अमेरिका में मैनेजमेंट की पढ़ाई से लेकर दमदार जमीनी नेता और बागी बनने की सचिन पायलट की कहानी

अमेरिका में मैनेजमेंट की पढ़ाई से लेकर दमदार जमीनी नेता और बागी बनने की सचिन पायलट की कहानी
सचिन पायलट और अशोक गहलौत के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे

सचिन जब अमेरिका में मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे थे तो वो सियासत में नहीं आना चाहते थे. पिता की एक्सीडेंट में मृत्यु के बाद वो पॉलिटिक्स में आए. हालांकि उनका शुरुआती सफर निश्चित तौर पर बहुत मुश्किल नहीं रहा लेकिन अब उन्होंने राजस्थान में अपने बल पर अपनी राजनीति की जमीन बनाई है और एक नया आत्मविश्वास भी पाया है.

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इस समय देश की खबरों के केंद्र में हैं राजस्थान के उप मुख्यमंत्री और कांग्रेस के विद्रोही नेता सचिन पायलट. पायलट असरदार वक्ता हैं. एक जमाना था जब वो राजनीति में नहीं आकर किसी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी करके करियर बनाना चाहते थे. लेकिन समय उन्हें सियासत में ले आया. 18 साल के राजनीतिक सफर में उन्होंने पहचान भी बनाई. बड़ी छलांग भी लगाई. केंद्र सरकार में मंत्री रहे. फिर राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष , उसके बाद अशोक गहलौत सरकार में उपमुख्यमंत्री और अब गहलौत सरकार के खिलाफ ताल ठोंकते पार्टी के विद्रोही नेता.


वो 43 साल के हैं, जो राजनीति में युवा उम्र ही समझी जाती है. लेकिन वो गजब के जुझारू हैं. राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष होने के दौरान उन्होंने अपनी जनसंपर्क शैली और मेहनत से हर किसी को प्रभावित किया. हालांकि ये सही है कि जब राजस्थान में कांग्रेस जीती और उसने सरकार बनाई तो वो मुख्यमंत्री बनना ही चाहते थे. उन्होंने अपना मजबूत दावा भी पेश किया. हालांकि प्रदेश कांग्रेस के सीनियर नेता अशोक गहलौत इस पद पर आसीन हुए और वो उप मुख्यमंत्री बने. हालांकि दोनों के बीच असहज रिश्ते अक्सर खबरों में आते रहे हैं लेकिन अबकी बार सचिन ने अपनी प्रकृति के खिलाफ जाकर विद्रोही तेवर अपना लिये हैं.

सचिन का सियासी करियर तभी शुरू हुआ जब कांग्रेस में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि ने पार्टी में प्रवेश किया था और उन्हें पार्टी का भविष्य माना जा रहा था. अब इसे क्या कहा जाए कि कुछ ही समय पहले सिंधिया कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं तो सचिन भी पार्टी से दो-दो हाथ कर रहे हैं.


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सचिन पायलट क्या चाहते थे 

शुरुआती सालों में वो अपने तमाम इंटरव्यू में कहा करते थे कि वो कतई सियासत में नहीं आना चाहते थे बल्कि दो काम करना चाहते थे, जो नहीं कर पाए. उनका सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था, जिस तरह उनके पिता थे. लेकिन वो ऐसा इसलिए नहीं कर पाए, क्योंकि उनकी आंखें कमजोर निकलीं. हालांकि इसके बाद उन्होंने पिता को बगैर बताए प्राइवेट फ्लाइंग लाइसेंस हासिल किया.


तब अच्छी प्राइवेट नौकरी वरीयता बनी 

फिर जब विदेश में मल्टीनेशल मैनेजमेंट एंड फाइनैंस में स्पेशलाइजेशन के साथ एमबीए की पढ़ाई की तो प्राइवेट नौकरी उनकी वरीयता थी. जब वो अमेरिका के व्हार्टन कॉलेज में पढ़ रहे थे तो उसके बीच ही पिता का निधन हो गया, उससे उनकी भविष्य की सारी योजनाएं ही बदल गईं. अब उन पर राजनीति में आने का दबाव था.


हालांकि अमेरिका की पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री लेने के बाद उनके सामने काफी अच्छी नौकरियों की संभावनाएं थीं. कई साल पहले उन्होंने कहा, "मैं तो राजनीति में आ गया लेकिन मेरे दोस्त प्राइवेट कंपनियों में काफी अच्छी पोजिशन पर हैं और मुझसे कहीं ज्यादा पैसा कमा रहे हैं. "अमेरिका पढ़ाई के लिए जाने से पहले दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद वो गुडगांव में जनरल मोटर्स के साथ दो साल नौकरी कर भी चुके थे.




सचिन पायलट जब अमेरिका में मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे थे तब उनकी वो कतई सियासत में नहीं आना चाहते थे




24 साल की उम्र में कांग्रेस में शामिल हुए 


वर्ष 2002 में वह 10 फरवरी को पिता राजेश पायलट के जन्मदिन पर कांग्रेस में शामिल हुए. उनके पिता राजेश पायलट गांधी परिवार के खास दोस्तों में थे. दो साल बाद ही उन्हेें राजस्थान के दौसा से लोकसभा चुनाव लडऩे का मौका मिला. वो वहां से रिकार्ड वोटों से जीते.


