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इतिहास में आज- इंसानी क्लोन भ्रूण से अलग किया गया था स्टेम सेल

कृत्रिम भ्रूण (Cloned Human Embryo) को स्रोत के तौर पर उपयोग कर स्टेम सेल निकल पाना बड़ी उपलब्धि माना गया. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) में पहली बार 16 मई 2013 में वैज्ञानिकों को क्लोन किए गए इंसानी भ्रूण (human Embryo) से स्टेम सेल (Stem Cell) निकालने में सफलता मिली थी.

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    स्टेम सेल (Stem Cells) का चिकित्सकीय दुनिया में बहुत महत्व माना जाता है. इस पर बहुत तरह के शोधकार्य चल रहे हैं और कुछ ने तो इसमें बहुत ज्यादा उम्मीदें जगाई हैं. स्टेम सेल या मूल कोशिकाएं वे कोशिकाएं होती हैं जो वैसे तो किसी खास तरह की कोशिका नहीं होती हैं, लेकिन उनमें खुद को किसी भी प्रकार की कोशिका में  बदलने की क्षमता होती है. इस वजह से वैज्ञानिक एक दशक से भी ज्यादा समय से मानव के क्लोन किए भ्रूण (Human Embryo) से स्टेम सेल को निकालने का प्रयास कर रहे थे जिसमें उन्हें 16 मई 2013 को सफलता मिली. यह चिकित्सकीय इतिहास (Medical History) में एक बहुत बड़ी कामयाबी माना गया था.

    क्लोन भ्रूण बन गया स्रोत
    स्टेम सेल की अहमियत बहुत पहले ही समझी जा चुकी थी, लेकिन यह माना जा रहा था कि कृत्रिम भ्रूण का विकास कोशिकाएं बनने की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही रुक जाता है. लेकिन इस सफलता के बाद क्लोन किए गए भ्रूण को स्टेम सेल के स्रोत के तौर पर उपयोग में लाया गया जिससे शरीर की दूसरे प्रकार की कोशिकाएं तैयार हो सकती है. वैसे वैज्ञानिकों ने तब यह भी माना कि स्टेम सेल को हासिल करने के और भी तरीके  हो सकते हैं. फिर भी इसे बड़ी उपलब्धि माना गया.

    व्यापक इलाज की संभावनाएं
    स्टेम सेल हासिल करने के बाद उसका उपयोग शरीर के किसी दूसरे हिस्से जैसे हृदय, मस्तिष्क रीढ़ या कोई अन्य हड्डी या किसी भी अंग के ऊतकों की कोशिकाओं को बनाने में किया जा सकता है. इससे दिल की संरचनात्मक व्याधि, पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, रीढ़ में चोट और आंखों की रोशनी संबंधी कोई भी बीमारी का इलाज संभव है. यहां तक कि दावा तोयह भी किया जाता है कि इससे कटे हुए अंगों को फिर से हासिल करना भी संभव है.

    क्यों हुआ सेम सेल की ओर झुकाव
    दरअसल स्टेम सेल प्रत्यारोपण की सीमाओं की वजह से एक बेहतर उपचार विकल्प होता दिखाई देता है. प्रत्यारोपण में जहां दान में दिए गए अंग यानि शरीर के बाहरी अंग को ना अपना पाने की संभावना अधिक होती हैं इसलिए वैज्ञानिकों  मरीज के ही डीएनए क्लोनिंग कर स्टेम सेल बनाने के बारे में विचार किया.

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    स्टेम सेल (Stem Cell) तकनीक से चिकित्सकीय दुनिया के वैज्ञानिकों को बहुत उम्मीदें हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    दान के भ्रूण से असफलता
    क्लोन किए गए मानव भ्रूण से पहले वैज्ञानिकों ने दान में किए गए भ्रूण से स्टेम सेल निकालकर कई बीमारियों को ठीक करने का प्रयास किया.  लेकिन वह सफल नहीं हुआ. इसके बाद वैज्ञानिकों ने सोमेटिकसेल न्यूक्लियर ट्रांसफर तकनीक की ओर रुख किया. इस तकनीक के जरिए ही 1996 में डॉली नाम की भेड़ को क्लोनिंग से बनाया था.

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    इस तकनीक ने निकाला रास्ता
    सोमेटिकसेल न्यूक्लियर ट्रांसफर के जरिए मरीज की त्वचा की कोशिका से निकाला गया डीएनए खाली अंडाणु में डाला जाता है जो एक भ्रूण के रूप में विकसित होता है. इससे बच्चा तो नहीं बनता लेकिन स्टेम सेल जरूर बन जाती हैं.वैज्ञानिकों का मानना था कि इस तरह से बनी कोशिकाओं में बनी जीन्स का उपयोग किया जाएगा इसलिए प्रत्यार्पण की जटिलताएं कम हो सकेंगीं.

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    स्टेम सेल (Stem Cell) के कारगर स्रोत के लिए वैज्ञानिकों ने क्लोन किए गए मानव भ्रूण की ओर रुख किया. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    विवाद और आपत्तियां
    भ्रण के स्तर पर वैज्ञानिक छेड़छाड़ का दुनिया में बहुत पहले से ही विरोध हो रहा है. इसको लेकर एक लंबी और विवादास्पाद बहस हो रही है जिसमें प्रकृति से छेड़खानी का आरोप भी शामिल है. तो वहीं इसकी तरफदारी करने वाले बताते हैं कि किसी तकनीक के दुरुपयोग के डर से उसपर काम करना बंद करना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता.

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    बहराल स्टेम सेल पर शोध ना केवल बहुत आगे बढ़गया है विविधताएं भी शामिल करता जा रहा है. हाल ही में भारतीय शोधकर्ताओं ने स्टेम सेल आधारित ऐसे तकनीक विकसित की है जो खून की जांच कर ही बता सकेगी कि व्यक्ति को कैंसर है या नहीं बल्कि उससे यह भी पता चल सकेगा कि उसे अगले एक साल में कैंसर होगा या नहीं. बात हैरानी की है लेकिन 8 साल बाद भी इस क्षेत्र के नए नए आयाम खुलते जा रहे हैं.
    Published by:Vikas Sharma
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