तब लोग बर्तनों में भर-भर के ले जाते थे रूह अफज़ा, केवल यहां मिलता था

हकीम अब्दुल मजीद ने दिल्ली वालों को जबरदस्त गर्मी से बचाने के लिए एक नुस्खा ईजाद किया था. इस नुस्खे का नाम था रूह अफज़ा.

News18Hindi
Updated: May 12, 2019, 4:37 PM IST
तब लोग बर्तनों में भर-भर के ले जाते थे रूह अफज़ा, केवल यहां मिलता था
रूह आफजा (फाइल तस्वीर)
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Updated: May 12, 2019, 4:37 PM IST
हकीम अब्दुल मजीद साल 1900 से यूनानी पद्धति की चिकित्सा वाला 'हमदर्द' नाम का दवाखाना चलाते थे. मसरूर हसन सिद्दीकी जो कि हमदर्द कंपनी में करीब 10 सालों तक प्रशासनिक मैनेजर रहे और हमदर्द परिवार के करीबी हैं, उन्होंने एक हिंदी दैनिक को बताया कि रूह अफज़ा की शुरुआत 1907 में हुई थी. दरअसल हकीम अब्दुल मजीद ने दिल्ली वालों को जबरदस्त गर्मी से बचाने के लिए एक नुस्खा ईजाद किया था. इसे दिल्ली वाले घरों के बर्तन में लेने आते थे. तब यह शरबत लालकुआं के हमदर्द दवाखाने पर ही मिलता था.

यूं पूरे इंडिया के मार्केट में छा गया रूह अफज़ा


जब इसकी मांग बढ़ी तो यह बोतलों में मिलने लगा. चूंकि उस दौर में कांच की बोतलें कम होती थीं तो पहले ग्राहक को बोतल के पैसे भी जमा करने होते थे और जब वह बोतल वापस कर देता था तो उसके पैसे वापस दे दिए जाते थे. जैसे-जैसे इसकी बिक्री बढ़ी, इसका उत्पादन भी बढ़ा. 1940 में वह दौर भी आया जब पुरानी दिल्ली (दरियागंज) में इसका पहला प्लांट लगा. हालांकि मशीनें यहां भी नहीं थीं और बोतलों को हाथ से ही भरा जाता था. इसके बाद उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 1971 में और 2014 में हरियाणा के मानेसर में भी इसके प्लांट लगे. आज आलम ये है कि देश के 1000 करोड़ रुपये के पाउडर और सिरप पेय बाजार में रूह रूह अफज़ा की हिस्सेदारी 40 फीसदी है.

झगड़े की भी आई नौबत

रूह अफज़ा की खोज करने वाले अब्दुल मजीद के दो बेटे थे- बड़े अब्दुल हमीद और छोटे मोहम्मद सईद. 1920 में इन्होंने ही हमदर्द कंपनी रजिस्टर कराई लेकिन बंटवारे के वक्त छोटे बेटे मोहम्मद सईद पाकिस्तान शिफ्ट हो गए. वहां भी रूह अफज़ा बनने लगा. जबकि अब्दुल हमीद और उनकी मां राबिया यहीं रहे. यही कारण है कि जब भारतीय बाजारों से रूह अफज़ा गायब हो गया था तब भी पाकिस्तान और बांग्लादेश में इसकी बिक्री धड़ल्ले से जारी थी.

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बाद में अब्दुल हमीद के भी दो बेटे हुए, अब्दुल मोईद और हम्माद अहमद. 1948 में ही कंपनी को चैरिटेबल ट्रस्ट में बदल दिया गया था. इसके बाद अब्दुल मोईद इसके प्रबंध निदेशक बने और हम्माद के जिम्मे मार्केटिंग का काम आया. धीरे-धीरे अब्दुल मोईद के बेटे अब्दुल माजिद भी इस व्यापार में आए तो अब्दुल मोईद की इसमें मेजॉरिटी हो गई. उनके भाई हम्माद केवल मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग के काम तक महदूद रह गए. हम्माद के बेटे भी इसके बाद कंपनी के बोर्ड में शामिल हुए. लेकिन अब्दुल मोईद की मौत के बाद चाचा-भतीजे यानि अब्दुल माजिद और हम्माद अहमद का विवाद शुरू हो गया. 2017 में जब मामला हाईकोर्ट गया तो अक्टूबर, 2017 को फैसला चाचा के पक्ष में आया.
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रूह अफज़ा (फाइल)


60 के दशक में हम्माद अहमद के बेटे अब्दुल हमीद कौटिल्य मार्ग, चाणक्यपुरी शिफ्ट हो गए. यहां वे होली-ईद आदि त्योहारों की दावतें दिया करते थे. जिनमें सभी धर्मों के लोग शामिल होते थे. उनके गुज़र जाने के बाद यह परंपरा बेटे अब्दुल मोईद ने भी जारी रखी. उनकी इन दावतों में देश की नामचीन हस्तियां शिरकत किया करती थीं. जिनमें पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी तक का नाम शामिल था. इसके अलावा बॉलीवुड के भी कई एक्टर-एक्ट्रेस इसमें आते थे. हकीम अब्दुल हमीद को अपनी इन अचीवमेंट्स के लिए 1965 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण भी मिल चुका है.

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