मिडास टच वाले धोनी की विदाई के लिए परफेक्ट प्लेटफॉर्म है वर्ल्ड कप

धोनी का 15 साल का भारतीय क्रिकेट टीम का सफर जितना सुनहरा रहा है, उतना कम क्रिकेटरों का होता है. उनकी कहानी फर्श से अर्श पर पहुंचने की है. जो लोग सपनों में देखते हैं, उसे धोनी ने साकार करके दिखाया

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 4:07 PM IST
मिडास टच वाले धोनी की विदाई के लिए परफेक्ट प्लेटफॉर्म है वर्ल्ड कप
धोनी 2011 में वर्ल्ड कप के साथ
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 4:07 PM IST
ये दिसंबर 2004 का समय था. भारतीय टीम वनडे मैच खेलने के लिए बांग्लादेश जाने वाली थी. कुछ समय पहले ही प्रथम श्रेणी क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी ने आक्रामक बल्लेबाजी से चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा था. इसी के चलते उन्हें बांग्लादेश का दौरा करने वाली टीम में चुन लिया गया, तब वो रांची से करीब 50 किलोमीटर दूर मैच खेल रहे थे. जब उन्हें इसकी सूचना दी गई तो वो लंबे बालों वाले शर्मीले युवक के रूप में मीडिया के सामने आए. बात करने में हिचकिचाहट थी लेकिन आत्मविश्वास साफ दिखा.

एक दूसरा दृश्य और उभरता है..
02 अप्रैल 2011 की रात. मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में धोनी की टीम फाइनल में श्रीलंका को हराने के बाद वर्ल्ड कप चैंपियन बनी थी. पूरा देश खुशी की लहर पर सवार था. जीत के बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी जब अपने टीम साथी युवराज सिंह को साथ लेकर ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस में आए. तो उनका चेहरा खुशी से दपदपा रहा था, हालांकि उन क्षणों में भी वो संयमी और जमीन को पकड़े हुए क्रिकेटर लगे, जो थोड़ी देर पहले मिली असाधारण सफलता को महसूस करने की कोशिश कर रहा था. उन्होंने किसी सवाल के जवाब में मजाक में कहा-''आई एम लकी.''

कहने की जरूरत नहीं कि महेंद्र सिंह धोनी ने अपना सफर कहां से शुरू किया था और वो किन ऊंचाइयों तक पहुंचे. वर्ल्ड कप उनके करियर का आखिरी पड़ाव कहा जा रहा है- वैसे अलविदा कहने का इससे बेहतरीन प्लेटफॉर्म और हो भी नहीं सकता. वो निर्विवाद तौर पर भारत के सफल कप्तान और बेहतरीन फिनिशर रहे हैं.

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कप्तानी छोड़ने के बाद भी विराट कोहली की टीम में उनका कद कप्तान सरीखा ही रहा है. कहा जाता रहा कि विराट कोहली इसलिए सफल हैं, क्योंकि उनके साथ धोनी जैसा रणनीति में माहिर शख्स मौजूद है.

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धोनी हैं सब कुछ मुमकिन है
हालांकि पिछले कुछ सालों में धोनी की बैटिंग और बढ़ती उम्र पर सवाल भी उठे. लेकिन हर बार वो सवालों को अपने दमदार खेल से बाउंड्री के बाहर भेजते रहे. पिछले कुछ सालों से वो टीम के संकटमोचक बने रहे. अगर धोनी क्रीज पर होते थे तो सब कुछ मुमकिन लगता था. हालांकि ये बात सही है कि वर्ल्ड कप में उनकी बैटिंग कुछ धीमी रही है.

वैसे धोनी अपने करियर में जिन घुमावों, पड़ावों और चक्रव्यूह को पार करते हुए लार्जर देन लाइफ बने, उसमें उनकी मेहनत और किस्मत दोनों का हाथ था. लेकिन किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है, जो मेहनत से नहीं चूकते. वो मेहनत के बल पर टीम में आए. मेहनत के बल पर टीम में टिके. किस्मत ने उन्हें कप्तान बनने का मौका दिया लेकिन वो वहां इसलिए टिके और सफल हुए क्योंकि वो उसके काबिल थे.

