भारत में विलय के पहले से लेकर आर्टिकल 370 खत्म होने तक ये है जम्मू-कश्मीर की कहानी...

देश की आजादी से पहले कश्मीर के महाराजा अपने राज्य को भारत और पाकिस्तान से अलग स्वतंत्र देश के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन जब पाकिस्तान के कबालियों ने हमला किया तो उन्होंने भारत में विलय का फैसला लिया. पढ़ें पिछले करीब 90 सालों में कश्मीर में कैसे बदली सियासत...

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 5, 2019, 3:25 PM IST
भारत में विलय के पहले से लेकर आर्टिकल 370 खत्म होने तक ये है जम्मू-कश्मीर की कहानी...
धारा 370 के पहले दो उपबंधों में बदलाव के बाद अब जम्मू-कश्मीर की पूरी हालत बदल जाएगी
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 5, 2019, 3:25 PM IST
जब भारत आजाद हो रहा था तब ब्रिटिश राज ने सभी मौजूदा रियासतों और राजतंत्रों के सामने पेशकश की कि वो भौगोलिक स्थितियों के लिहाज से भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में अपना विलय कर लें. तब जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने स्वाधीनता की घोषणा कर दी थी, यानी उनका कहना था कि 'ना तो हम भारत में जुड़ेंगे और न ही पाकिस्तान में, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाकर रहेंगे.' हालांकि उसके बाद ऐसी स्थितियां पैदा हुईं कि उन्हें कश्मीर का भारत में विलय करना पड़ा.

महाराजा हरि सिंह 1925 में कश्मीर की गद्दी पर बैठे थे. वह अपना अधिकांश समय बंबई के रेसकोर्स और अपनी रियासत के बड़े जंगलों में शिकार करते हुए बिताया करते थे. कश्मीर में तब उनके सबसे बड़े विरोधी शेख अब्दुल्ला थे. अब्दुल्ला का जन्म शॉल बेचने वाले एक व्यापारी के घर में हुआ था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.एससी की थी. पढ़ने में कुशाग्र होने के साथ-साथ वह शानदार वक्ता भी थे. उन्हें अपनी बातें तर्कों, तथ्यों के साथ रखनी आती थी.

शेख अब्दुल्ला ने पहले प्राइवेट स्कूल में टीचर की नौकरी की, फिर सियासत में कूद पड़े. उन्होंने सवाल उठाना शुरू किया कि इस सूबे में मुसलमानों के साथ भेदभाव वाला सलूक क्यों हो रहा है, बहुसंख्यक होते हुए वो नौकरी और दूसरी बातों में पीछे हैं.

1932 में उन्होंने महाराजा के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को आवाज देने के लिए ऑल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन किया. छह साल के बाद उन्होंने इसका नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस रख लिया, जिसमें हिंदू और सिख समुदाय के लोग भी शामिल होने लगे. इसी समय अब्दुल्ला ने जवाहरलाल नेहरू से भी नजदीकी बढ़ाई. दोनों हिंदू-मुस्लिम एकता और समाजवाद पर एकमत थे. नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में नजदीकियां होने लगीं.

40 के दशक में नेहरू और शेख अब्दुल्ला की नजदीकियां बढ़ने लगी थीं


1940 के दशक में अब्दुल्ला कश्मीर के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके थे. कई बार वह जेल में और जेल के बाहर रहे. आजादी से पहले अब्दुल्ला ने कश्मीर में राजतंत्र की जगह प्रजातंत्र लाने के लिए आंदोलन शुरू किया। उन्हें जेल में डाल दिया गया.

महाराजा हर हाल में अपने राज्य को स्वतंत्र रखना चाहते थे
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महाराजा के मन में स्वतंत्र होने का विचार जड़ें जमा चुका था. वह कांग्रेस से नफरत करते थे, इसलिए भारत में शामिल होने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. लेकिन अगर वो पाकिस्तान में शामिल हो जाते तो उनके हिंदू राजवंश का सूरज अस्त हो जाता. सितम्बर 1947 के आसपास खबरें मिलने लगीं कि पाकिस्तान बड़ी संख्या में कश्मीर में घुसपैठियों को भेजना चाहता है. इस बीच 25 सितम्बर 1947 को महाराजा ने शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा कर दिया.

