जन्म लिया.

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हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ गया तब त्रिमूर्ति देवताओं के तेज से उत्पन्न मां दुर्गा ने महिषासुर का ललकारा और युद्ध के बाद उसका वध कर दिया. (विकी कामंस)

वह महिषासुर का संहार करने निकलीं
मां दुर्गा को सभी देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए. भगवान शिव ने अपना त्रिशूल दिया. भगवान विष्णु ने अपना चक्र दिया. इंद्र ने अपना वज्र और घंटा दिया. इसी तरह से सभी देवताओं के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित मां दुर्गा शेर पर सवार होकर महिषासुर का संहार करने निकली.

महिषासुर का वध
महिषासुर और उसकी सेना के साथ देवी दुर्गा का भयंकर युद्ध हुआ. देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलवाई. महिषासुर के वध के कारण ही मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाईं.

मैसूर में तो दशहरा ही महिषासुर के वध के कारण
एक कहानी मैसूर में भी प्रचलित है. मैसूर में तो हर साल दशहरे में रावण दहन नहीं होता बल्कि चामुंडेश्वरी देवी असुर महिषासुर का वध करती हैं. वहां जो कहानी कही जाती है, वो ये है कि महिषासुर इस इलाके का राजा था. भगवान शिव से पुरुषों पर अजेय रहने का वरदान पाकर वह क्रूर हो गया. प्रजा को मारने और आतंकित करने लगा.

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मैसूर का तो नाम ही महिषासुर से जोड़ा जाता है. वो कभी इस नगरी का अत्याचारी राक्षस राजा था. बाद में उसको चामुंडा पर्वत पर दस दिनों के बाद मां दुर्गा ने मारा. अब भी मैसूर से 13 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बने चामुंडेश्वरी देवी के मंदिर के पास महिषासुर की बड़ी प्रतिमा भी लगी है. (विकी कामंस)

तब पीड़ित लोग भगवान शिव के पास पहुंचे. शिव ने मां पार्वती को दुर्गा का रूप लेकर राक्षस का संहार करने के लिए कहा. देवी और महिषासुर के बीच चामुंडा नाम की पहाड़ी पर 10 दिनों तक युद्ध चला. महिषासुर तमाम रूप भी बदलता रहा. आखिरकार दसवें दिन देवी ने उसे मार दिया. चूंकि ये युद्ध चामुंडा पहाड़ी पर हुआ, लिहाजा उस जगह दुर्गा को चामुंडेश्वरी देवी का नाम देते हुए एक भव्य मंदिर बनवाया गया. उन्हें मैसूर की कुलदेवी भी माना जाता है. दशहरा में मैसूर के महाराजा हाथियों के साथ देवी की यात्रा में शामिल होते हैं.

किन राज्यों में आदिवासी मानते हैं उसे पूर्वज
अब आइए देखते हैं कि किन राज्यों में जनजाति के लोग महिषासुर को महान राजा और अपना पूर्वज भी मानते हैं. इन राज्यों में बंगाल, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शामिल हैं. इन राज्यों में एक असुर जनजाति भी रहती है, जो महिषासुर को अपना पूर्वज मानती है.

हिंदू पुराणों में असुर शब्द का इस्तेमाल राक्षसों के लिए हुआ है. हालांकि कुछ मानवविज्ञानियों का मानना है कि प्रोटो आस्टेलॉयड ग्रुप से जुड़े जनजाति के लोग झारखंड और बंगाल के पश्चिमी हिस्सों में रहते हैं.

जहां रहते हैं असुर जनजाति के लोग
असुर नाम की जनजाति झारखंड के गुमला, लातेहार, लोहरदगा और पलामू में मिलती है तो उत्तरी बंगाल में अलीपुरदुआर जिले और आसपास मिलती है. असुर जनजाति के लोग मानते हैं कि वो हुदर दुर्गा के पूर्वज हैं – ये महिषासुर का संथाल नाम है.

बहुत से दलित और आदिवासी समुदाय के लोग मानते हैं कि ये उनके विश्वास और परंपराओं का हिस्सा है, ये लोग दुर्गा और महिषासुर की कहानी मानने से इनकार करते हैं.

असुर और संथाल करते हैं उसकी पूजा
असुर और संथाल रीतिरिवाजों में महिषासुर की पूजा होती है. मध्य प्रदेश की कोर्कु जनजाति भी उसकी पूजा करती है. संथाल जनजाति का लोकगीत भी महिषासुर को लेकर गाया जाता है. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में तो महिषासुर को लेकर एक बड़ी पूजा ही आयोजित की जाती है.

