जिसे आपने डस्टबिन समझा वो मरियम और विली का घर है

1993 में आई फिल्म ‘फ्री विली’ की कहानी हमें एक सुखद अंत की ओर ले जाती है. जहां हम इंसान और मछली के बीच एक अनूठे रिश्ते की सकारात्मक कहानी को सुनते हैं, खुद के महान होने का सुख पाते हैं. यह महानता अभी हाल ही में हमें एक वायरल वीडियो में नज़र आई जिसमें डुगोंग नाम के एक समुद्री स्तनपायी/मैमल का बच्चा बीमारी के हाल में समुद्र संरक्षण संस्था को मिला.

News18Hindi
Updated: August 22, 2019, 1:40 PM IST
जिसे आपने डस्टबिन समझा वो मरियम और विली का घर है
विली व्हेल
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Updated: August 22, 2019, 1:40 PM IST
पंकज रामेन्दु

अपने झुंड से अलग हुआ एक व्हेल (Whale) का बच्चा, व्हेल को पकड़ने वाले जहाज के हत्थे लग जाता है. उसे पकड़कर एक मनोरंजन पार्क (Entertainment park) को सौंप दिया जाता है. वो वहां अकेला है, परेशान है, परिवार से बिछड़ा हुआ है और सबसे बड़ी बात अपने घर से अलग और दूर है. एक ऐसी जगह जहां पानी तो है पर उसमें वो खारापन नहीं है, जो उसकी सांसों के साथ अंदर-बाहर होता है,  जो उसे एहसास करवा सके कि वो घर में है.

यह व्हेल का बच्चा एक बार एक अनाथ लड़के को बचाता है, जो उसी पार्क में किसी गलती की सजा भुगत रहा होता है. दोनों की दोस्ती गहरी होती है. व्हेल के बच्चे का नाम है विली. एक वक्त ऐसा आता है, जब उसी लड़के के इशारे पर विली तमाम तरह के करतब दिखाने लगता है. पार्क के मालिक को इसमें भी एक धंधा नज़र आता है और वो लड़के को पार्क में पक्की नौकरी दे देता है.

लेकिन लड़के और विली के पहले शो के दिन विली पानी से बाहर निकलने से इंकार कर देता है. बाद में लड़के को अहसास होता है कि विली के मां बाप दूर समुद्र में उसकी राह देख रहे हैं और यहां इंसान अपने फायदे के लिए उसे कैद किए हुए हैं. वो लड़का अपने दोस्तों के साथ मिलकर विली को आज़ाद करवाने की ठानता है.

अंत में विली समुद्र के किनारे पर पड़ा हुआ है और तैर कर अंदर नहीं जा पाता लेकिन उसका दोस्त उसे ढाढ़स बंधाता है, विली अपनी पूरी ताकत लगाकर आखिर समुद्र में चला जाता है और अपने मां-बाप से मिलता है.

1993 में आई फिल्म ‘फ्री विली’ की कहानी हमें एक सुखद अंत की ओर ले जाती है. जहां हम इंसान और मछली के बीच एक अनूठे रिश्ते की सकारात्मक कहानी को सुनते हैं, खुद के महान होने का सुख पाते हैं. यह महानता अभी हाल ही में हमें एक वायरल वीडियो में नज़र आई जिसमें डुगोंग नाम के एक समुद्री स्तनपायी/मैमल का बच्चा बीमारी के हाल में समुद्र संरक्षण संस्था को मिला.

story of mariyam and willi baby dugong found in thailand which have helped spread ocean conservation
विली व्हेल

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बाद में उस बच्चे के इंसान के पैरों में लिपटने का एक वीडियो बन गया, जिसमें हमारी उस जानवर के साथ बरती जा रही नर्मी और उससे लगाव को मानवता की मिसाल के तौर पर पेश किया गया. एक महीने के भीतर ही मरियम (डुगोंग का ये बच्चा जब थाइलैंड के दक्षिण पश्चिम समुद्रीतट पर पाया गया था तो इसका नाम मरियम रखा गया था) दुनिया से रुखसत कर गया.

