इस देश में बच्चों पर है पढ़ाई का सबसे ज्यादा बोझ

कोरिया में पढ़ाई का बोझ इतना ज्यादा है कि हर स्टूडेंट को स्कूल और फिर ट्यूशन मिलाकर 16 घंटे का समय देना होता है. यहां स्कूलों में बच्चों की पिटाई का भी रिवाज है.

News18Hindi
Updated: May 15, 2019, 2:41 PM IST
इस देश में बच्चों पर है पढ़ाई का सबसे ज्यादा बोझ
दक्षिण कोरिया के स्कूलों में बच्चों पर पढाई का सबसे ज्यादा दबाव होता है
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Updated: May 15, 2019, 2:41 PM IST
दुनिया भर में बच्चों के लिए दक्षिण कोरिया के स्कूल सबसे ज्यादा अमानवीय होकर उभर रहे हैं. यहां का खासा दबाव भरा स्कूलिंग सिस्टम पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में है. बेहतर करियर और अच्छे कॉलेज में दाखिले के दबाव के चलते बच्चों को 16 घंटे तक पढ़ाई करनी होती है. ना उनके पास खेलने का समय है और ना ही दोस्तों के लिए. स्कूल और कोचिंग की पढ़ाई के बाद बच्चे अक्सर आधी रात तक घर पहुंचते हैं.

दरअसल दक्षिण कोरियाई समाज में शिक्षा को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है. इस देश में बहुत ज्यादा प्राकृतिक संसाधन नहीं होने से सबसे ज्यादा जोर मानव विकास पर होता है यानी किस तरह करियर को ऊंचाइयों पर पहुंचाया जा सके.


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वहां के स्कूलों का माहौल अलग है.  अच्छे रिजल्ट के लिए लंबे स्कूली समय के बाद कोचिंग में समय देना होता है. यानी कुल मिलाकर कोई भी बच्चा 14-16 घंटे पढ़ाई में देता है. अक्सर बच्चे नींद भी पूरी नहीं कर पाते. ना ही अभिभावकों और दोस्तों को समय दे पाते हैं.

कितना समय देना होता है स्कूलों में
दक्षिण कोरिया में हाईस्कूल के छात्रों को औसतन 16 घंटे का समय देना होता है. वो सुबह 8 बजे स्कूल पहुंचते हैं. फिर रात 09.30 या 10.00 बजे तक वापस लौटते हैं. पहले स्कूल की पढाई. फिर कई प्राइवेट ट्यूशन. पहले तो प्राइवेट ट्यूशन देने वाली कोचिंग क्लासेज आधी रात तक चलती थीं. पिछले दिनों सरकार ने कड़ाई कर इनका समय रात 10.00 बजे तक तय कर दिया.

ये इसलिए होता है ताकि आगे की पढ़ाई के लिए उम्दा कॉलेज मिल सके. जिनके लिए कंप्टीशन का स्तर बहुत ऊंचा है.
कोरिया का एक स्कूल


हागवान की शरण लेते हैं छात्र
केवल औसत या संघर्ष कर रहे स्टूडेंट ही प्राइवेट ट्यूशन की शरण नहीं लेते बल्कि बेहतर छात्र भी ऐसा करते हैं ताकि खुद को बेस्ट बना सकें. इन प्राइवेट ट्यूशन को कोरिया में हागवान कहते हैं, इनमें हर सब्जेक्ट्स के ट्यूशन दिए जाते हैं. म्यूजिक और डांस के भी.

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आमतौर पर हागवान में अंग्रेजी और मैथ के ट्यूशन ज्यादा लिए जाते हैं, लेकिन कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए भी यहां स्टूडेंट्स तैयारी करते हैं. इसके चलते वो एक क्लास से दूसरी क्लास के लिए भागते रहते हैं. इसी के बीच दोस्तों से बातचीत करने या नए दोस्त बनाने का समय नहीं मिल पाता है.

इन सबसे के चलते औसत किशोर छात्र आधी रात तक घर नहीं पहुंच पाते. वास्तव में उनका डिनर और लंच स्कूल या फिर प्राइवेट ट्यूशन के दौरान ही होता है ना कि पेरेंट्स के साथ.

