अब क्यों कम बन रहे हैं तारे, क्या कहती है भारतीय खगोलविदों की पड़ताल

विभिन्न गैलेक्सी (Galaxies) में तारों के निर्माण (Star Formation) की दर अब बहुत कम हो गई है.
विभिन्न गैलेक्सी (Galaxies) में तारों के निर्माण (Star Formation) की दर अब बहुत कम हो गई है.

तारों (Star) के बनने की दर 10 अरब साल पहले बहुत अधिक थी जो कम हो गई है. इसकी वजह जानने की दिशा में भारतीय खगलोविदों (Indian Astronomers) ने एक उपयोगी शोध किया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 9, 2020, 6:44 AM IST
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खगोलविदों की अंतरिक्ष (Space) और तारों (Stars) के बारे में जानकारी हासिल करने में ऑप्टिकल और इंफ्रारेड टेलीस्कोप का काफी योगदान है. इन्ही टेलीस्कोप के अवलोकनों के आधार पर वे जान सके हैं कि ब्रह्माण्ड में तारों के निर्माण (Star Fromation) की दर आज से 8 से 10 अरब साल पहले सबसे ज्यादा थी. लेकिन उसके बाद वह 10 गुना कम की होकर आज की दर पर आ गई है. इसकी वजह अभी तक पता नहीं चली थी.

हाइड्रोजन की अहमियत
तारों के बनने की दर कम होने की वजह अभी तक न पता चलने का प्रमुख कारण पर्याप्त जानकारी न होना थी. ऐसा नहीं है कि अब भी खगोलविदों के पास पूरी जानकारी आ गई है. जिस जानकारी की खगोलविदों को जरूरत है. वह है तारों को प्रमुख तत्व की जानकारी यानि न्यूट्रल एटॉमिक हाइड्रोजन.

न्यूट्रल एटॉमिक हाइड्रोजन
हाइड्रोजन परमाणु बहुत ही कम होने वाली घटना में उत्तेजित अवस्था से कम ऊर्जा वाली स्थिति में पहुंच जाता है और ऐसा करते समय इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकरण को उत्सर्जित करता है. इस विकिरण की वेवलेंथ 21 सेमी होती है. इस वेवलेंथ के विकिरण का अवलोकन करना न्यूट्रल हाइड्रोजन परमाणु की मौजूदगी का प्रमाण होता है. लेकिन यह बहुत कम और कमजोर होता है. इससे सुदूर गैलेक्सी से अवलोकन करना बहुत कठिन होता है.



इन खगोलविदों ने पकड़े ये विकिरण
हाल ही में नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स (NCRA), टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेटंल रिसर्च पुणे, और रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट बेंगलुरू के शोधकर्ताओं ने हाल ही में सुदूर गैलेक्सी से आए इस 21 सेमी के विकिरणों को पकड़ा है. यह विकिरण ऐसे समय में हुआ है जब तारों के निर्माण की गतिविधि कम होना ही शुरू हुई थी.

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इतनी दूर से 21 सेमी वेवलेंथ के विकिरण (Radiation) का अवलोकन बहुत ही कठिन काम है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


पहली बार ऐसा मापन
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पहली बार है कि इस तरह गैलेक्सी के परमाणु गैस की मौजूदगी का मापन किया गया है. यह गैलेक्सी के गैस और उनका तारों के निर्माण से संबंध के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि है. शोधकर्ताओं ने ये 21 सेमी के उत्सर्जन संकेत 7653 गैलेक्सी से आते हुए देखा. शोधकर्ताओं ने इस तथ्य को भी अपनी गणना में शामिल किया कि ब्रह्माण्ड में सभी पिंड एक दूसरे से दूर जा रहे हैं.

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तारों के निर्माण
तारों का निर्माण उन इलाकों में होता है जिसमें धूल और ठंडी घनी गैसे हो, इसमें हाइड्रोजन गैस भी शामिल होती है. ये सभी सिमट कर तारों का निर्माण करते हैं. लेकिन न्यूट्रल हाइड्रोजन (H1) बाद मे हाइड्रोजन गैस (H2) बनती है. इस लिहाज से बड़े पैमाने पर न्यूट्रल परमाणु हाइड्रोजन तारों के निर्माण के लिए ईधन होता है.

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तारों के निर्माण (Star formation) में हाइड्रोजन (Hydrogen) की मात्रा की अहम भूमिका होती है. . (प्रतीकात्मक तस्वीर: नासा)


हाइड्रोजन की भूमिका
हमारे पास की गैलेक्सी में खगोलविदों ने पाया है कि गैलेक्सी की वजन और तारों के निर्माण की दर का उनकी ठंडी गैस से यानि H1 और H2 से संबंध है लेकिन पाया गया है सुदूर गैलेक्सी में H1  की मात्रा कम है. शोधकर्ताओं ने पाया कि तारे कितनी जल्दी बनते हैं यह हाइड्रोजन के उपलब्ध होने पर निर्भर होता है.

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तारों के निर्माण की दर
शोधकर्ताओं ने पाया कि H1 की मात्रा खत्म होने पर तारों के निर्माण की दर तेजी से कम हो जाती  है और यही पिछले 8 अरब सालों से हो रहा है. इस आधार शोधकर्ता यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि कोई गैलेक्सी कब तक तारों को निर्माण करती रहेगी. अब शोधकर्ताओं का बस विस्तृत अवलोकनों की जरूरत है जो पुणे के GMRT जैसे संवेदनशील टेलीस्कोप से मिल सकता है.
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