असरदार वक्ता माने जाते हैं

26 साल में चुनाव जीतकर वो उस समय ऐसा करने वाले कांग्रेस के सबसे कम उम्र के नेता बने. उसके बाद वो लगातार आगे बढ़ते रहे. जो उन्हें बोलते हुए सुनता था. प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाता था. उनके पास वाककला तो थी ही लेकिन ये भी लगता था कि वो सियासत से इतर तमाम विषयों के बारे में कितना पढ़ते और जानकारी रखते हैं. यही नहीं उन्होंने अपनी पहचान मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर भी बनाई.


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तब राजनीति के साथ जिंदगी का एक और इंतिहान चल रहा था  

जिस समय वो राजनीति में आए उसी दौरान उनकी जिंदगी में भी एक इंतिहान चल रहा था. वो कश्मीर के जानी-मानी सियासत फैमिली की सारा अब्दुल्ला से प्यार करते थे. लेकिन इस शादी में बहुत सी अड़चनें थीं. इसके बाद भी उन्होंने ये शादी की.


यूपीए-2 मनमोहन सरकार में मंत्री बने 

निश्चित तौर पर वो जुझारू हैं. शायद यही वजह है कि वो आज अपने समकालीन तमाम नेताओं के मुकाबले खास पहचान बना चुके हैं. यूपीए-2 की मनमोहन सरकार में वो राज्य मंत्री बने. अब जबकि वो राजस्थान में गहलौत सरकार के साथ कांग्रेस में विद्रोह की ताल ठोक चुके हैं तो ये सवाल जरूर है कि वो अब क्या करना चाहते हैं.

याद आ रहा है कई साल पहले बीबीसी में लिया गया उनका इंटरव्यू जब उन्होंने कहा था कि उन्हें रंग दे बसंती फिल्म और उसके गाने अच्छे लगते हैं. एक समय वो भी था जबकि उन्हें देश के सबसे आकर्षक युवकों और नेताओं में शुमार किया जाता था. हालांकि इस बात को उन्होंने कभी बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दिया.



PILOT
सचिन पायलट को वर्ष 2014 में राजस्थान में कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया, तब उनकी असली राजनीतिक परख हुई. उन्होंने कांग्रेस के लिए वहां बड़े स्तर पर जमीनी काम किया. इसका परिणाम भी कुछ समय पहले विधानसभा चुनावों में नजर आया.



तब हुई उनकी सियासी जमीन की असली परख 

चूंकि वो राजनीतिक परिवार में पैदा हुए. समझने लायक होने के बाद पिता और फिर मां रमा पायलट को राजनीति में सक्रिय देखा तो स्वाभाविक तौर पर वो राजनीति के गुणों के साथ आत्मसात करते गए. हालांकि कांग्रेस में आना फिर चुनाव लड़ना और आगे बढ़ना-ये सब शुरू में उनके लिए कोई बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं था. ये बात वो खुद काफी हद तक मानते भी रहे हैं. लेकिन उनकी असली परख तब हुई जब उन्हें राजस्थान में कांग्रेस ने पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया. तब उन्होंने मेहनत भी की और एक नया आत्मविश्वास सीखने के साथ सियासत के नए तेवर भी खुद में जुटा लिये.


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क्यों सिंधिया से हो रही है अब तुलना  

लेकिन बड़ा सवाल यही है कि अब वो क्या करने वाले हैं. निश्चित तौर पर करीब दो दशक की राजनीति ने उन्हें परिपक्व नेता बना दिया है, जो नफे-नुकसान को बेहतर तरीके से तौल सकता है. लिहाजा अगर वो इस समय अगर अपने 20-22 विधायकों को लेकर दिल्ली में रुके हुए हैं तो उन्हें मालूम है कि वो एक बड़ा कदम उठा चुके हैं. इस कदम के बाद उनकी तुलना ज्योतिरादित्य सिंधिया से की जाने लगी है. हालांकि राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि वो कभी बीजेपी में नहीं जाएंगे. फिर वो क्या करेंगे.

असल में मुख्यमंत्री अशोक गहलौत ने हाल में उनके खिलाफ जो काम किये हैं, उससे पानी से सिर से गुजर गया. हालांकि राजस्थान से आने वाली खबरें ये भी कहती हैं कि वो कम से कम तीन बार अशोक गहलौत को गद्दी से हटाने की कोशिश कर चुके हैं और ये बात पार्टी हाईकमान को मालूम है, इसलिए इस बार सचिन पायलट को लेकर उनका रुख बहुत ठंडा सा है.

क्या गुर्जर-जाट बेल्ट में नेता की जगह भरेंगे

कुछ लोग ये भी कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और राजस्थान तक गुर्जर-जाट राजनीति को नया तेवर देने का समय आ गया है. वो इस जगह का इस्तेमाल करते हुए इस तबके के बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं. कहना चाहिए कि इस समय सचिन जहां हैं, वो राजनीतिक जमीन उन्होंने खुद बनाई है.

सचिन की छवि एक ज़मीनी काम करने वाले नेता की है. जो गांव से खुद को जोड़ता है और गांव के लोगों के बीच भी आसानी से घुलमिल जाता है. हालांकि इन सबके बीच ये भी नजर आ रहा है कि कांग्रेस में पुराने और नए नेताओं के बीच जो संघर्ष चल रहा है, उसमें युवा नेताओं में अब गुस्सा दिखने लगा है.

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