उनके बचपन के कोच चंचल भट्टाचार्य ने एक बार बातचीत में मुझसे कहा था, ऐसा अनुशासित खिलाड़ी मैंने कम देखा होगा,जितने वह थे. कभी कैसी भी मेहनत से पीछे नहीं हटते थे. केवल और केवल खेल पर फोकस करते थे. उनके आसपास या सोहबत में कोई ऐसा खिलाड़ी या साथी नहीं था, जिसे गलत कहा जाए. वह ऐसे लोगों के साथ रहना शायद पसंद भी नहीं करते थे.

धोनी के स्वाभाव और पृष्ठभूमि ने उन्हें अलग किस्म की शख्सियत दी, जो टीम इंडिया में कप्तानी के दौरान उनकी नई शैली बनकर सामने आई


पृष्ठभूमि से मिलीं लीडरशिप की कई खासियतें 
निम्न मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि ने उन्हें एक खासियत दी, वो थी सबको साथ लेकर चलने की. बडबोला नहीं होने की और सभी का सम्मान करने की. धोनी के कप्तान बनने के बाद टीम इंडिया का ड्रेसिंग रूम और मैदान पर टीम का माहौल कूल हो गया. क्योंकि धोनी कूल थे और गर्ममिजाजी उनके स्वाभाव में नहीं थी. उनका फंडा बगैर तनाव अपनी टीम को साथ लेकर चलने में थी.

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वर्ल्ड कप फाइनल से पहले जब प्रेस कांफ्रेंस में उनसे सवाल पूछा गया कि वो टीम को कैसे कंट्रोल करते हैं, कैसे रणनीति बनाते हैं. उनका जवाब चकित करने वाला था. मेरी टीम में हर किसी को अपनी भूमिका मालूम है. मैं किसी को कंट्रोल नहीं करता बल्कि मैने अलग-अलग डिपार्टमेंट बनाकर रखे हैं, उनकी जिम्मेदारी अलग खिलाड़ियों के पास हैं. वो अपनी रणनीतियां बनाते हैं और फिर मुझसे डिस्कस करते हैं.

कभी बड़बोले नहीं रहे
15 साल के अपने करियर में धोनी ने शायद कोई बड़बोला बयान दिया हो. उन्होंने कभी ऐसी बात नहीं की, जिससे लगा हो कि सफलता का नशा उनके सिर पर सवार हो गया हो. हालांकि विवादों से उनका नाता नहीं रहा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता. उन पर हमेशा पसंदीदा खिलाडिय़ों को टीम में जगह देने के आरोप लगे. कुछ लोगों ने उन्हें हठी और जिद्दी भी कहा.

उनके नजदीकी मानते हैं कि वो बेशक रिएक्ट नहीं करते लेकिन जो एक बार सोच लेते हैं, करते वही हैं. आईपीएल में फिक्सिंग विवाद के छींटे भी उन पर पड़े लेकिन उन्होंने कभी एक शब्द इस बारे में नहीं कहा. बाद में समय के साथ खुद समय ने उनका दामन साफ कर दिया.

वर्ष 2007 में भारतीय क्रिकेट टीम का कोई सीनियर खिलाड़ी टी20 वर्ल्ड कप की कप्तानी लेने को तैयार नहीं था, तब धौनी को ये जिम्मेदारी मिली, जिन्होंने इसे ऐसा अवसर बनाया कि सफल कप्तान बन गए


2007 में कप्तान बनाना उन्हें गिफ्ट देना नहीं था
वर्ष 2007 में अगर सीनियर खिलाडिय़ों ने उन्हें पहले टी20 वर्ल्ड कप का कप्तान बनाया था, तो इसके पीछे उनकी सदाशयता नहीं थी. एक तो वो उस फार्मेट में खेलना नहीं चाहते थे. दूसरे इसके जरिये उन्हें बलि का बकरा बनाने की तैयारी थी. क्योंकि सभी को लगता था कि टी20 फार्मेट में कुछ कर पाना भारतीय टीम के वश की बात नहीं. लेकिन धोनी ने उस अवसर को अपने पक्ष में इतनी अच्छी तरह भुनाया कि उनके लिए आगे सब कुछ बदलता गया.

