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बौद्ध-बहुल देश श्रीलंका क्या मुस्लिम आबादी के खिलाफ कोई बिल ला रहा है?

बौद्ध-बहुल देश श्रीलंका क्या मुस्लिम आबादी के खिलाफ कोई बिल ला रहा है?

श्रीलंका में एकाएक धार्मिक अतिवाद के खिलाफ मुहिम चल पड़ने की एक खास वजह है (Photo- news18 English via PTI)

श्रीलंका में एकाएक धार्मिक अतिवाद के खिलाफ मुहिम चल पड़ने की एक खास वजह है (Photo- news18 English via PTI)

धार्मिक कट्टरता को खत्म करने के लिए यूरोपीय देशों की तरह श्रीलंका में भी एक बिल का जिक्र हो रहा है. इसके तहत सैकड़ों मदरसे बंद हो सकते हैं और बुर्के पर बैन लग सकता है.

    स्विटजरलैंड के बाद अब श्रीलंका भी बुर्का बैन की तैयारी में है. ये कदम इस्लामिक कट्टरपंथ को रोकने की दिशा में लिया जा रहा है. इसके अलावा फ्रांस की तर्ज पर श्रीलंका में इस्लामिक स्कूलों को भी बंद किया जा रहा है. बता दें कि फ्रांस में भी अलगाववाद के खिलाफ एक नियम आ रहा है, जिसे सेपरेटिज्म बिल (Separatism bill in French parliament) कहा गया. इधर धार्मिक कट्टरता से जूझते श्रीलंका में बीते दिनों हलाल सर्टिफिकेट पर भी बैन लगाया जा चुका, जिसपर काफी बवाल भी हुआ था.

    सत्तापक्ष के मंत्री ने कही बात 
    महिंदा राजपक्षे सरकार के सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री सरथ वेरासेकेरा ने शनिवार को देश में धार्मिक कट्टरता खत्म करने के लिए राजनैतिक पहल की बात बताई. वेरासेकेरा ने मुताबिक सरकार बुर्के पर पाबंदी लगाने जैसे कुछ कदमों के लिए बिल ला रही है. बिल पास होने पर श्रीलंका की मुसलमान महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढंककर नहीं रह सकेंगी. इसके साथ ही श्रीलंका में मदरसों को बंद करने की बात भी हो रही है. राजपक्षे के मंत्री ने कहा कि देश में ये मदरसे नेशनल एजुकेशन पॉलिसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं और उनपर रोक लग सकती है.

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    स्विटजरलैंड के बाद अब श्रीलंका भी बुर्का बैन की तैयारी में है- सांकेतिक फोटो


    आतंकी हमले के बाद हुई बदलाव 
    इधर आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष देश में एकाएक धार्मिक अतिवाद के खिलाफ मुहिम चल पड़ने की एक खास वजह है. असल में वहां साल 2019 में इस्लामी आतंकवादियों ने चर्चों और होटलों पर हमले किए थे, जिसमें 250 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे. इसके बाद से इस बौद्ध-बहुल देश में धार्मिक कट्टरता के खिलाफ पहली बार गुस्सा दिखा. बता दें कि 70 फीसदी बौद्ध आबादी वाले देश में दूसरे नंबर पर 12 फीसदी के साथ हिंदू और तीसरे नंबर पर मुस्लिम आबादी है, जो कुल आबादी का 10 फीसदी हैं. यानी मुस्लिम आबादी भी इस देश का बड़ा हिस्सा है.

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    हलाल फूड पर बैन 
    हमले के बाद से श्रीलंका में मुस्लिम कट्टरता के खिलाफ गुस्सा दिखने लगा. इसका बड़ा प्रमाण हलाल सर्टिफिकेट पर बैन था. मालूम हो कि हलाल एक अरेबिक शब्द है जिसका मतलब है जायज़ या वैध. ये इस्लाम से जुड़ा हुआ है, जो खाने के मामले में और उसमें भी खासकर मीट के मामले में तय करता है कि वो किस तरह से प्रोसेस किया हुआ हो. वहीं हराम भी एक अरेबिक शब्द है जिसका मतलब है वर्जित यानी मनाही वाला. हराम के तहत इस्लाम में कई चीजें और आचार-विचार आते हैं, जैसे शराब, मरे हुए जानवर को काटना, पोर्क आदि.

