वैक्सीन के शुरुआती दौर में ट्रायल से डरते थे लोग, कैदियों को इंजेक्शन देकर हुए प्रयोग

कोरोना संक्रमण के खिलाफ जंग छेड़ते हुए देश में आज रविवार से टीका उत्सव की शुरुआत हुई है- सांकेतिक फोटो

कोरोना संक्रमण के खिलाफ जंग छेड़ते हुए देश में आज रविवार से टीका उत्सव की शुरुआत हुई है- सांकेतिक फोटो

Tika Utsav: कहीं गैस मास्क लगाकर जबरन फ्लू के वायरस (flu virus) डाले जाते, तो कहीं इंजेक्शन के जरिए दूसरी जानलेवा बीमारियों के वायरस शरीर में घुसेड़ दिए जाते. तब वैक्सीन को लेकर दुनिया में उतनी स्वीकार्यता नहीं थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 11, 2021, 11:33 AM IST
  • Share this:
कोरोना संक्रमण के खिलाफ जंग छेड़ते हुए देश में आज रविवार से टीका उत्सव (Tika Utsav) की शुरुआत हुई है, जो अगले चार दिनों तक चलेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) इस मौके पर ज्यादा से ज्यादा लोगों से कोरोना का टीका (coronavirus vaccine) लगाने की अपील कर रहे हैं. बता दें कि टीकाकरण शुरू होने के बाद भी बहुत से लोग किसी डर के चलते वैक्सीन लेने से झिझक रहे हैं. ऐसे में केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि दुनिया में पहला टीका आने पर लोग कितना डरे हुए रहे होंगे.

कई महामारियां मचाती थीं कोहराम 

पुराने समय में कोरोना वायरस तो नहीं था लेकिन कई संक्रामक बीमारियों का जिक्र मिलता है, जैसे हैजा, चेचक, प्लेग, रेबीज, टीबी और पोलियो. हरेक बीमारी के कारण लाखों-करोड़ों जानें गईं. तब इन बीमारियों का कोई इलाज नहीं था, बल्कि जानकार अलग-अलग तरीकों से इलाज की कोशिश करते थे. जैसे किसी बीमारी में मरीज के प्रभावित अंग को आग से जला दिया जाता था.

ये भी पढ़ें: क्यों Hitler ने अपनी आत्मकथा नए शादीशुदा जोड़ों में बंटवानी शुरू कर दी? 
बड़ा तबका बीमारियों को ऊपरवाले का गुस्सा मान लेता 

कई बार बीमारियों को ईश्वरीय प्रकोप मानते हुए लोग खुद को अजीबोगरीब तरीके से प्रताड़ना भी देते थे. इनमें भूखा रहने से लेकर खुद को कोड़े मारना भी शामिल था. बेंत या कोड़े से खुद को मारने वाले लोगों का समुदाय तो काफी तेजी से बढ़ा था, जो बीमारी से बचने के लिए खुद को लहुलुहान कर लेते. ऐसे लोगों को Flagellants कहा जाता था.

vaccine
कई बार बीमारियों को ईश्वरीय प्रकोप मानते हुए लोग खुद को अजीबोगरीब तरीके से प्रताड़ना भी देते - सांकेतिक फोटो




चेचक का टीका सबसे पहला 

बाद में मेडिकल साइंस की तरक्की के साथ वैज्ञानिकों को समझ आया कि टीका बनाकर भी बीमारियों से काफी हद तक बचा जा सकता है. माना जाता है कि चेचक दुनिया की पहली बीमारी थी जिसके टीके की खोज हुई. साल 1976 में अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने इसका टीका खोजा था. बता दें कि आज जिस चेचक को हम सामान्य बात मानते हैं, वो तब काफी गंभीर बीमारी थी, जिससे जानें भी जाती हैं. संक्रमित बच्चों में मृत्यु दर 80 फीसदी थी. सत्तर के दशक में जब चेचक की भयावहता खत्म हुई, तब तक लगभग 50 करोड़ लोग मारे जा चुके थे. टीकाकरण के कारण ही ये बीमारी जानलेवा नहीं रही.

