जानिए सड़े हुए संतरों की बिजली से कैसे जगमगाएगा एक शहर

स्पेन में संतरों के छिलकों और खराब संतरों को इकट्ठा कर बिजली पैदा की जा रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

स्पेन में संतरों के छिलकों और खराब संतरों को इकट्ठा कर बिजली पैदा की जा रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

स्पेन अगले 3 दशक में बिजली के पारंपरिक स्त्रोतों को हटाकर पूरी तरह से जैविक ऊर्जा (source of bio electricity in Spain) तैयार करने की कोशिश में है. इसी कड़ी में वो खराब संतरों से मीथेन गैस और फिर उससे बिजली पैदा कर रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 2, 2021, 12:49 PM IST
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स्पेन के सिविले शहर (Seville city in Spain) में एक नया प्रोजेक्ट चल रहा है. इसके तहत शहर के मशहूर संतरों के छिलकों और खराब संतरों को इकट्ठा कर बिजली पैदा की जा रही है. फिलहाल पायलेट प्रोजेक्ट में शुरुआती सफलता सामने आई है, जिसमें खराब संतरों से निकलने वाली मीथेन गैस से बिजली तैयार हो सकी. माना जा रहा है कि प्रयोग सफल होने पर पूरे शहर के लिए लागू हो सकेगा.

लगातार है चर्चा में 
स्पेन की राजधानी मैड्रिड से लगभग 500 किलोमीटर दूर बसा सिविले शहर वैसे तो देश का चौथा सबसे बड़ा शहर होने के कारण चर्चित रहा लेकिन अब इसके सुर्खियों में होने की कई दूसरी वजहें हैं. मिसाल के तौर पर वो पर्यावरण को बचाने के लिए लगातार नए प्रयोग कर रहा है. जैसे हाल ही में शहर की नगरपालिका ने बचे-खुचे खराब संतरों से बिजली तैयार की.

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जैविक स्त्रोतों के इस्तेमाल पर जोर है


इस काम में नगरपालिका के साथ यूरोपियन एसोसिएशन ऑफ पब्लिक वॉटर ऑपरेटर्स का सहयोग रहा. इसका मकसद है कि वे शहर के लिए जैविक तत्वों से बिजली तैयार कर सकें. यहां तक कि आगे इनकी योजना काफी बड़ी है. इसके तहत वे साल 2023 तक अतिरिक्त बिजली बनाना चाहते हैं ताकि बिजली के लिए अब तक चले आ रहे पारंपरिक स्त्रोतों का इस्तेमाल कम हो सके.

Seville orange
वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट के दौरान विशेषज्ञों के दिमाग में जैविक पदार्थों से बिजली बनाने का विचार आया- सांकेतिक फोटो (flickr)


खराब संतरे जमा करने को 200 लोग काम पर लगे 
वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट के दौरान विशेषज्ञों के दिमाग में जैविक पदार्थों से बिजली बनाने का विचार आया. डीडब्ल्यू की रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से आया है. इस प्रयोग के लिए शहर से खराब संतरे जमा करने शुरू किए गए. सर्दियों में कुल 48000 पेड़ों से लगभग 5.7 मिलियन किलोग्राम संतरे गिरकर बेकार हो चुके थे, जिन्हें जमा किया गया. इतने सारे संतरे जमा करना कोई आसान काम तो था नहीं, लिहाजा इसके लिए 200 लोगों की नियुक्ति हुई जिनका काम था शहर भर में घूमकर पेड़ों से नीचे गिरे संतरे जमा करना.

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मीथेन से बनी बिजली
जमा किए हुए संतरों में से कुल 35 टन संतरों का जूस निकाला गया ताकि उससे इलेक्ट्रिक ऊर्जा और बायोगैस बनाई जा सके. इससे बचे छिलकों को भी बेकार नहीं फेंका गया, बल्कि खाद के काम में उनका उपयोग हुआ. जूस निकालकर जमा करने के बाद इसे एक प्रक्रिया से गुजारा गया, जिससे बायोगैस पैदा हुई. इस बायोगैस में मीथेन लगभग 65% थी. इससे ही बिजली बनाई गई.

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केवल सड़े हुए संतरों के इस्तेमाल से विशुद्ध बचत हो सकती है- सांकेतिक फोटो


कितनी बचत हो सकेगी
अनुमान लगाया जा रहा है कि पायलेट प्रोजेक्ट के बाद लगभग 1,500 किलो वाट बिजली पैदा हो सकेगी, जो इतनी है, जिससे डेढ़ सौ घरों का काम हो सके. इतनी ही बिजली तैयार करने में बिजली विभाग को लगभग 310,000 डॉलर खर्च करने होते हैं. यानी केवल सड़े हुए संतरों के इस्तेमाल से ये विशुद्ध बचत हो सकती है.

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ट्रायल के दौरान सामने आया कि लगभग 1,000 किलोग्राम संतरों से 50 किलो वाट बिजली बन सकती है. ये बिजली एक दिन में पांच घरों की बिजली की जरूरत को पूरा करती है. अगर सारे शहर के खराब संतरे जमा करके बिजली बनाई जा सके तो लगभग 73,000 घरों को बिजली दी जा सकेगी. बता दें कि स्पेन के इस शहर में लगभग 15,000 टन संतरे पैदा होते हैं लेकिन ये सारे संतरे शहरवासी ही इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा ब्रिटेन को निर्यात किया जाता है.

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लगभग 1,000 किलोग्राम संतरों से 50 किलो वाट बिजली बन सकती है- सांकेतिक फोटो (flickr)


साल 2050 तक का टारगेट 
शुरुआती ट्रायल की सफलता को लेकर स्पेन काफी उत्साहित है. उसका मकसद साल 2050 तक बिजली के पारंपरिक स्त्रोतों को खत्म कर पूरी तरह से जैविक चीजों से ऊर्जा तैयार करना है. जैसे संतरे या फिर इसी तरह के दूसरे फल या सब्जियां.

हैदराबाद में सब्जियों से बन रही बिजली
वैसे स्पेन इस पहल में अकेला नहीं. भारत के भी हैदराबाद शहर में जैविक ऊर्जा बनाने की कवायद चल पड़ी है. यहां की बोवनपल्ली मंडी में हर दिन लगभग 10 टन कचरा निकलता है, जिससे लगभग 500 यूनिट बिजली तैयार हो रही है. साथ ही जैविक खाद भी बनाई जा रही है. ये 500 यूनिट बिजली 100 स्ट्रीट लाइट्स जलाने के अलावा मंडी में मौजूद 170 स्टॉलों, एक एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग और पानी की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क के लिए काफी है. इसके अलावा जो 30 किलोग्राम बायोगैस बन रही है, उसे मंडी की कैंटीन में दिया जा रहा है ताकि खाना पकाया जा सके.

विज्ञान प्रसार पत्रिका में इस बारे में विस्तार से दिया गया है. तकनीक में अहम भूमिका निभा रहे वैज्ञानिक डॉ ए.जी. राव के मुताबिक अब तक लगभग 1400 टन सब्जियों को इस तरह से बिजली में बदला जा चुका है. इससे लगभग 32,000 यूनिट बिजली तैयार हुई है. साथ ही लगभग 700 किलोग्राम खाद तैयार हुई, जो खेती के काम में लाई जा रही है.
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