कभी 10, अकबर रोड पर दूध पहुंचाते थे राजेश पायलट

इंदिरा गांधी के साथ राजेश पायलट.
इंदिरा गांधी के साथ राजेश पायलट.

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार संकट (Rajasthan Govt Crisis) में घिरी हुई है और दूसरी तरफ, दलबदल कानून के तहत आरोप झेल रहे सचिन पायलट का फैसला कोर्ट के हाथों में है. ऐसे में, कई तरह की चर्चाओं के बीच जानिए कि अपने पिता यानी पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट से कितने मिलते जुलते हैं उप मुख्यमंत्री सचिन के तेवर.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) भाजपा के वो नेता रहे, जिन्होंने सार्व​जनिक तौर पर अपने अतीत का ज़िक्र करते हुए खुद को 'चायवाला' बताया. दूसरी तरफ, एक समय कांग्रेस के दिग्गज नेताओं (Congress Leader) में शुमार रहे राजेश पायलट अपने करीबी लोगों के बीच अपने अतीत को याद करते हुए खुद को 'दूधवाला' बताया करते थे. राजस्थान में कांग्रेस सरकार पर आए संकट में सचिन पायलट इस तरह घिरे हैं कि उनकी तुलना उनके पिता से की जा रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष के लिए 1997 में हुई रेस में राजेश पायलट अपने पूरे दमखम के साथ सीताराम केसरी के साथ भिड़ने को तैयार हुए थे. जबकि केसरी का अध्यक्ष बनना तय माना जा रहा था. अब ऐसे ही हालात सचिन के सामने हैं, जब उन्हें राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के खिलाफ खड़े होने पर कांग्रेस का दुश्मन समझा जा रहा है. पिता पुत्र की तुलना तब भी की गई थी, जब राजस्थान में कांग्रेस की मौजूदा सरकार बनने के समय सचिन और गहलोत के बीच संघर्ष जारी था.

जहां दूध बेचा, उसी बंगले में रहे
राजेश पायलट की कामयाबी की कहानी में सबसे अहम प्रतीक यही है. अपने अंकल की डेयरी में एक दूध विक्रेता के तौर पर काम करने के लिए एक किसान के तौर पर राजेश पायलट दिल्ली आए थे. और तब, पायलट अकबर रोड के बंगला नंबर 10 में दूध पहुंचाया करते थे. लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें ज़्यादा दिन इस पेशे में रहने नहीं दिया.
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कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पिछले महीने बरसी के मौके पर राजेश पायलट को याद किया.


पायलट ने फ्लाइंग स्कूल में दाखिला लिचया और भारतीय वायुसेना के पायलट बने. 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में पायलट बतौर स्क्वाड्रन लीडर हिस्सा लिया था. 1979 में पायलट ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी से मुलाकात कर चुनाव लड़ने की इच्छा ज़ाहिर की. एक लहर में इंदिरा गांधी ने पायलट को टिकट दे दिया तो पायलट ने फोर्स छोड़कर चुनाव लड़ा ही नहीं बल्कि भरतपुर से पहला चुनाव जीता और फिर दौसा से.

नाम बदलने की वजह थी लहर
राजेश पायलट का वास्तविक नाम राजेश्वर प्रसाद सिंह बिधूड़ी था. लेकिन भरतपुर का चुनाव लड़ने से पहले जब वो गांवों के दौरे पर गए, तो वहां उन्हें सुनाई दिया कि चर्चा थी 'कोई पायलट आने वाला है'. इसी चर्चा के चलते उन्होंने अपना नाम राजेश पायलट कर लिया. 1980 के दशक में गांधी परिवार के साथ पायलट की नज़दीकियां बढ़ती गईं और इसके बाद राजीव गांधी सरकार में वो मंत्री बने.

अब पायलट जूनियर का है समय
एक तरफ, राजेश पायलट अपने बूते बनी हस्ती के रूप में मशहूर रहे, वहीं इस मामले में सचिन की कहानी अलग रही. साल 2000 में पिता के असमय देहांत के बाद उन्हें राजनीति में आना पड़ा. 26 साल की उम्र में सांसद, 31 की उम्र में केंद्रीय मंत्री, 36 की उम्र में राज्य कांग्रेस अध्यक्ष और 40 की उम्र में डिप्टी सीएम बने सचिन एक तरह से परिवारवाद की राजनीति के प्रतीक भी रहे, जिन्हें गांधी परिवार का नज़दीकी माना जाता है.

जोखिम से कतराए नहीं सचिन
पिता की छाप के साथ राजनीति में पहचाने गए सचिन को भी किसानों और गुज्जरों का नेता माना गया. लेकिन, सचिन ने अपनी अलग पहचान के लिए गैर गुज्जर चुनाव क्षेत्र अजमेर को चुना और 2009 में वहां से चुनाव जीता भी. इस जीत ने उनके बड़े नेता की छवि बनाने का काम किया. 2014 की हार के बाद सचिन ने फिर जोखिम उठाया और दिल्ली की सियासत छोड़कर राजस्थान कांग्रेस की कमान संभालने की ज़िम्मेदारी चुनी और इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के सारथी बनकर उभरे.

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अपने पिता की पुण्यतिथि पर सचिन पायलट ने श्रद्धांजलि संबंधी ट्वीट किया था.


तो क्या है पिता और पुत्र में समानता?
राजेश पायलट और सचिन के बीच तुलना करते हुए यह समझना ज़रूरी है कि दोनों का समय और स्थितियां अलग रही हैं. एक तरफ जब कांग्रेस सत्ता में थी और देश की सबसे बड़ी पार्टी थी, तब राजेश पायलट का दौर था. जबकि, सचिन का समय यह है कि जब कांग्रेस छोटी पार्टी रह गई है और सत्ता उसके लिए दूर की कौड़ी साबित हो रही है.

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मौजूदा हालात और इतिहास को ध्यान में रखते हुए अगर कहा जाए तो ​पिता और पुत्र के बीच सबसे बड़ी समानता महत्वाकांक्षा और बगावत दिखती है. राजेश पायलट और सचिन के करियर पर आधारित लेख में पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा है कि कांग्रेस में जो चापलूसों की परंपरा रही है, पिता पुत्र दोनों ही उससे बच निकलने में कामयाब रहे और इसी वजह से हर ठोकर के बाद उठने में भी दोनों मिसाल बनते रहे.
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