पश्चिम बंगाल के संथालों की नजर में तो महिषासुर की इमेज नायक के तौर पर है. वो लोग दुर्गा द्वारा उसको मारने का विरोध भी करते रहे हैं. बकौल उनके ये गलत तरीके से महिषासुर को दिखाया जाता है. वह राक्षस नहीं बल्कि आक्रमणकारी आर्यों के खिलाफ बहादुरी से लड़ने वाला हीरो था.
संथाल बंगाल से लेकर असम और ओडिशा तक दुर्गा पूजा की ही तरह महिषासुर के लिए एक जनपूजा का आय़ोजन करते रहे हैं.

शहादत दिवस
झारखंड के गुमला में असुर नाम की एक जनजाति रहती है. ये लोग महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं. झारखंड के सिंहभूम इलाके की कुछ जनजाति भी महिषासुर को अपना पूर्वज मानती है. इन इलाकों में नवरात्रों के दौरान महिषासुर का शहादत दिवस मनाया जाता है. बंगाल के काशीपुर इलाके में भी आदिवासी समुदाय के लोग महिषासुर के शहादत दिवस को धूमधाम से मनाते हैं.

कई जनजातियां महिषासुर को कुलगुरु मानती हैं
झारखंड की असुर जनजाति खुद को महिषासुर का वंशज मानते हुए उसे अपना कुलगुरु मानती है. झारखंड एक सोशल वर्कर ने कुछ समय पहले एक न्यूज एजेंसी आईएएनएस से कहा था कि फिलहाल तो झारखंड में महिषासुर की पूजा नहीं होती लेकिन उसे कुलगुरु जरूर माना जाता है.

कई इलाकों के आदिवासियों का ये भी कहना होता है कि देवी दुर्गा ने छल से महिषासुर का वध किया. महिषासुर उसके पूर्वज थे और देवताओं ने असुरों का नहीं बल्कि उनके पूर्वजों का संहार किया था.

शोक मनाने की भी परंपरा
कई जगहों पर महिषासुर को राजा भी माना जाता है. असुर जनजाति के लोग नवरात्रों के दौरान दस दिनों तक शोक मनाते हैं. इस दौरान किसी भी तरह के रीति रिवाज या परंपरा का पालन नहीं होता है. आदिवासी समुदाय के लोग बताते हैं कि उस रात विशेष एहतियात बरता जाता है, जिस रात महिषासुर का वध हुआ था.

इसे आर्यों और अनार्यों की लड़ाई से जोड़ते हैं
महिषासुर को आदिवासी या दलित बताने वाले समुदाय के मुताबिक ये आर्यों और अनार्यों के बीच की लड़ाई की कहानी है. इस कहानी के मुताबिक करीब 3 हजार साल पहले महिषासुर अनार्यों का राजा था. उस दौर में अनार्य भैंसों की पूजा करते थे. महिषासुर के पास असीमित शक्ति थी. उसने अपनी ताकत के बल पर कई आर्य राजाओं को शिकस्त दी थी. उत्तरी आर्यावर्त में महिषासुर की ख्याति थी.

उसी दौर में उत्तरी आर्यावर्त के एक हिस्से में एक रानी ने शासन संभाला. वो आर्य राजा जो महिषासुर से हार चुके थे, सबने मिलकर उस रानी से महिषासुर के खिलाफ युद्ध लड़ने की प्रार्थना की. रानी ने युद्ध के लिए विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से लैस शक्तिशाली सेना बनाई. जबकि महिषासुर के पास सेना कम पड़ गई. उसके पास सैनिकों की कमी हो गई थी.

उस रानी ने महिषासुर को त्रिशूल से छलनी किया
महिषासुर को लगता था कि वो एक रानी से नहीं हार सकता. फिर भी उसने रानी के पास बातचीत के लिए अपने दूत भेजे. रानी ने दूत को बिना बातचीत के वापस लौटा दिया. लेकिन महिषासुर बार-बार बातचीत का न्यौता देने के लिए अपने दूत भेजता रहा. तब तक रानी ने अपनी विशालकाय सेना के साथ महिषासुर पर आक्रमण कर दिया. महिषासुर के पास भी शक्तिशाली सेना थी. महिषासुर को लग रहा था कि वो जीत जाएगा. लेकिन रानी ने महिषासुर के सीने को अपने त्रिशूल से छलनी कर दिया. रानी के पालतू शेर ने महिषासुर को खत्म कर दिया.

Tags: Durga Pooja, Johar jharkhand, Scheduled Tribe, Tribes of India

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