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INX केस: बेल न मिलने पर चिदंबरम को क्यों याद आए रंगा-बिल्ला? जानें इनकी कारिस्तानी

News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 2:10 PM IST
INX केस: बेल न मिलने पर चिदंबरम को क्यों याद आए रंगा-बिल्ला? जानें इनकी कारिस्तानी
पी. चिदंबरम ने जमानत देने से इनकार किए जाने पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या वह ‘रंगा-बिल्ला’ जैसे अपराधी हैं.

रंगा और बिल्ला (Ranga and Billa) को 1978 में दिल्ली में दो भाई-बहन गीता और संजय चोपड़ा के अपहरण, रेप (Rape) और हत्या (Murder) का दोषी ठहराया गया था और इन दोनों को मौत की सजा सुनाई गई थी. इन दोनों अपराधियों को 1982 में फांसी दी गई थी.

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आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार (INX Media Scam) और धनशोधन मामले में 99 दिनों से जेल में बंद पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम (P Chidambaram) ने दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi Highcourt) द्वारा जमानत देने से इनकार किये जाने पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या वह ‘रंगा-बिल्ला’ जैसे अपराधी हैं. रंगा और बिल्ला का जिक्र कर पूर्व मंत्री ने उन दो क्रूर अपराधियों की याद दिला दी, जिन्होंने तकरीबन 40 पहले देश की राजधानी में घिनौनी घटना को अंजाम दिया था. आइए जानते हैं क्या है रंगा-बिल्ला केस की पूरी कहानी...

देश की राजधानी दिल्ली में 26 अगस्त 1978 की रात एडमिरल मदन मोहन और उनकी पत्नी बेचैन थे. इसकी वजह थी शाम से लापता उनके बच्चे संजय और गीता चोपड़ा. 17 साल की गीता अपने भाई के साथ शाम को निकली थी. दोनों को ऑल इंडिया रेडियो पहुंचना था, लेकिन रात के 11 बजे तक गीता और संजय की कोई खबर नहीं आई. एडमिरल चोपड़ा ने थक कर अपने बच्चों की तलाश शुरू की तो पता चला कि दोनों बच्चे जहां के लिए निकले थे, वहां पहुंचे ही नहीं. घबराए मां-बाप पुलिस के पास पहुंचे.

तीन दिन बीत गए लेकिन बच्चों की कोई खबर नहीं मिली. 29 अगस्त की सुबह एडमिरल चोपड़ा के दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजे पर पुलिस थी एक बुरी खबर के साथ. पुलिस को रिंग रोड पर एक लड़के और एक लड़की की लाश मिली थी. एडमिरल चोपड़ा और उनकी पत्नी सांस रोके रिंग रोड पहुंचे. वही हुआ जो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था. सामने था उनकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक मंजर. खून से सनी वो दो लाशें उनके मासूम बच्चों की गीता और संजय की थीं. इस सनसनीखेज वारदात ने दिल्ली शहर में सनसनी फैला दी. वारदात को सुर्खियों में ऐसी जगह मिली कि हरकत में आना पुलिस की मजबूरी बन गई.

पुलिस को फोन पर मिला सुराग

क्राइम ब्रांच ने इस मामले की जांच शुरू की. संजय और गीता के लापता होने के अगले ही दिन एक शख्स ने फोन पर बताया था कि उसने फिएट कार में एक लड़की को चीखते चिल्लाते देखा था. गाड़ी के शीशे बंद थे और वो तेज रफ्तार में सड़क पर दौड़ रही थी. गाड़ी का नंबर था HRK 8930. इस बीच राजेंद्र नगर पुलिस स्टेशन से एक और सनसनीखेज खबर आई वहां भी किसी ने पुलिस को एक फिएट कार के बारे में बताया था. खबर देने वाले के मुताबिक कार में चार लोग थे. पीछे बैठे एक लड़की और एक लड़का आगे बैठे लोगों से हाथापाई कर रहे थे. खास बात ये कि कार का नंबर वहीं था 8930.