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डोमिनिक लेपियर की किताब "फ्रीडम एट मिडनाइट" कहती है, "जहां तक महाराजा हरिसिंह का सवाल है तो वो अब भी आजाद कश्मीर के ख्वाब में जी रहे थे. 12 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के उप प्रधानमंत्री ने दिल्ली में कहा कि हम भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ दोस्ताना संबंध कायम रखना चाहते हैं. महाराजा की महत्वाकांक्षा कश्मीर को पूरब का स्विट्जरलैंड बनाने की है. एक ऐसा मुुल्क जो बिल्कुल निरपेक्ष होगा. उन्होंने आगे कहा कि केवल एक ही चीज हमारी राय बदल सकती है और वो ये है कि अगर दोनों देशों में कोई भी हमारे खिलाफ शक्ति का इस्तेमाल करता है तो हम अपनी राय पर पुनर्विचार करेंगे."

महाराजा हरि सिंह को लगता था कि कश्मीर एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत और पाकिस्तान के बीच बना रह सकेगा


हथियारबंद कबायलियों का हमला
इन शब्दों के बोले जाने के केवल दो हफ्ते बाद ही हजारों हथियारबंद कबायलियों ने राज्य पर उत्तर दिशा से हमला कर दिया. 22 अक्टूबर को वो उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और कश्मीर के बीच की सरहद को पार कर गए और तेजी से राजधानी श्रीनगर की ओर बढ़े. इन हमलावरों में ज्यादातर पठान थे, जो उस इलाके से आए थे जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया है. इन कबायली विद्रोहियों ने बारामूला में बड़ा उत्पात मचाया. लूटपाट की और महिलाओं और लड़कियों से दुष्कर्म किया.

महाराजा ने भारत से मदद मांगी
वीपी मेनन ने अपनी किताब "पॉलिटिकल इंटीग्रेशन आफ इंडिया" में लिखा,  "24 अक्टूबर को महाराजा ने भारत सरकार को सैनिक सहायता का संदेश भेजा. अगले दिन दिल्ली में भारत की सुरक्षा समिति की बैठक हुई. वीपी मेनन को जहाज से तुरंत श्रीनगर रवाना किया गया. उन्होंने श्रीनगर में महाराजा से मुलाकात करने के बाद उन्हें हमलावरों से सुरक्षित जम्मू जाने की सलाह दी. नेहरू पाकिस्तान के कबायलियों से मुकाबले के लिए भारतीय सेना को फौरन कश्मीर भेजना चाहते थे. माउंटबेटन ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया."

उन्होंने महाराजा से पहले विलय के कागजों पर दस्तखत करा लेने को कहा। उनका साफ कहना था कि बिना कानूनी विलय के वह ब्रिटिश अफसरों को भारतीय सेना के साथ नहीं जाने देंगे. 26 अक्टूबर को वीपी मेनन को जम्मू में महाराजा के पास फिर से भेजा गया. वहां मेनन से उनसे विलय पत्र पर दस्तखत कराया और दिल्ली आ गए.

भारतीय सैनिक श्रीनगर पहुंचने शुरू हो गए
जैसे ही ये कानूनी कार्यवाही पूरी हुई. नई दिल्ली ने माउंटबेटन की हिचकिचाहट की परवाह किए बगैर भारतीय सैनिकों से भरे विमान श्रीनगर भेजने शुरू कर दिए, तब तक हमलावर श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर रह गए थे. जब भारतीय जवानों का पहला जत्था श्रीनगर हवाई अड्डे पर पहुंचा तो हमलावर हवाई अड्डे की सरहद तक आ पहुंचे थे. अगर कबायलियों ने बारामूला में लूटपाट और औरतों के साथ दुष्कर्म में समय बर्बाद नहीं किया होता तो वो हवाई अड्डे पर कब्जा कर चुके होते और भारतीय विमानों को वहां उतारना मुश्किल हो जाता.

कश्मीर के महाराजा हरिसिंह और भारत सरकार में विलय पत्र में हस्ताक्षर होते ही भारतीय फौजें श्रीनगर हवाईअड्डे पर उतरने लगीं


इसके बाद भारत ने उरी तक के क्षेत्र से कबायलियों को खदेड़ते हुए इसे अपने कब्जेे में ले लिया. कश्मीर को लेकर दोनों देशों में तनातनी चरम पर थी. ये तब तक जारी रही जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली संयुक्त सुरक्षा समिति की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली आए थे. वह और नेहरू इस बात पर सहमत हो गए थे कि पाकिस्तान कबायलियों को लड़ाई बंद करके जल्दी से जल्दी वापस लौटने के लिए कहेगा. भारत भी अपनी ज्यादातर सेनाएं हटा लेगा. संयुक्त राष्ट्र को जनमत संग्रह के लिए एक कमीशन भेजने के लिए कहा जाएगा.