ऑटोप्सी की रिपोर्ट में जानकारी मिली की उसकी आंत में प्लास्टिक पाया गया था, जिसकी वजह से उसे इन्फेक्शन हो गया और उसकी मौत हो गई. थाइलैंड में समुद्री गाय के नाम से मशहूर डुगोंग एक दुर्लभ समुद्री स्तनपायी है, जिसकी संख्या सिमट कर कुछ सौ ही रह गई है.

डुगोंग के इंसान से लिपटे हुए जिस फोटो को हमने वायरल किया, उसमें भी चर्चा का विषय मछली और इंसान का रिश्ता था. उसे देखने वाले भी सो-स्वीट, कितना क्यूट है, जैसे भावों के बीच कहीं ना कहीं उस डरावने पहलू के बारे मे गंभीर नहीं हो पा रहे, जिसने इस दुर्लभ प्राणी की जान ली – प्लास्टिक.

वैज्ञानिकों का कहना है कि हर साल समुद्र में करीब 80 लाख मैट्रिक टन प्लास्टिक जा रहा है. शार्क की जिंदगी को करीब से दिखाने वाली डॉक्यूमेंट्री सीरिज़ ‘आइ विटनेस’ में बताया गया है कि किस तरह समुद्र के सबसे बड़े शिकारी के पेट में कई बार प्लास्टिक के साथ, कैन और दूसरा ना गलने वाला कचरा पाया गया है.

शार्क को जब 1975 में पहली बार स्टीवन स्पिलबर्ग सिनेमा पर लेकर आए तो उसने ऐसा खौफ कायम किया था, जो कई दशकों तक दर्शकों के मन में समाया रहा. पीटर बैंचले के उपन्यास पर आधारित स्पीलबर्ग की सफल और ऐतिहासिक रचना “जॉज़’ एक शार्क के हमले पर आधारित फिल्म है. इसमें शार्क को उसके खुले हुए जबड़ों के साथ इतना खतरनाक दिखाया गया है कि उसका डर आने वाले कई दशकों तक लोगों के मन में रहा.

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डुगोंग


यही नहीं सफलता के परचम लहराने वाली इस फिल्म में शार्क को इस तरह प्रदर्शित किया गया, जैसे वो इंसानों के लिए एक भंयकर बड़ा खतरा है और उसे मार दिया जाना ही एक उपाय है.

हालांकि दुनिया भर में शार्क का हमला काफी कम है, लेकिन फ्लोरिडा राज्य में धरती की किसी भी दूसरी जगह से ज्यादा हमले होते हैं. दुनियाभर में बगैर उकसाए गए हमलों में एक चौथाई का घर यही जगह है. जो बात फ्लोरिडा को अलग बनाती है, वो ये है कि यहां पानी में बहुत ज्यादा लोग मनोरंजन के लिए आते हैं.

दरअसल हम इंसान शार्क के घर में पहुंच गए हैं. शार्क तो बस अपनी जिंदगी के लिए लड़ती है, वो लोगों के पीछे नहीं जा रही है, बल्कि इंसान ने उसको फांसा हैं, वो शार्क को अपने पास लाते हैं, ये हमला नहीं है, ये शार्क की अपनी जिंदगी को बचाने की लड़ाई है. इसके साथ मौसम में आ रहे बदलाव और इंसानों के उसके चारे को हड़पने की वजह से वो अपनी भूख मिटाने के लिए किनारे तक आने लगी है.

दरअसल सबको अपने काबू में रखना और अपने हिसाब से चलाना हम इंसानों की फितरत में है. चाहे पक्षी हो, जंगली जानवर हो या फिर समुद्री जीव. हम चाहते हैं, सब हमारे अनुसार जीएं और तब तक ही जीएं जब तक हम चाहते हैं. हम जानवरों को अपने मुताबिक ढालने में लगे हुए हैं.

हमारी मंशा तो ये है कि शार्क, डुगोंग जैसे समुद्री जीव भी समुद्री भोजन छोड़कर हमारी तरह चिप्स खाने लगे और कोल्ड ड्रिंक पीने लगे. यही नहीं हम प्रकृति में मौजूद हर जानवर को अपने चारे की तरह ही देखते हैं. हम हर जानवर के अंदर अपना फायदा देखते हैं. चाहे वो हमारी ज़बान के लिए हो, हमारी सेहत के लिए हो या फिर हमारे घरों की सुंदरता को बनाए रखने के लिए हो.

