'सूरमा' संदीप सिंह जिनकी हॉकी से पाक गोलकीपर को लूज़ मोशन लग गए

भारतीय हॉकी टीम के फ्लिकर सिंह यानि संदीप सिंह के जीवन पर एक फिल्म बनी है - सूरमा जिसका ट्रेलर रिलीज़ हुआ है. संदीप की कहानी अगर आपको नहीं पता तो फिल्म के रिलीज़ होने के बाद आप जान जाएंगे और यह भी जान जाएंगे कि कमबैक किसे कहते हैं.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 4:49 PM IST
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: June 14, 2018, 4:49 PM IST
2012 के लंदन ओलंपिक्स से पहले की बात है. एक वेबसाइट में काम करते हुए मुझे ओलंपिक्स खेलों में हिस्सा लेने वाले भारतीय खिलाड़ियों से मिलकर उनसे बात करने का मौका मिला. उनकी जिंदगी, उनके संघर्ष और ओलंपिक खेलों के लिए उनकी तैयारी, उनका उत्साह– बहुत कुछ होता था बात करने के लिए. क्योंकि ओलंपिक्स में क्रिकेट के अलावा बाकी सारे खेल होते हैं. इसलिए यह एक अच्छा मौका होता है उन खेलों और खिलाड़ियों पर ध्यान देने का जिनके बारे में अक्सर मीडिया तभी बात करती दिखती है जब वह कुछ बड़ा हासिल कर लेते हैं. ऐसे में अगर इन खेलों से जुड़े खिलाड़ियों के संघर्षों और जज़्बे को मंच मिल रहा है, तो बात करने के लिए कौन राज़ी नहीं होगा.

इसी कड़ी में मेरी मुलाकात बेंगलुरु में ट्रेनिंग कर रही हॉकी टीम के सदस्यों से हुई. उस वक्त टीम के कैप्टन भरत छेत्री थे जिनसे बातचीत के बाद सरदारा सिंह, पीआर श्रीजेश से भी बात हुई. लेकिन इस दौरान मेरी नज़र खिड़की से बाहर थी जहां संदीप उर्फ फ्लिकर सिंह अकेले खड़े थे. इस बात से शायद बेखबर कि दिल्ली मीडिया से कोई इतनी दूर उनकी टीम से मिलने और बात करने आया है.

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दरअसल भारत ने 8 साल के लंबे अंतराल के बाद 2012 ओलंपिक्स के लिए क्वॉलिफाई किया था. टीम ने ओलंपिक क्वालिफायर्स के फाइनल में फ्रांस को 8-1 से हराकर यह बाज़ी मारी थी. 8 में से पांच गोल संदीप सिंह की देन थे, उसमें भी एक हैट्रिक शामिल थी. सिंह ने उस ओलंपिक क्वालिफायर्स टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा कुल 16 गोल किए थे. तो समझिए कि आठ साल बाद ओलंपिक में खुद को साबित करने का यह मौका भारतीय हॉकी टीम को बहुत हद तक संदीप सिंह की बदौलत मिला था.



(संदीप सिंह पर बनी फिल्म सूरमा का ट्रेलर)

वैसे लंदन ओलंपिक्स, टीम के किसी भी खिलाड़ी से कहीं ज्यादा अहम संदीप सिंह के लिए था. इसके पीछे है संदीप की जिंदगी में मची वो उथल पुथल जिसने उन्हें एक लंबे वक्त के लिए उस खेल से दूर रखा जिसे वो खाते, पीते और जीते थे. संदीप के बड़े भाई विक्रमजीत सिंह भी हॉकी खिलाड़ी रहे हैं. 2003 में 17 साल की उम्र में संदीप, भारतीय हॉकी टीम में शामिल हुए. संदीप को हॉकी की दुनिया में फ्लिकर सिंह के नाम से जाना जाने लगा. उनकी ड्रैग फ्लिकिंग की चर्चा ज़ोरों पर थी. संदीप अब पीछे मुड़कर नहीं देखने वाले थे.
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लेकिन 2006 में विश्व कप के लिए जर्मनी जाने से दो दिन पहले संदीप के साथ कुछ ऐसा हुआ कि सब कुछ थम गया. संदीप कालका -शताब्दी से दिल्ली जा रहे थे, उनके पीछे एक आरपीएफ अधिकारी बैठे थे जिनके पास एक पिस्तौल थी. अधिकारी से ट्रिगर गलती से दब गया. गोली निकली और आगे की सीट पर बैठे संदीप के दाएं कूल्हे के पास लगी.