तब तीन गुटों में बंटी थी टीम 
जब टीम में सीनियर खिलाड़ी हुआ करते थे, तो उनमें कई के साथ धोनी के संबंध कोल्डवार सरीखे बताए जाते थे. जब वो टीम में नए आए थे तो टीम इंडिया तीन खेमों में बंटी थी. तीन गुटों में कोई उन्हें नहीं देखना चाहता, लिहाजा उन्होंने बीसीसीआई के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन से करीबी बढ़ाई. ये करीबी तब और बढ़ी जब श्रीनिवासन ने उन्हें चेन्नई सुपर किंग्स का कप्तान बनाया. ये एक ऐसा मोड़ था, जिसके बाद वो इतने मजबूत हो गए कि उनके खिलाफ कुछ कर पाना संभव नहीं रह गया. इसी के चलते वह टीम से धीरे-धीरे करके सीनियर्स से निजात भी पा सके.

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उनके मजबूत प्रतिद्वंद्वी भी जानते हैं कि उनका कद भारतीय क्रिकेट में किसी भी कप्तान से बहुत बड़ा हो चुका है. लेकिन एक छोटी जगह से टीम इंडिया में जगह बनाने वाले खिलाड़ी के लिए तीन दमदार गुटों के बीच जगह बनाना और खुद को बचाए रखना खासा मुश्किल रहा होगा. शायद छोटे शहर के लोग अपने अस्तित्व को बचाने की कला भी ज्यादा जानते हैं और उनके बीच से राह बनाना.

टीम को ऊंचाइयां और आत्मविश्वास से लवरेज किया
अब धोनी ने अपने 15 साल के करियर में कई रिकॉर्ड बनाए हैं और हर किसी को महसूस करा दिया है कि किस तरह उन्होंने भारतीय टीम को ऊंचाइय़ों पर पहुंचा दिया. टीम एक नए आत्मविश्वास से लबरेज हो गई. हालांकि उनके बारे में ये कहा जाता रहा है कि उनकी ज्यादातर सफलताएं अपनी जमीन पर रहीं बजाय विदेशी जमीं के. वर्ष 2012 से लेकर 2014 का साल भारतीय क्रिकेट के लिए अच्छा नहीं था. तब टीम को बाहरी दौरों में बड़ी नाकामियां मिलीं थीं लेकिन धोनी खुद को बचाने में सफल रहे थे. हालांकि इसके बाद उन्होंने खुद कप्तानी छोड़ी. टेस्ट मैच से भी किनारा किया.

उनके रांची के बचपन के दोस्त कहते हैं कि वो जब भी वहां आते हैं तो उनसे उसी तरह मिलते हैं, जिस तरह पहले


प्रचुर संपत्ति है उनके पास 
वो भारतीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाले खिलाड़ी कहे जा सकते हैं. अब उनके पास प्रचुर संपत्ति है. तमाम जगहों पर धन निवेश कर रखा है. कई वेंचर शुरू कर चुके हैं. उनके पास महंगी कारों और बाइक का काफिला है. देश के महानगरों में उनके पास आलीशान फ्लैट हैं. उनकी पूरी जीवनशैली बदल चुकी है. गृहनगर रांची में उनका नया बंगला वहां से सबसे शानदार घरों में है. हालांकि अब वह रांची कम ही जाते हैं. आमतौर उनका समय दिल्ली और मुंबई में ज्यादा बीतता है.

अब भी हैं यारों के यार
हालांकि उनके दोस्त कहते हैं कि वह आज भी नहीं बदले हैं. जमीन से उतने ही जुड़े हैं,जितना पहले. सफलता के बावजूद उनका व्यक्तित्व सामान्य लोगों सरीखा ही है. आज भी वह उतने ही शर्मीले हैं,जितना पहले. धोनी को युवावय से जानने वाले रांची के ही उनके एक पत्रकार मित्र कहते हैं, ''उनमें बदलाव तो आया है, लेकिन अपने परिचितों के लिए वह आज भी वैसे ही हैं. ऐसा लगता है कि वह कुछ भी नहीं भूले. आज भी जब वह रांची में होते हैं तो सुबह मोटरसाइकल उठाते हैं और प्रैक्टिस पर पहुंच जाते हैं. उनका परिवार भी वैसे का वैसा ही है. जमीन से जुड़ा हुआ.''

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First published: July 3, 2019, 3:39 PM IST
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