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वो स्टेनोग्राफर, जो नहीं होता तो खो जाते स्वामी विवेकानंद के यादगार भाषण

अमेरिका यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद का यादगार चित्र-
अमेरिका यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद का यादगार चित्र-

हर महान व्यक्ति (Great Indians) के पीछे कई समर्पित व्यक्ति होते हैं. दूसरे शब्दों में, ऐसे बिरले ही होते हैं जो किसी को महान बनाने के लिए अपना जीवन झोंक देते हैं. ऐसा ही नाम है गुडविन (J.J. Goodwin) का, जिन्हें हंसी में विवेकानंद बैडविन भी कहते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 14, 2021, 1:14 PM IST
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जब 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका के ऐतिहासिक दौरे (US Tour of Swami Vivekanand) पर गए थे, तब वहां उन्हें शिकागो धर्म सम्मेलन (Chicago Parliament of Religions) के बाद कई स्थानों पर लेक्चर देने थे. विवेकानंद के अनुयायियों की इच्छा था कि कोई स्टेनोग्राफर लेक्चरों को रिकॉर्ड कर सके. समस्या यह थी कि विवेकानंद जिस प्रवाह के साथ बोलते थे, उस रफ्तार से रिकॉर्ड कर पाने वाला स्टेनो मिल नहीं रहा था. विवेकानंद के मित्रों ने कोर्ट में रिपोर्टर जे जे गुडविन (John Josiah Goodwin) को यह ज़िम्मेदारी सौंपी. हालांकि उस वक्त गुडविन बहुत महंगे पड़े थे, लेकिन अब इतिहास है कि गुडविन नहीं होते तो विवेकानंद के बोले हुए ज़्यादातर शब्द खो गए होते.

गुडविन एक बार विवेकानंद से क्या जुड़े, वो हमेशा के लिए बंधकर रह गए. सिर्फ अमेरिका ही नहीं, उसके बाद विवेकानंद दुनिया में जहां भी गए, गुडविन उनके साथ बने रहे. भारत के ऊटी को आखिर गुडविन ने अपना घर बनाया था, जिनकी 150वीं जयंती बीती 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के साथ ही मनाई गई. हालांकि उनकी जन्मतिथि 20 सितंबर है लेकिन कोरोना के चलते पिछले साल इसे रामकृष्ण मठ मना नहीं सका था. विवेकानंद के लेक्चरों को नोट करने और उन्हें टाइप कर सुरक्षित रखना व अखबारों को भेजने वाले गुडविन का जीवन बेहद महत्वपूर्ण रहा.

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गुडविन कैसे विवेकानंद से जुड़े?
न्यूयॉर्क के अखबारों में 25 साल के गुडविन ने विज्ञापन देखा था कि वेदांत सोसायटी विवेकानंद के लेक्चरों को नोट करने के लिए एक स्टेनोग्राफर चाहती थी. जॉन जोशिया गुडविन को यह कला अपने पिता जोशिया से विरासत में मिली थी और वह तेज़ी से बातें रिकॉर्ड व टाइप कर सकते थे. इस विज्ञापन के ज़रिये कोर्ट में पत्रकार के तौर पर काम कर रहे गुडविन स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए.

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शुरूआत में विवेकानंद के लेक्चरों को नोट और टाइप करके अखबारों और कोलकाता यानी उस समय के कलकत्ता से छपने वाली पत्रिका ब्रह्मवादी तक भेजना गु​डविन का काम था. इसके बाद अगले दो से ढाई सालों तक गुडविन बराबर विवेकानंद के साथ बने रहे.

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स्वामी विवेकानंद को समर्पित पोर्टल vivekananda.net से गुडविन की तस्वीर साभार.


गुडविन का भारत आना और गुज़रना
1897 में स्वामी विवेकानंद दुनिया के कई हिस्सों में भ्रमण के बाद भारत पहुंचे थे. कई अनुयायियों के साथ गुडविन भी उनके साथ मद्रास पहुंचे थे. कुछ समय उत्तर भारत में विवेकानंद के साथ घूमने के बाद मद्रास लौटकर गर्मी से परेशान हो गए गुडविन ने ऊटी जाकर रहना ठीक समझा. बताते हैं कि जनवरी 1898 के बाद गुडविन और विवेकानंद की भेंट कभी नहीं हो सकी.

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मद्रास की गर्मी न झेल पाए गुडविन की सेहत ऊटी जाकर भी नहीं संभली. बीमार रहते हुए उन्होंने 2 जून 1898 को सिर्फ 27 साल की उम्र में दम तोड़ दिया था. उनकी मौत पर विवेकानंद ने इस तरह के शब्द कहे थे :

उसका ऋण मैं कभी चुका नहीं सकूंगा. अगर किसी को ऐसा लगता है कि मेरे किसी शब्द से उसे कोई मदद मिली है, तो मैं बता दूं कि उसके पीछे गुडविन की अनथक और निस्वार्थ मेहनत ही रही. मैंने एक ऐसा दोस्त खोया जो स्टील की तरह मज़बूत, पूरी तरह समर्पित और थकान शब्द को ही न जानने वाला था... दुनिया में ऐसे महान लोग कम हैं जो दूसरों के लिए ही जीते हैं.


गुडविन उर्फ बैडविन और विवेकानंद की यात्रा
चूंकि गुडविन को ​क्रिकेट और फुटबॉल के साथ जुआ खेलना भी पसंद था इसलिए मज़ाक में विवेकानंद उन्हें बैडविन भी कहते थे. दोनों के बीच अच्छा दोस्तान संबंध रहा लेकिन गुडविन का समर्पण कभी कम नहीं रहा. शिकागो की धर्म संसद के बाद विवेकानंद को पूरे अमेरिका का दौरा कर कई जगह लेक्चर देने थे. 1895 में गुडविन स्टेनो के तौर पर उनके दौरे में शामिल हुए और पूरे अमेरिका में विवेकानंद के लेक्चर रिकॉर्ड करते रहे.

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न्यूज़18 क्रिएटिव


अमेरिकी लेखक और विवेकानंद की मशहूर अनुयायी सारा बुल ने गुडविन को विवेकानंद का सबसे अहम सहयोगी बताया था. अमेरिका के बाद 1896 में विवेकानंद के इंग्लैंड के दौरे पर भी गुडविन साथ रहे. आखिर में भारत पहुंचे वो गु​डविन ही थे, जिन्होंने दुनिया को यह रिपोर्ट दी थी कि भारत में कितने उत्साह के साथ विवेकानंद का स्वागत सत्कार किया गया.

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विवेकानंद जब कलकत्ता पहुंचे थे तब बंगाली के मशहूर लेखक शरतचंद्र ने भी उनसे मुलाकात की थी. बाद में शरतचंद्र ने जब 'एक अनुयायी की डायरी' लिखी तब उसमें उन्होंने भी गुडविन का ज़िक्र किया. 1897 में कोलंबो से अल्मोड़ा तक विवेकानंद के लेक्चरों को शॉर्ट हैंड रिकॉर्ड करते हुए गुडविन मद्रास पहुंचकर ब्रह्मचारी बन गए थे.
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