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    हराम के तहत इस्लाम में कई चीजें और आचार-विचार आते हैं, जैसे शराब, मरे हुए जानवर को काटना, पोर्क - सांकेतिक फोटो (pixabay)


    बहुत बड़ा है हलाल का कारोबार
    कंपनियां अपने उत्पादों को इस्लाम-बहुल देशों में मान्यता दिलाने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन लेती हैं. साल 2016 में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में हलाल फूड का कारोबार 415 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा का है. यही वजह है कि इतने बड़े मार्केट को सर्व करने के लिए कंपनियां खुद को इससे अलग नहीं रख पाती हैं.

    हलाल सर्टिफिकेशन पर लगातार सवाल उठ रहे हैं
    इसकी एक वजह तो ये है कि हर देश में इसके रेगुलेशन का कोई तय नियम न होने के कारण इससे आया पैसा कहां खर्च होता है, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती. दूसरी एक बड़ी वजह ये मानी जा रही है कि चूंकि मीट को हलाल बनाने में हिंदू या दूसरे धर्म के लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता है, लिहाजा इससे दूसरे धर्मों के लिए रोजगार कम होता है. कई देशों में इस बात को लेकर विरोध हो रहा है.

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    शांति के हवाले से लगा बैन
    श्रीलंका ने यही कारण देते हुए खाने के प्रोडक्ट्स से हलाल सर्टिफिकेशन हटा दिया. अब केवल उन्हीं प्रोडक्ट को हलाल सर्टिफिकेशन दिया जाएगा, जो सीधे दूसरे देशों को भेजे जाते हों. श्रीलंका में मुस्लिम समुदाय की अगुआ All Ceylon Jamiyyathul Ulama (ACJU) ने interest of peace का हवाला देते हुए ये फैसला लिया. साल 2019 में वहां हुए आतंकी हमले के बाद समुदायों में शांति बनाए रखने के लिहाज से ये फैसला लिया गया था.

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    कोरोना के चरम पर श्रीलंकाई सरकार ने मुस्लिमों को शवों के दफनाने पर रोक लगा दी थी- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    शवों के दफनाने पर रोक
    इसके अलावा साल 2020 में कोरोना के चरम पर श्रीलंकाई सरकार ने मुस्लिमों को शवों के दफनाने पर रोक लगा दी. इसके पीछे तर्क दिया गया कि इससे संक्रमण फैलने का डर होता है, और इसकी बजाए शवों को जलाया जाना चाहिए, जैसा कि दूसरे कोरोना संक्रमित देशों में हो रहा है. इसपर मुस्लिम समुदाय काफी भड़क गया था. बाद में कोरोना की गाइडलाइन से ये नियम हटा लिया गया.

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    फ्रांस में भी आ रहा है बिल 
    जिस बिल की श्रीलंकाई मंत्री ने बात की, उस बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं दी गई लेकिन इससे मिलता-जुलता बिल फ्रेंच संसद में आ भी चुका है. सेपरेटिज्म बिल नाम से इस बिल के तहत मस्जिदों पर नजर रखी जाएगी कि कहीं वहां कट्टरता को नहीं सिखाई जा रही. साथ ही साथ मुस्लिम समुदाय के बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करें, ये भी पक्का किया जाएगा. उन स्कूल और शिक्षण संस्थानों को बंद करवाया जा सकेगा, जो शिक्षा के बहाने ब्रेनवॉश करते हैं. साथ ही साथ नए कानून के तहत होम-स्कूलिंग पर कड़े प्रतिबंध लगेंगे ताकि ऐसे स्कूलों में बच्चों का दाखिल न किया जाए जो नेशनल करिकुलम से अलग हो.undefined

    Tags: France, Muslim traditions, Sri lanka, Sri Lanka clashes

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