रंगा और बिल्ला


पुलिस को यकीन होने लगा कि संजय और गीता की गुमशुदगी और उस फिएट कार में कहीं ना कहीं कोई रिश्ता है. शहर के चप्पे-चप्पे में उस कार की तलाश शुरू कर दी गई और काफी मशक्कत के बाद पुलिस को कार के बारे में कुछ सुराग मिल गए लेकिन जब वो कार और कार मालिक को तलाशते अपनी मंजिल पर पहुंचे तो हैरान रह गए. ट्रांसपोर्ट विभाग के रिकॉर्ड से पता चला की कार पानीपत में रहने वाले किसी रविंदर गुप्ता की है. सुराग की आस लगाए पुलिस पानीपत पहुंची लेकिन वहां तफ्तीश को बड़ा झटका लगा.फर्जी नंबर प्लेट
दरअसल HRK 8930 नंबर की गाड़ी वहां मौजूद तो थी लेकिन ना तो वो फिएट कार थी ना ही इस हाल में कि वो दिल्ली तक पहुंच सके. यानी जिस फिएट की पुलिस को तलाश थी उस पर फर्जी नंबर प्लेट लगी थी. कातिल तक पहुंचने का कोई सिरा पुलिस को नहीं मिल रहा था. पड़ताल के दौरान पुलिस को पता चला कि कुछ दिन पहले गीता चोपड़ा की एक फौजी अफसर के बेटे से नोंकझोक हुई थी. शक की सुई उस पर घूम गई कि कहीं उसी ने तो वारदात को अंजाम नहीं दिया लेकिन जांच के बाद उसे क्लीन चिट दे दी.

पुलिस हताश थी. अचानक उसे एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. कुछ वक्त पहले नौसेना की एक कमेटी ने कुछ सैनिकों को सजा सुनाई थी. वजह ये था कि वो कुछ तस्करों की मदद कर रहे थे. एडमिरल मदन चोपड़ा उस कमेटी के अहम सदस्य थे. इस बीच आई संजय और गीता की होश उड़ा देने वाली पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट रिपोर्ट के मुताबिक संजय के शरीर पर चोट के 21 निशान थे जबकि गीता के शरीर पर 6. दोनों का कत्ल तेज धारवाले किसी हथियार से किया गया लेकिन वो गुनाह बस इतना ही नहीं था.

फॉरेंसिक रिपोर्ट का खुलासा
रिपोर्ट में एक और सनसनीखेज बात थी जिसने सबके होश उड़ा दिए. हत्या से पहले गीता से बलात्कार हुआ था. कातिल ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया था. मौका-ए-वारदात पर मौजूद खून के धब्बे गीता की लाश के पास मिले कुछ बाल और मिट्टी के नमूनों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया. खून के धब्बों और बालों की जांच से साफ हो गया कि वारदात को अंजाम दो लोगों ने दिया. अब सवाल ये कि दोनों दरिंदे हैं कौन. फिर आई 31 अगस्त की शाम. पुलिस को खबर मिली की उत्तरी दिल्ली के मजलिस पार्क इलाके में एक फिएट कार लावारिस खड़ी थी. फिएट कार की बात सुनते ही पुलिस वालों के कान खड़े हो गए.

डर इसी बात का था कि मूसलाधार बारिश गाड़ी में लगे तमाम निशान मिटा चुकी होगी लेकिन फिर भी उसकी बारिकी से जांच शुरू की गई. अचानक एक पुलिस वाले की नजर पड़ी गाड़ी में रखी कुछ नंबर प्लेट्स पर. इनमें से एक नंबर था HRK 8930. ये वही नंबर था जिसने पिछले पांच दिनों से पुलिस के पसीने छुड़ा रखे थे. वही नंबर जिसे दो लोगों ने दिल्ली की सड़कों पर लोगों ने तेज रफ्तार से दौड़ते देखा था. नंबर प्लेट्स को फॉरेंसिक लैब भेज दिया गया.