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ये बड़ी भूल साबित हुई
माउंटबेटन की सलाह से ही भारत इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले गया था. ये एक बड़ी भूल साबित हुई. बहुत से भारतीय नेता इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ब्रिटेन पाकिस्तान का साथ देगा. यही हुआ भी. अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर कश्मीर में अब्दुल्ला सरकार को हटाए जाने और जनमत संग्रह होने तक कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में लाए जाने की मांग की.

महाराजा बने रहे राज्य के संवैधानिक प्रमुख
भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक संबंध को लेकर बातचीत की. इसी के तहत राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में बरकरार रही, लेकिन शेख अब्दुल्ला का आपातकालीन प्रशासक के पद पर नियुक्त कर राज्य में सरकार चलाने की जिम्मेदारी उन्हें दे दी गई. इसके बाद उन्हें 05 मार्च 1948 को राज्य का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया.

इस मीटिंग के नतीजे में बाद में संविधान के अंदर आर्टिकल 370 को जोड़ा गया. आर्टिकल 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देता है. इसके तुरंत राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने राज्य में 35 ए लगाने की अनुमति दे दी. 1954 में जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान बना. उसके बाद धीरे-धीरे कश्मीर से राजवंश गायब होता चला गया.

यूं कश्मीर में खत्म हुआ राजवंश का युग
राजमोहन गांधी की किताब "पटेल ए लाइफ" में कश्मीर के तत्कालीन युवराज कर्ण सिंह के हवाले से कहा गया, "नेहरू ने ये सरदार पटेल पर छोड़ दिया था कि वो मेरे पिता को कैसे कश्मीर से हटाते हैं. 29 अप्रैल 1949 को हमने सरदार पटेल के घर पर साथ में भोजन किया. फिर डिनर के बाद सरदार मेरे पेरेंट्स को लेकर अलग कमरे में चले गए. जब वो लौटे तो चेहरा फीका पड़ा हुआ था और मां अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थीं."

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कर्ण सिंह का कहना था, "सरदार पटेल ने पिताजी से विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा कि उन्हें कुछ महीनों के लिए कश्मीर से बाहर चले जाना चाहिए. पटेल की बात सुनकर पिताजी अवाक रह गए, लेकिन पटेल का चेहरा सख्त था. उन्होंने ये भी कहा कि ये राष्ट्रहित में होगा. जब सरदार पटेल हमें बाहर गेट तक छोड़ने आए तो उनका चेहरे भींचा हुआ था, सख्ती बरकरार थी."

हालांकि इसके बाद जम्मू-कश्मीर में बड़ी सियासी उठापटक हुई. एक जमाने में नेहरू के करीबी रहे शेख अब्दुल्ला को खुद नेहरू ने लंबे समय के लिए जेल में डाल दिया.

1952 के बाद सियासी तौर पर जो बदलाव हुए और कश्मीर का संविधान तैयार हुआ, उसके बाद कश्मीर का राजवंश पृष्ठभूमि में चला गया


राज्य का पहला चुनाव 
1957 में जम्मू-कश्मीर में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए. इसमें जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस विजयी रही और पार्टी के नेता बख्शी गुलाम मोहम्मद मुख्यमंत्री बने. तब से लेकर अब तक वहां 11 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. 2014 में हुए चुनाव में पीडीपी और बीजेपी ने राज्य में गठबंधन सरकार बनाई थी, लेकिन वर्ष 2018 में बीजेपी ने महबूबा मुफ्ती की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. तब से वहां राज्यपाल शासन लागू है.

अब धारा 370 में अहम बदलाव 
भारत में विलय के बाद से कश्मीर को धारा 370 और 35ए के जरिये जो खास दर्जा मिला हुआ था. उसे केंद्र की एनडीए सरकार ने आर्टिकल 370 में संशोधन करके काफी कम कर दिया है. हालांकि अनुच्छेद 370 को पूरी तरह हटाया नहीं गया है, बल्कि इसके पहले दो उपबंधों में जिस तरह बदलाव हुआ है, उससे इस राज्य पर केंद्र की पकड़ ना केवल और मजबूत होगी, बल्कि आने वाले समय में यहां कई तरह के संविधान संशोधन करके नियमों में बदलाव का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है. सरकार ने अलबत्ता 35-ए को जरूर पूरी तरह से हटा दिया है. इसके साथ ही इस पूरे राज्य को दो हिस्सों में बांटने का फैसला लिया गया है. एक जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख- इसमें जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित विधानसभा रहेगी तो लद्दाख पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश रहेगा.

क्या था आर्टिकल 370 और जम्मू-कश्मीर से इसके हटने के बाद क्या होगा असर!
First published: August 5, 2019, 1:54 PM IST
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