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    कैसे होते हैं सैनिकों को बर्फीले मौसम से बचाने वाले स्पेशल कपड़े?

    बहुत भारी और महंगे होते हैं सैनिकों के स्पेशल कपड़े.
    बहुत भारी और महंगे होते हैं सैनिकों के स्पेशल कपड़े.

    कोलकाता बेस्ड डिफेंस उत्पादक आर्मी (Indian Army) के बताए बदलावों के साथ सैंपल तैयार कर चुका है और आर्मी की हरी झंडी के इंतज़ार में है. जानिए किस तकनीक से बनते हैं माइनस 50 डिग्री तापमान में सैनिकों के उपयुक्त (Soldiers' Special Clothing) कपड़े.

    • News18India
    • Last Updated: November 4, 2020, 11:42 AM IST
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    भारतीय आर्मी के 13 लाख से ज़्यादा सैनिकों (Indian Army Soldiers) के लिए स्पेशल तकनीक से कपड़े तैयार किए जाते हैं, जो कि एक अच्छा खासा मार्केट है. इन स्पेशल कपड़ों के उत्पादन को 'डिफेंसटेक' (Defencetech) या 'प्रोटेक' (Protech) यानी प्रोटेक्टिव टेक्सटाइल कहा जाता है. चूंकि भारत और चीन के बीच तनाव (India-China Border Tension) के चलते लद्दाख की सीमा पर आर्मी के जवान इस साल कड़ाके की सर्दी में तैनात रहने वाले हैं, इसलिए इस तरह के कपड़ों की सप्लाई चर्चा में है. हालांकि आयुध फैक्टरी बोर्ड (OFB) को इसके लिए अब तक फाइनल आदेश नहीं मिला है.

    हाई अल्टिट्यूड पर तैनात जवानों के लिहाज़ से जाड़ों के मौसम वाला विशेष क्लॉदिंग सिस्टम (ECWCS) तैयार करने वाले OFB को इंतज़ार है कि आर्मी फील्ड ट्रायल के बाद उसे फाइनल आदेश दे. आर्मी ने ECWCS में जो संशोधन बताए थे, वो मोडिफिकेशन कर लिये गए हैं. आर्मी की हां का इंतज़ार है, इसके बाद सप्लाई शुरू की जा सकेगी. इन खास कपड़ों के बारे में कई जानकारियां बेहद दिलचस्प हैं.

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    विशेष कपड़ों की ज़रूरत और अहमियत
    एक्सट्रीम कोल्ड क्लाइमेट (ECC) के आइटमों को माइनस 20 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तापमान और 8000 से 18000 फीट की ऊंचाई को ध्यान में रखकर बनाया जाता है. साथ ही, यह भी ध्यान रखा जाता है कि इस मौसम और लोकेशन पर 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली सर्द हवा में भी ये आइटम कारगर रहें.

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    ऐसी लोकेशनों पर तैनात आर्मी के जवानों के लिए ऑर्डिनेंस फैक्टरियों से लगातार इन आइटमों की सप्लाई होती है, जिनमें ECC कोट, ट्राउज़र, कंपलीट मास्क, दस्ताने, जैकेट, विंडचिटर और कैरी पैक शामिल होते हैं. इनमें से कुछ चीज़ें आर्मी विदेशों से भी आयात करती है लेकिन 'आत्मनिर्भर भारत' पैकेज के तहत 10 ECC आइटमों को स्वदेशी स्तर पर ही बनाने के लिए निर्देश हैं.

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    माइनस 50 डिग्री तापमान जैसी स्थितियों में रहते हैं भारतीय जवान.


    इन आइटमों की अहमियत कंडीशन के लिहाज़ से होती है. कम तापमान, बर्फबारी, कम हवा, भूस्खलन, बर्फीली चट्टानों का खिसकना और इन सबके बीच दुश्मन का खतरा बने रहने जैसे हालात में ये आइटम सुरक्षा के साथ ही सक्रिय रहने में मददगार होते हैं. यह भी गौरतलब है कि हाई अल्टिट्यूड में जितने जवान मारे जाते हैं, उनमें से 90 फीसदी की मौत मौसम और कंडीशनों की वजह से होती है, बजाय दुश्मनों के हमले के.

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    कितना है इन कपड़ों पर खर्च?
    स्पेशल क्लॉदिंग और पर्वतारोहण उपकरणों यानी SCME पर 1984 से 2018 के बीच सरकार ने 7500 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए ताकि हाई अल्टिट्यूड पर तैनात सैनिकों की ज़रूरत पूरी हो सके. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक कई तरह के प्रोटेक प्रोडक्टों जैसे बुलेट प्रूफ जैकेट्स, न्यूक्लियर-बायोलॉजिकल-केमिकल सूट, अग्निशामक कपड़े और उपकरण आदि में SCME का हिस्सा करीब 44% है.

    इन विशेष कपड़ों की खासियतें
    सियाचिन, द्रास, कारगिल, सिक्किम, अरुणाचल जैसे कई बॉर्डरों पर तैनात सैनिकों के लिए पहले बताए गए कपड़ों के अलावा वेस्ट कोट, ग्लेशियर कैप, ग्लेशियर ग्लव्स, विशेष मोज़े, थर्मल एसेसरीज़ और स्नो गॉगल जैसे करीब 50 आइटम सप्लाई किए जाते हैं. ये दो श्रेणी के होते हैं, एक जो 12000 फीट तक इस्तेमाल हो सकते हैं और दूसरे, इससे भी ज़्यादा अल्टिट्यूड पर. इनके कुछ खास फीचर देखिए.

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    * ये कपड़े वॉटरप्रूफ और नमी प्रतिरोधी होते हैं.
    * इनमें पॉली यूथरेन की एक मेम्ब्रेन होती है, जिससे सांस लेना आसान होता है.
    * घर्षण प्रतिरोधी तकनीक से बने होते हैं.
    * स्पेशल क्लॉदिंग की किट का वज़न करीब 10 किलोग्राम तक होता है.
    * इन कपड़ों का मटेरियल हाइड्रोफिलिक पॉलीयूथरेन और सिम्पाटेक्स कोटिंग युक्त होता है. भीतर की जैकेट आम तौर पर फ्लीस की बनती है जबकि बाकी आइटम पॉलियेस्टर के.
    * जैकेट्स का वज़न सामान्यतया 2.4 किलोग्राम होता है और ट्राउज़र का 1.2 किग्रा.

    हालांकि इन पैमानों को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इतने भारी कपड़े होने से सैनिक शिकायत करते रहे हैं कि इनसे मूवमेंट धीमा या अवरुद्ध हो जाता है. इसलिए इस आदर्श क्वालिटी के साथ समझौते करते हुए भी उत्पादन किया जाता रहा है. दूसरी तरफ, यह भी रिपोर्ट्स रही हैं कि सियाचिन इलाके में इन आइटमों की सालाना शॉर्टेज 10 फीसदी तक रही है.

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    गौरतलब है कि ECC क्लॉ​दिंग और उपकरणों की सालाना ज़रूरत आर्मी को करीब 27000 सेट की रही है, जिसके बढ़कर 38,299 सेट हो जाने की संभावना है. इसके साथ ही, आर्मी अगले साल के लिए भी कुछ स्टॉक रिज़र्व में रखती है. यानी हर साल खरीदी ज़रूरत के सेट से ज़्यादा की होती है.
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