अंतरिक्ष में क्यों फ्लॉप हुआ भारत से पहले रॉकेट छोड़ने वाला पाकिस्तान

भारत से कई साल पहले शुरू हुआ था पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम. पाकिस्तानी 'सुपारको' की स्थापना 1961 में हुई थी जबकि भारतीय 'इसरो' की स्थापना करीब इसके 8 साल बाद 1969 में हुई थी.

News18Hindi
Updated: August 1, 2019, 11:17 AM IST
अंतरिक्ष में क्यों फ्लॉप हुआ भारत से पहले रॉकेट छोड़ने वाला पाकिस्तान
सुपारको
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Updated: August 1, 2019, 11:17 AM IST
हम सब ये जानते हैं कि भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो दुनिया की सबसे ताकतवर स्पेस एजेंसियों में से एक है. लेकिन आपने शायद ही कभी हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की स्पेस एजेंसी सुपारको के बारे में सुना होगा! आइये जानते हैं कितने ताकतवर हैं भारतीय 'इसरो' और पाकिस्तानी 'सुपारको'.

'इसरो'


इसरो चांद पर मौजूद रहस्यों और विकल्पों की खोज में यान भेजने वला अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गया है. अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की माने तो जिस तेजी के साथ कम समया में ही इसरो में कारनामे कर दिखाए हैं वो अभूतपुर्व है. भारत आज स्पेस सुपरपावर बन चुका है. इसरो अब दुनिया की शीर्ष चार बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियों में गिना जाता है. अमेरिका, रूस, चीन के बाद सबसे संभावनाशील स्पेस एजेंसी. पिछले दस सालों में सबसे बड़ी छलांग लगाने वाली स्पेस एजेंसी. 22 जुलाई को इसरो ने सफलता के साथ चंद्रयान को प्रक्षेपित कर एक बड़ी सफलता हासिल की है. इससे पहले पिछले दस सालों में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कई बड़े कामों को बहुत कम बजट में अंजाम दिया है.

इसरो


पिछले दस सालों में इसरो को मिली बड़ी सफलताएं

22 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान-1 भेजा गया
2014 में सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजा. इसरो ने पहली बार में ही मंगलयान सीधे मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचाया. (सिर्फ 450 करोड़ रुपए खर्च)
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2016 में स्वदेश निर्मित स्पेस शटल RLV-TD लांच
जून 2016 को रिकॉर्ड 20 सैटेलाइट का प्रक्षेपण.
2017 में भारी रॉकेट GSLV MK3 लांच, जो अपने साथ 3,136 किलो वजन का कम्युनिकेशन सैटेलाइट जीसैट-19 लेकर गया.
2017 में ही PSLV के जरिए एक साथ 104 सैटेलाइट लांच करके वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया.
2019 में एंटी सैटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण किया किया था.
2019 में चंद्रयान-2 का सफल प्रक्षेपण

इसरो


इसरो के भावी प्रोजेक्ट्स

इसरो की तरफ से 2022 तक गगनयान लेकर कोई भारतीय अंतरिक्ष में जाएगा. इसरो का शुक्र ग्रह के लिए मिशन 2023 में लॉन्‍च होगा. इसके बाद भारत वर्ष 2029 तक अपना स्‍पेस स्‍टेशन स्‍थापित करेगा. माना जा रहा है कि 2025 से 2030 के बीच भारत चांद पर मैन मिशन पर कामयाबी हासिल कर लेगा. भारत अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने अगले एक दशक में जिन अंतरिक्ष मिशनों की योजना बनाई है, उनमें कॉस्मिक रेडिएशन के अध्ययन के लिए 2020 में मिशन एक्सपोसैट, 2021 में सूर्य तक पहुंचने के लिए आदित्य L1, 2022 में मार्स ऑर्बिटर मिशन-2, 2024 में चंद्रयान-3 और सोलर सिस्टम के अध्ययन के लिए 2028 में मिशन लॉन्‍च किया जाना शामिल है. इसरो कि सबसे बड़ी बात ये है कि इसके ज्यादातर मिशन का बजट दूसरे स्पेस एजेंसी के मुकाबले काफी कम और किफायती होता है.

 

'सुपारको'


भारत से कई साल पहले शुरू हुआ था पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम. सुपारको की स्थापना 1961 में हुई थी जबकि इसरो की स्थापना करीब इसके 8 साल बाद 1969 में हुई थी. साल 1960 में पाक में सबसे बड़े शहर कराची में पाकिस्तान-अमरीकी काउंसिल का लेक्चर चल रहा था. इस काउंसिल के एक वैज्ञानिक ने अपने एक बयान से सबको चौंका दिया थ. उन्होंने कहा था, 'पाकिस्तान अब स्पेस एज में दाखिल होने वाला है और हम बहुत जल्द ही अंतरिक्ष में एक रॉकेट भेजने वाले हैं.'  ये वैज्ञानिक थे प्रोफ़ेसर अब्दुस सलाम. उनके इस बयान ने इस पूरे 'सब कॉन्टिनेंट' में और अंतरराष्ट्रीय जगत में खलबली मचा दिया था. दूसरे दोशों के वैज्ञानिक पाकिस्तान की ये तरक्की देख दंग रह गए थे. ये वही वैज्ञानिक अब्दुस सलाम थे जो आगे चल कर विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार जीतने वाले पहले मुसलमान और पाकिस्तानी बने थे. अयूब खान जब प्रेसिडेंट बने तो अब्दुस सलाम ने उन्हें पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम को लेकर कई आइडियाज दिए थे. अयूब खान की भी दिलचस्पी इस क्षेत्र में थी, पाकिस्तान को लेकर उन्हें स्पेस में कई संभावनाएं उन्हें नजर आ रही थीं. तारीख 16 सितंबर 1961 को कराची में 'सुपारको' यानी पाकिस्तानी 'स्पेस एंड अपर एटमॉस्फियर रिसर्च कमिशन' की स्थापना हुई. पाकिस्तान ने अमरीका की मदद से अपने स्पेस प्रोग्राम के ख्वाब को पूरा किया.

