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Explainer : अखाड़ों के पास कहां से आता है धन, कौन सा अखाड़ा कितना धनी

धार्मिक आयोजनों और कुंभ आदि के दौरान अखाड़ा का जुलूस और प्रदर्शन काफी वैभवपूर्ण होता है (फोटो शटरस्टॉक)

धार्मिक आयोजनों और कुंभ आदि के दौरान अखाड़ा का जुलूस और प्रदर्शन काफी वैभवपूर्ण होता है (फोटो शटरस्टॉक)

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और निरंजनी अखाड़े के प्रमुख महंत नरेंद्र गिरि की मृत्यु के बाद अखाड़ों की संपत्ति और उनसे जुड़े विवाद भी चर्चा में हैं. जानते हैं कि इन अखाड़ों के पास कहां से आता है धन और इनके खर्च किस तरह के होते हैं.

  • News18Hindi
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    उत्तर से लेकर दक्षिण तक भारतीय मंदिरों, अखाड़ों और मठों के पास अकूत धन की जानकारियां मिलती रहती हैं. धर्म से जुड़ी इन जगहों पर अगर मोटे चढ़ावे से प्रचुर धन आता है तो इनके पास चल अचल संपत्तियां भी कम नहीं. महंत नरेंद्र गिरी जिस बाघंबरी मठ और निरंजनी अखाड़े के प्रमुख थे, उसके पास अकूत धन के अलावा देश-विदेश में खासी संपत्ति बताई जाती है.

    ये बड़ा सवाल है कि देश में धार्मिक अखाड़ों के पास कहां से इतना पैसा और संपत्ति आती है. क्या इन्हें मिला हुआ पैसा आयकर के दायरे में होता है. आयकर कानून इन पर किस तरह से लागू होते हैं. क्या आपको मालूम है कि अक्सर आयकर विभाग अखाड़ों और तमाम धार्मिक संस्थाओं को नोटिस भी देता रहा है.

    देश के बड़े मंदिरों में धन के आने की बात तो पता चलती है. यहां हजारों श्रृद्धालु रोज आते हैं. कई बड़े मंदिर तो ऐसे हैं जिनके पास एक महीने में दान दक्षिणा के जरिए करोड़ों रुपए आते हैं. लेकिन अखाड़ों में धन कैसे आता है.

    दरअसल कई ऐसे अखाड़े हैं जो मंदिरों का संचालन करते हैं. साथ ही अखाड़ों को सीधे भी भक्तों के जरिए जमीन से लेकर धन और मकान तक दान में दिये जाते रहे हैं. देश में 13 अखाड़ों को धार्मिक तौर पर मान्यता प्राप्त अखाड़े माना जाता है. इनकी स्थापना सैकड़ों सालों पहले शंकराचार्य ने खुद की थी. तब से वो चले आ रहे हैं. कुंभ और बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान राज्य सरकारें भी उन्हें आर्थिक तौर पर मदद देती हैं.

    अखाड़ों को कैसे मिलती है धन और संपत्ति
    – अखाड़ों द्वारा संचालित मंदिरों के जरिए
    – भक्तों के दान और चढ़ावा से
    – अखाड़ों द्वारा संचालित स्कूलों और गौशालाओं से
    – चंदों से
    – संपत्ति के जरिए आने वाले किराए से
    – एक जमाने में राजा-महाराजा और बड़े सेठ अखाड़ों को मोटा दान करते थे और जमीनें देते थे

    निरंजनी अखाड़े को सभी अखाड़ों में सबसे धनी बताया जाता है. उसके पास काफी संपत्ति है.

    किस तरह के होते हैं अखाड़ों के खर्च
    – बड़े धार्मिक आयोजन
    – धार्मिक उत्सवों मसलन कुंभ आदि में बड़े बड़े पंडाल
    – रथ, घोड़े और पालकी पर सवारी
    – अखाड़ों की संपत्ति के रखरखाव
    – अखाड़ों के कर्मचारियों का खर्च
    – अखाड़ों के संतों का देश-विदेश में आवाजाही

    निरंजनी अखाड़े के पास कितनी संपत्ति
    प्रयागराज और आसपास के इलाकों में निरंजनी अखाड़े के मठ, मंदिर और जमीन की कीमत 300 करोड़ से ज्यादा की है, जबकि हरिद्वार और दूसरे राज्यों में संपत्ति की कीमत जोड़े तो वो हजार करोड़ के पार है. महंत नरेंद्र गिरि इसी अखाड़े के प्रमुख थे. निरंजनी के अखाड़े के पास प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, मिर्जापुर, माउंटआबू, जयपुर, वाराणसी, नोएडा, वड़ोदरा में मठ और आश्रम हैं.

    दूसरे अखाड़ों के पास कितनी संपत्ति
    निर्वाणी अखाड़ा-इसके साधु बहुत ही धनी हैं. फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, प्रतापगढ़ में इनकी काफी भूमि है. फैजाबाद में इनके अधीन कुछ गांव भी थे.
    निर्मोही – निर्माहियों के पास काफी भूमि, बस्ती, मानकपुर, खुर्दाबाद आदि स्थानों पर है.
    खाकी – शुजाउद्दौला के समय में नवाब से चार बीघा भूमि प्राप्त कर इस अखाड़े की नींव डाली गई थी. बस्ती में इनकी भूमि है.
    निरावलम्बी -इनकी सम्पत्ति थोड़ी सी है. निरावलम्बी का अर्थ आलम्बनहीन है.

    अगर कानून की बात करें तो धार्मिक अखाड़े भी उसके दायरे में आते हैं. उन्हें सोसायटी एक्ट में रजिस्टर्ड होना होता है और वो इनकम टैक्स कानून के दायरे में भी आते हैं.

    किस तरह होते हैं कानून के दायरे में
    अखाड़ों का सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन कराना होता है. सभी अखाड़े इस एक्ट के तहत आते हैं. आयकर अधिनियम के 12ए नियम के तहत दानदाताओं को इनकम टैक्स से छूट मिलती है.
    अखाडो़ं और सभी धार्मिक संस्थाओं को अपने दान और खर्चों का खाता बनाकर इसे पेश करना होता है. हर साल इनकम डिपार्टमेंट को अपनी आय-व्यय का ब्योरा भेजना होता है.

    क्या इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से इन्हें नोटिस भी मिलती है
    प्रयाग कुंभ के बाद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 13 अखाडो़ं को नोटिस दिया था. इसमें महंत नरेंद्र गिरि को भेजी गई नोटिस भी शामिल है. आयकर अधिनियम के तहत जो संस्थाएं आमदनी प्राप्त कर रही हैं, उन्हें अपनी आय का 85 प्रतिशत चैरिटी के लिए हर हाल में खर्च करना होगा. शेष 15 प्रतिशत आय अगले वर्ष खर्च की जा सकती हैं.

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