फॉरेसिंक एक्सपर्ट ने गाड़ी के अंदर से उंगलियों के निशान भी तलाश लिए और उन निशानों को पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद अपराधियों से मिलाने के लिए भेज दिया गया. संजय गीता चोपड़ा हत्याकांड की गुत्थी उलझती जा रही थी. वारदात में इस्तेमाल गाड़ी में उंगलियों के निशान तो मिले लेकिन वो उंगलियां किसकी हैं. कातिलों की तलाश कर रहे क्राइम ब्रांच के अफसरों ने शातिर बदमाशों की फाइलें खंगालनी शुरू की. अचानक उनकी नजर एक फाइल के रिकॉर्ड पर टिक गई. ये फाइल थी मुंबई से फरार दो शातिर बदमाशों रंगा और बिल्ला की.

मुंबई पुलिस की एंट्री
छानबीन चल ही रही थी कि मुंबई क्राइम ब्रांच की एक टीम मुंबई पहुंची. उन्हें तलाश थी कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला की. दोनों पर फिरौती के लिए अपहरण और कार चोरी जैसे कई मामले दर्ज थे. दोनों बदमाश पुलिस हिरासत में फरार हुए थे. मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड में रंगा और बिल्ला के उंगलियों के निशान मौजूद थे.

पुलिस ने फौरन उन फिंगस प्रिंट्स को फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स को सौंपा और एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ. कार के अंदर मिले निशान किसी और के नहीं रंगा और बिल्ला के ही थे. पुलिस ने रंगा और बिल्ला के पोस्टर शहर के चप्पे चप्पे पर लगवा दिए. एक दिन खबर मिली की रंगा-बिल्ला की मिलती शक्ल के लोग रेलवे पुलिस के हत्थे चढ़े हैं. लगातार नाकामी झेल रही पुलिस को बिल्कुल यकीन नहीं था की वो दोनों रंगा और बिल्ला होंगे लेकिन पुलिस पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के लॉकअप में पहुंची तो सामने थे शातिर बदमाश रंगा और बिल्ला.

पूछताछ में गुनाह कबूले
रंगा और बिल्ला से पूछताछ हुई तो दो मासूमों के घिनौने हत्याकांड का राज परत दर परत खुलने लगा. 26 अगस्त की शाम ऑल इंडिया रेडियो जाने के लिए संजय और गीता चोपड़ा बस का इंतजार कर रहे थे अचानक एक फिएट कार उनके पास आकर रुकी. गीता को देखकर खूंखार अपराधी रंगा और बिल्ला की नीयत खराब हो गई. लिफ्ट देने के बहाने उन्होंने संजय और गीता को गाड़ी के अंदर बैठा लिया लेकिन ऑल इंडिया रेडियो जाने के बजाए वो फिएट कार मुड़ गई एक सुनसान रास्ते की तरफ.

खतरे का अंदाजा लगाते ही संजय और गीता ने शोर मचाना शुरू कर दिया लेकिन कार से निकलने की उनकी तमाम कोशिशों बेकार हो रही थीं. कई रास्तों को चीरती हुई वो कार रिज के सुनसान इलाके में जा पहुंची. बिल्ला ने फौरन गीता को गाड़ी से बाहर खींच लिया. इस बीच संजय के हाथ गाड़ी में पड़ी तलवार लग गई. बहन की इज्जत बचाने के लिए उसने पूरी ताकत से बिल्ला पर वार किया लेकिन बिल्ला और रंगा के सामने वो ठहर ना सका दोनों ने उसी तलवार से उसका कत्ल कर दिया फिर उन दोनों हैवानों ने मासूम गीता को हवस का शिकार बनाया और तलवार से उसे भी मौत के घाट उतार दिया.

1982 में दी गई फांसी
तमाम सबूत रंगा औऱ बिल्ला के खिलाफ थे. 7 अप्रैल 1979 कोर्ट ने उन दरिंदों को सजाए मौत का ऐतिहासिक फैसला सुनाया और 31 जनवरी 1982 को दोनों को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई. आपको बता दें कि इस केस के बाद भारत सरकार ने गीता और संजय चोपड़ा को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से नवाजा था और उनके ही नाम पर हर साल 26 जनवरी को 16 साल के कम उम्र बच्चों को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है.

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First published: November 28, 2019, 11:49 AM IST
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