1999 में आई फिल्म ‘डीप ब्लू सी’ ऐसी ही कहानी बयान करती है, जिसमें कुछ वैज्ञानिक इंसानों को होने वाली अल्जाइमर बीमारी को दूर करने के लिए मेको शार्क का इस्तेमाल करते हैं. अपने प्रयोग में वो उसके दिमाग के आकार को इतना बढ़ा देते हैं कि शार्क ज्यादा चालाक और जानलेवा हो जाती है. फिल्म के अंत में हम पाते हैं कि शार्क मानवजाति के लिए खतरा बन जाती है और पूरी मानवजाति की भलाई के लिए उसे मार दिया जाता है.

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समंदर में प्लास्टिक का कचरा बढ़ता जा रहा है


जब उसकी मौत होती है तो इस तरह से दिखाया जाता है गोया उस शार्क ने दैत्य बन कर ही धरती पर जन्म लिया था. साथ में ये भी समझ में आता है कि हम मानव इस कदर निर्दोष और मासूम हैं कि पूरी कायनात हमारे वजूद को मिटाने में लगी हुई है लेकिन हमारे अंदर की भलाई हमें हर बार बचा लेती है.

डुगोंग के फोटो और वीडियो को देखकर अभिभूत होने वाले हम लोग उसके पेट में जाने वाले प्लास्टिक को लेकर ऐसे अनजान बने हुए हैं, जैसे खुद डुगोंग के परिवार ने पास के मॉल से प्लास्टिक में बंधा सामान खरीदा हो और प्लास्टिक के साथ खा लिया हो. सारी गलती इन जानवरों की है, इनमें खाने की तमीज नहीं है और ना ही अकल है.

हम इंसान ही इन्हें अकल और ज्ञान दे सकते हैं. क्योंकि हम तो अपने घरों में बहुत साफ सफाई रख रहे हैं, यहां तक कि स्वच्छता की मिसाल पेश करते हम पूरे देश में झाड़ू लिए घूम रहे हैं. गीला कचरा-सूखा कचरा करते फिर रहे हैं लेकिन अपने घरों में या पूरे देश भर में कचरे को सूखा गीला करते हमने कभी किसी से पूछने की ज़हमत ही नहीं की कि आखिर ये सूखा कचरा जा किधर रहा है.

कुल मिलाकर हम अपने घर को साफ करके दूसरे के घर को गंदा कर रहे हैं क्योंकि अभी समुद्र या स्पेस में हम बसे नहीं है. रही बात डुगोंग की तो है तो वो समुद्री गाय ही है, धरती पर जिस गाय को अपनी माता मान कर लोगों की जान आफत में आ रही है, वो तक रास्तों पर इसी प्लास्टिक को खा कर अपना गुज़ारा कर रही है.

माइकल जैक्सन ने विली के भावों को जो शब्द दिए थे जो आज भी माक़ूल लगते हैं. इंसानों पर भरोसा करने वाले ये मासूम जानवर फ्री विली में कहते हैं..

मुझे ऐसा संभालना जैसे जॉर्डन नदी संभालती है,
तब मैं कह पाऊंगा की तू मेरा दोस्त है,
मुझे वैसे गले लगाओ जैसे मैं तुम्हारा भाई हूं
मां की तरह मुझे प्यार करो
क्या तुम मेरे साथ ऐसे रहोगे,

थक जाऊं, तो क्या मुझे संभालोगे
जब मैं गलत हूं तो मुझे डांटोगे,
मैं भटक जाऊं तो मुझे ढूंढोगे.
मैंने सुना है कि इंसान को भरोसेमंद होना चाहिए,
जब तक हो चलते रहना चाहिए
आखिर तक लड़ते रहना चाहिए,
तो क्या तुम वहीं इंसान हो,

पर हर कोई मुझ पर काबू पाना चाहता है,
लगता है जैसे दुनिया ने मेरे किरदार तय कर लिया है,
मैं समझ नहीं पा रहा हूं,
क्या तुम मुझे बताओगे,
क्या तुम मेरे साथ ऐसे रहोगे,
और क्या मेरी देखरेख कर पाओगे,
मुझे प्यार करो, मुझे खिलाओ
मुझे चूमो, मुझे आजाद रहने दो
तभी मैं खुश रह पाऊंगा..

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First published: August 22, 2019, 1:37 PM IST
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