दक्षिण कोरिया में आमतौर पर बच्चों पर पढाई का दबाव सबसे ज्यादा होता है


कुछ दिन पहले जर्मनी के डायचे वैले ने इसे लेकर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की. जिसमें किम यून नाम की एक छात्रा कहती है कि जिस छात्र के अच्छे नंबर नहीं आते या फिर उसे अच्छे स्कूल या कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता, उसे हिकारत की नजरों से देखा जाता है.

छुट्टियों में भी यही बोझ
अगर आप सोच रहे हों कि कोरियाई छात्र हफ्ते भर की मेहनत के बाद दो दिन के सप्ताहांत में रिलैक्स होते होंगे. इसमें खेल कूद या मस्ती करते होंगे तो आप गलत हैं. आमतौर पर कोरिया के ज्यादातर स्कूल सोमवार से शनिवार तक खुले होते हैं. ये बात ना तो छात्रों को खुश करने वाली है और ना टीचर्स को. हालांकि अब छात्रों पर ज्यादा बोझ की शिकायतों के बाद कुछ स्कूलों ने खासकर कोरिया के पब्लिक स्कूलों ने महीने के दो शनिवार को छुट्टी शुरू की है.

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टीचर भगवान की तरह
कोरिया में टीचर की स्थिति को भगवान की तरह ऊंचा माना जाता है. समाज में उन्हें बहुत सम्मान मिलता है. साथ ही पैसा भी. माना जाता है कि वो स्कूलिंग सिस्टम के स्तंभ हैं. वो 65 वर्ष से पहले रिटायर नहीं होते. सीनियर होने के साथ उनका वेतन बढ़ता है और काम करने के घंटे भी. कोरिया के सरकारी और कारपोरेट ऑफिसों की तुलना में उन्हें छुट्टियों के बेहतर लाभ मिलते हैं.

कोरियाई स्टूडेंट को रोजाना 14-16 घंटे स्कूल और प्राइवेट ट्यूशन को देने होते हैं


हर पांच साल में टीचर्स का रोटेशन
हर पांच साल के बाद टीचर्स को रोटेशन सिस्टम के तहत स्कूल बदलना होता है. इससे कोई मतलब नहीं कि आप अपने स्कूल को कितना प्यार करते हैं या फिर स्कूल को आपकी कितनी जरूरत है. हर पांच साल के बाद टीचर्स, वाइस प्रिंसिपल और प्रिंसिपल को एक लॉटरी सिस्टम से गुजरना होता है और स्कूल बदला जाता है. यानी हर साल हर स्कूल को नया स्टॉफ मिलता रहता है. इस सिस्टम में हर टीचर को अच्छे और खराब दोनों तरह के स्कूलों में काम करना होता है.

सभी टीचर्स का मूल्यांकन होता है, ये उनके प्रदर्शन और तरह-तरह की वर्कशाप में मौजूद होने के आधार पर होता है, उसी के आधार पर उन्हें प्वाइंट्स मिलते हैं. इस मूल्यांकन में ये भी जोड़ा जाता है कि जिले में उनके स्कूल की रैंकिंग क्या है. कोरिया में कुछ स्कूल मॉडल स्कूल होते हैं, जहां केवल बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले छात्रों को दाखिला मिलता है. ये ज्यादा सुविधा संपन्न होते हैं.

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स्कूलों में सजा भी
अमेरिका या यूरोप के स्कूलों में छात्रों को शारीरिक दंड दिया जाना बंद हो चुका है. अगर किसी टीचर ने ऐसा किया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है. लेकिन कोरिया के स्कूलों में पेरेंट्स को इसमें कोई गुरेज नहीं अगर टीचर्स स्कूल में बच्चों को शारीरिक दंड देते हैं. अनुशासन के नाम पर टीचर छड़ी से पिटाई का सहारा लेते हैं जिसे वो मैजिक वैंड कहते हैं.

कोरिया में माना जाता है कि करियर में ऊंचाइयां छूने के लिए पढ़ाई से बेहतर कुछ नहीं


छात्र होते हैं स्कूल की सफाई के जिम्मेदार
कोरिया में स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी छात्रों की होती है. छात्र स्कूल आकर पहले ये देखते हैं कि कहीं गंदगी तो नहीं. हालांकि स्कूल में सफाई के लिए स्टाफ होता है, लेकिन छात्रों को भी इससे जोड़ा जाता है. उन्हें स्कूल पहुंचते ही देखना होता है कि कहीं गंदगी तो नहीं, कहीं कुछ ऐसा हुआ तो वो उसे तुरंत साफ करते हैं.

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