जानिए क्या है नॉन टाइम की अहमियत, आइंस्टीन और न्यूरोसाइंस तक मानते हैं जिसे

शोध का मानना है कि दैनिक रूटीन (Daily Routine) में फंसे रहना ठीक बात नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

शोध का मानना है कि दैनिक रूटीन (Daily Routine) में फंसे रहना ठीक बात नहीं है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

दुनिया में नियमित दिनचर्चा (Daily Routine) के पौरोकार तो बहुत हैं, लेकिन नॉन टाइम (Non Time) की अहमियत को स्टीव जॉब्स (Steve Jobs), अलबर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) से लेकर न्यूरोसाइंस (NeroScince) तक मानती है.

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कहा जाता है कि दिनचर्या (Daily Routine) को नियमित रखना सफलता का अहम सूत्र है. ऐसा विज्ञान और इतिहास दोनों ही कहते रहे हैं. रिसर्च कहती है कि नियमित दिनचर्या के तो फायदे हैं, लेकिन इस दिनचर्या में नॉन टाइम (Non Time) का होना बहुत जरूरी है. ऐसे स्टीव जोब्स (Steve Jobs), अलबर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) के अलावा आज की न्यूरोसाइंस (neuroscience) भी मानती है. इस नॉन टाइम को लेकर भी अलग- अलग मत है.

नियमित दिनचर्चा के समर्थक कम नहीं
हैरानी की बात नहीं है कि अखबारों और इंटरनेट इसके फायदों से संबंधित लेख भरे रहते हैं. इसमें मशहूर लोगों की दिनचर्या का भी खूब जिक्र होता रहता है जिससे लोग प्रेरणा लेते हैं. व्यस्त दिनचर्या (Busy Schedule) के फायदों के साथ नुकसान भी हो सकते हैं. शोध का कहना है कि अगर आप अपने दिन में स्वस्थ आदतों को भरमार कर लते हैं, तो भी शायद आपके लिए काफी ना हो.  इसकी वजह होगी आपकी दिनचर्या में फालतू समय का ना होना.

क्या है ये नॉन टाइम
नॉन टाइम की व्याख्या अलग-अलग तरह से होती है. कुछ खुद को समय देना कहते हैं. तो कुछ दुनिया से बाधित ना होने वाले समय को कहते हैं तो कुछ केवल इसे फालतू लेकिन जरूरी समय कारर देते हैं. नॉन टाइम की व्याख्या करते हुए “द आर्ट ऑफ इम्पॉसिबल” के लेखक और टेड स्पीकर स्टीवन कोटलर बताते हैं कि नॉन टाइम एक काल्पनिक शब्द उस शांत और एकांत समय को कहते हैं जिसमें आप दुनिया की आवाज और मांग के बाधित नहीं होते.



एक व्याख्या ये भी
कोटलर का कहना है कि उनके हिसाब से सुबह चार बजे, जब वे उठते हैं, से लेकर सुबह 730 बजे, जब दुनिया उठती है, तक का समय उनके लिए नॉन टाइम होता है. कोटलर के मुताबिक यह समय केवल उन्हीं का होता है. वे आगे कहते हैं कि दिन का दबाव वाला समय उस समय नहीं आया होता है. इसलिए उनके लिए यह समय काफी समृद्धशाली होता है. ऐसे में लेखन में एक वाक्य दो घंटे का समय ले ले तो किसे परवाह है.

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दैनिक रूटीन (Daily Routine) बांधना रचनात्मकता को खत्म कर सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


केवल यही नहीं है नॉन टाइम
कोटलर की सुबह आनंदपूर्णी लगती है. लेकिन यह नॉन टाइम केवल यही नहीं कि आदमी को लेखन की आजादी से लिखने का समय मिल सके. कोटलर का कहना है कि न्यूरोसाइंस ने भी बताया है कि शांत समय के अलग अलग खंडों का हमारी सोच और रचनात्मकता पर बहुत गहरा असर होता है.

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दबाव में छिन सकती है रचनात्मकता
कोटलर बताते हैं कि दबाव दिमाग को विस्तृत पहलुओं पर ध्यान देने के लिए मजबूत करता है. उससे दिमाग का दायां गोलार्द्ध सक्रिय होता है और दिमाग बड़ी तस्वीर देखने की स्थिति में नहीं रह पाता है. इससे भी बुरी बात यह है कि हम प्रायः दबाव में ही रहते हैं. हम जल्दबाजी के लिए खुश नहीं होते हैं जो हमारे मूड का खराब कर देता है और इससे हमारा दिमाग और ज्यादा केंद्रित होने की कोशिश करने लगता है और हमारी रचनात्मकता छीन सकता है.

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अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीव जोब्स जैसे लोगों को भी रचनात्मक विचार नॉन टाइम (Non Time) में सूझते थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


क्या होता है नॉन टाइम का फायदा
वहीं नॉन टाइम हमारे दिमाग को रिलैक्स करता है जिससे हम बड़ी तस्वीर देख पाते हैं और हमारे रचनात्मकविचारों को पनपने का मौका देता है. अस्त व्यस्त दिनचर्चा, भले ही आप बढ़िया योगा क्लास ही क्यों ना लेते हों,  आपके रचनात्कम विचारों को दूर कर सकती है. इस बात से स्टीव जॉब और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ भी सहमत हैं.

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आइंस्टीन जैसे रचनात्मक लेकिन महान वैज्ञानिक भी इस सच की पैरवी कर चुके हैं. उसी तरह से स्टीव जॉब्स को जानने वाले भी मानते रहे कि उनके दिमाग में श्रेष्ठ विचार उनके खाली समय में आते थे जब उनके समय में कोई लक्ष्य नहीं होता है. खुद के लिए इस तरह का ‘फालतू’ समय निकालना भले ही आसान नहीं हो, लेकिन खुद से सर्वश्रेष्ठ और रचनात्मक निकालने के लिए ऐसा करना जरूरी होगा.
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