सुपारको


भारत से पहले छोड़ा था पहला रॉकेट

पाकिस्तान ने अपना पहला रॉकेट साल 7 जून 1962 में छोड़ा था. इस रॉकेट का नाम 'रहबर-1' था. सुपारको के इस रॉकेट का मुख्य मकसद मौसम के बारे में जानकारी जुटाना था. पर भारत इसके करीब एक साल बाद ऐसा कर सका. इस रॉकेट लॉन्चिंग के बाद पूरे 'सब कॉन्टिनेंट' में पाकिस्तान ऐसा करने वाला पहला मुल्क बन गया था. साथ ही पूरे एशिया महाद्वीप में पाकिस्तान ऐसा तीसरा मुल्क और दुनिया का 10वां मुल्क था जिसने अंतरिक्ष में सफलता पूर्वक रॉकेट छोड़ा था. ये वो दौर था जब विज्ञान जगत में अब्दुस सलाम की तूती बोलती थी. जानकार बताते हैं कि जनरल अयूब खान के दौर में पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम काफ़ी आगे बढ़ा. उन दिनों अमरीका और पश्चिमी दोशों तक ने पाकिस्तान के स्पेस प्रोग्राम को सराहा था. पर पाकिस्तानी स्पेस प्रोग्राम का स्वर्णिम दौर केवल दस साल रहा. जनरल याह्या खान और प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में प्राथमिकताएं तेज़ी से बदलीं. जनरल जिया-उल-हक और बाद के शासकों के आने के बाद 'सुपारको' बिल्कुल ही हाशिए पर चला गया.

पाकिस्तानी झंडा


पाक एटम बम, मिसाइल तकनीक और फायटर जेट पर खर्च करने लगा

स्पेस प्रोग्राम की फंडिंग में लगातार कटौती होती रही. सुपारको को मिलने वाले पैसे अब सुरक्षा क्षेत्र में खर्च होने लगे थे. ये सिलसिला जनरल जिया-उल-हक में भी ऐसे ही चला. स्थिति ऐसी थी कि सारा पैसा एटॉमिक हथियार हासिल करने में खर्च हो रहा था. हालांकि पाकिस्तान अपने इस एटॉमिक प्रोग्राम काफी गुप्त तरीके से अंजाम दे रहा था ताकि दुनाया को इका भनक न लगे. भारत पहले ही परमाणु परिक्षण कर चुका था. दोनों देशों के बीच कुछ जंगे भी हो चुकी थीं. पाकिस्तान का सारा फोकस एटम बम, मिसाइल तकनीक और फायटर जेट हासिल करने पर चला गया. जो बेहतरीन वैज्ञानिक थे वे एटोमिक परीक्षण के काम में लग गए और दूसरे मिसाइल बनाने में. और इस तरह पाकिस्तान का स्पेस कार्यक्रम अपने लक्ष्य से बेहद पीछे छूटता चला गया. हालांकि 1980 के दशक में पाकिस्तान के मशहूर वैज्ञानिक मुनीर अहमद ख़ान ने जिया-उल-हक़ के साथ मिलकर सुपारको में नई जान फूंकने की कोशिश थी. कई नए मिशन लॉन्च किए गए, रिसर्च के लिए पैसे भी दिए गए. अधिकतर धनराशि रक्षा क्षेत्र की तरफ चली जा रही थी. जो कुछ सुपारको लॉन्च भी कर रहा था वे सब चीन से ही लॉन्च हो रहे थे.

अब्दुस सलाम


सुपारको असफताओं के चरम पर पहुंच गया

पकिस्तान के पहले सैटलाइट बद्र-1 को 1990 में चीन से ही अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया था. बद्र-1 के लॉन्च होते ही पाकिस्तान ने अपने दूसरे सैटलाइट के लॉन्चिंग पर काम करने लगा. सुपारको ने अपने दूसरे सैटलाइट को तैयार करने के लिए यूके की मदद ली. लगातार तीन साल तक काम करने के बाद भी सुपारको अपना दूसरा सैटलाइट तय समय पर तैयार नहीं कर सका. इसके बाद सुपारको को इसकी लॉन्चिंग रिशिड्यूल करना पड़ा था. फिर यूएस की मदद से 2001 में इसकी लॉन्चिंग हो पाई. इसका नाम पाकसैट-1ई था. पर ये सैटलाइट पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ी नाकामयाबी साबित हुई. सुपारको ने केवल दो सालों में ही इसपर अपना नियंत्रण खो दिया. सुपारको के असफल होने के पीछे ये भी वजह है कि आगे चलकर इसके प्रमुख भी वरिष्ठ फ़ौजी अफ़सर होने लगे और रिसर्च का काम धीमा होता गया. मिसाल के तौर पर साल 2001 के बाद से सुपारको के चीफ पाकिस्तान फ़ौज के मेजर जनरल रैंक के अफ़सर होते रहे हैं. ऐसे क्यों हुआ इसका जवाब किसी भी पाकिस्तानी विज्ञानिक के पास नहीं था.

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First published: July 31, 2019, 8:19 PM IST
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