ऐसा लगा जैसे किसी ने लोहे की रॉड कमर में घुसा दी हो. अचानक पीछे से एक आदमी आता है, उसके हाथ में गन है और वो कहता है कि उससे गलती से गोली चल गई है. मेरी रीढ़ की हड्डी पर 9एमएम पिस्तौल से गोली लग गई थी और मेरा शरीर में उसी वक्त लकवा मार गया.
एक टेड टॉक में हादसे को याद करते हुए संदीप सिंह


sandeep singh, hockey player, soorma
संदीप सिंह की कप्तानी में 2009 में भारत नेअज़लन शाह कप 11 साल बाद जीता


2006 के बाद संदीप सिंह को जैसे सब कुछ शुरू से शुरू करना था. डॉक्टरों के यह कह देने के बाद कि आप खुशकिस्मत हैं कि इस तरह गोली लगने के बाद भी आप कम से कम व्हीलचेयर पर बैठ पा रहे हैं – संदीप ने खुद को दोबारा समेटा और अपने बड़े भाई के साथ मिलकर दोबारा खड़े होने की ठानी. जिस हॉकी से संदीप खेलते थे, उसका ही सहारा लेकर वह खड़े होते थे. वह गिरते पड़ते दोबारा खड़े हुए. और फिर एक दिन हॉकी फेडरेशन ने अपने खर्चे पर संदीप को रिहैब के लिए देश से बाहर भेजा. व्हीलचेयर पर गए संदीप लौटे अपने पैरों पर.

2008 में सुल्तान अज़लान शाह कप से संदीप ने वापसी की जिसमे उन्होंने 8 गोल किए. 2009 में उसी संदीप सिंह को भारतीय हॉकी टीम का कैप्टन बनाया गया जिसका करियर कल तक दुनिया को डूब गया लग रहा था. शायद इसे ही असली कमबैक कहते हैं, संदीप ने कप्तानी की जिम्मेदारी ऐसी संभाली की 2009 के अज़लन शाह कप के फाइनल में मलेशिया को हराकर 13 साल बाद ट्रॉफी भारतीय टीम के हाथ आ पाई.

2008 अज़लान शाह कप के सेमी फाइनल में हमारा मुकाबला पाकिस्तान के साथ था जिसे हमने 2-1 से जीता. दोनों गोल मेरे थे. आमतौर पर गोलकीपर पूरे मैच में एक ही होता है लेकिन उस मैच में हाफ टाइम के बाद पाकिस्तान के लोकप्रिय गोलकीपर सलमान अकबर की जगह दूसरा गोलकीपर आया. मैच खत्म होने के बाद पाकिस्तान के कोच ने मेरे पास आकर कहा, संदीप कैसी फ्लिक करने लगे हो कि हमारे गोलकीपर को लूज़ मोशन लग गए.
संदीप सिंह


sandeep singh, hockey player, soorma
2006 में संदीप सिंह एक हादसे का शिकार हुए जिसके बाद वह चल फिर नहीं पाते थे


इस सफलता के बाद संदीप का एक बड़ा लक्ष्य था 2012 लंदन ओलंपिक्स. दिल्ली में हुए ओलंपिक क्वालिफायर्स टूर्नामेंट के फायनल में फ्रांस को हराते हुए संदीप ने दनादन रिकॉर्ड बनाए. उन्होंने धनराज पिल्लै के 121 गोल के गोल के रिकॉर्ड को तोड़ा. 145 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ड्रैग फ्लिक किया और अंतरराष्ट्रीय मैच के फायनल में पांच गोल करने का रिकॉर्ड बनाया. इससे भी ख़ास बात यह थी कि यह सब कुछ उन्होंने 27 फरवरी यानी अपने जन्मदिन के मौके पर किया.

ओलंपिक क्वालिफायर्स टूर्नामेंट में जीत के बाद भारतीय हॉकी टीम को लेकर देश की उम्मीदें फिर जाग गई थी. बड़े ही उत्साह के साथ टीम लंदन में झंडे गाड़ने के लिए बेंगलुरु के ट्रेनिंग कैंप में तैयारियां कर रही थी. अन्य खेलों की तरह हॉकी टीम भी चाहती थी कि उन्हें लोगों का प्रोत्साहन मिले, उनके बारे में बात की जाए लेकिन जब मैंने संदीप सिंह से बात करनी चाही तो उन्होंने इनकार कर दिया.

बात करने के नाम पर संदीप सिंह ने कुछ बोला नहीं, सीधे न में गर्दन हिला दी. पहले तो मेरे अंह को थोड़ा धक्का सा लगा लेकिन फिर दिल्ली लौटने के बाद और अब उन पर बनी फिल्म ‘सूरमा’ का ट्रेलर देखते हुए महसूस हुआ कि शायद पागलपन इसे ही कहते हैं, जो संदीप सिंह के अंदर मुझे उस दिन दिखा था. जब आप अपनी सफलता के लिए किसी मीडिया या चमत्कार पर निर्भर नहीं होते.

उस वक्त संदीप के सिर पर सिर्फ ओलंपिक्स में जीतने का भूत सवार था. उन रिकॉर्ड्स का भूत जो वो दुर्घटना की वजह से बना नहीं पाए थे. अर्जुन और मछली की आंख वाला उदाहरण उस वक्त संदीप सिंह की आंखों में घूम रहा था. हां यह सच है कि लंदन में भारतीय टीम पांच के पांच मैच हारी और सेमी फाइनल में नहीं पहुंच पाई. लेकिन फिर संदीप सिंह की जिंदगी की चुनौतियों का क्या कोई ओलंपिक खेल मुकाबला कर सकता है.
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