ये भी पढ़ें: Explained: क्या NASA का अगला टेलीस्कोप धरती पर तबाही ला सकता है?  

ट्रायल के लिए कोई नहीं आता था 

इधर टीके की खोज के बाद भी ऐसा नहीं था कि लोग इसे लेने को उतावले थे, बल्कि वे टीका लेने और टीकाकरण के ट्रायल में शामिल होने से डरते थे. बता दें कि वैक्सीन बनाने और लैब टेस्ट के सफल होने के बाद ह्यूमन ट्रायल टीका बनाने का अहम पड़ाव है. लेकिन लोग तो ट्रायल में आते ही नहीं थे. तब वैज्ञानिकों ने दूसरा तरीका निकाला.

vaccine
सत्तर के दशक में जब चेचक की भयावहता खत्म हुई, तब तक लगभग 50 करोड़ लोग मारे जा चुके थे- सांकेतिक फोटो


कैदियों पर होते थे प्रयोग 

देशों में युद्ध बंदियों का होना आम बात थी. हजारों लोग डिटेंशन कैंपों में होते. वैज्ञानिक उन्हीं को जबर्दस्ती अपने ट्रायल का हिस्सा बनाने लगे. कहीं गैस मास्क लगाकर फ्लू के वायरस डाले जाते, तो कहीं इंजेक्शन के जरिए बीमारियों के वायरस शरीर में घुसेड़ दिए जाते. यौन रोगों के लिए भी ऐसा ही किया गया. यहां तक कि हेपेटाइटिस की बीमारी के मरीजों से रक्त लेकर उसे स्वस्थ कैदियों में डाल दिया गया और फिर उन पर प्रयोग हुआ. प्रयोग के दौरान कितने कैदियों की जानें गईं, इसका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया.

क्या चीन ने बनाई पहली वैक्सीन?

वैसे तो अंग्रेज विशेषज्ञ एडवर्ड जेनर को पहला टीका बनाने का श्रेय मिलता है लेकिन कहीं-कहीं इसे लेकर मतभेद भी हैं. जैसे हिस्ट्री ऑफ वैक्सीन्स के मुताबिक चीनियों ने चेचक के लिए पहली वैक्सीन बनाई थी. चीन के अलावा ये टीका अफ्रीका और तुर्की में भी फैला था और आजमाया गया था. बाद में इसका ही संशोधित रूप ब्रिटेन सहित यूरोप में लाया गया. हालांकि इसके पक्के प्रमाण नहीं मिलते हैं.

फ्रेंच वैज्ञानिक ने दिया बड़ा योगदान 

टीकाकरण को उन्नत करने का श्रेय लुई पाश्चर को जाता है. इस फ्रेंच वैज्ञानिक ने न केवल वैक्सीन्स को दुनिया में मान्यता दिलाई, बल्कि रेबीज के टीके की भी खोज की. उनकी खोज ने वैक्सीन की दुनिया में क्रांति लाने का काम किया. इसके बाद लगातार कई टीके बनते चले गए और महामारियां दुनिया से खत्म होने लगीं. इन महामारियों में डिप्थेरिया, हैजा, प्लेज, टायफॉइड, टीवी और कई दूसरी बीमारियां थीं, जिनके टीके साल 1030 तक बनते रहे. इसके बाद से लगातार इन टीकों में ही संशोधन किया जा रहा है.

vaccine
ज्यादातर वैक्सीन इंजेक्शन के रूप में दी जाती है, क्योंकि ये आंतों द्वारा आसानी से अवशोषित कर ली जाती हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


कैसे काम करती है वैक्सीन

इसके लिए सबसे पहले वायरस या बैक्टीरिया का जेनेटिक कोड पता किया जाता है. दोनों ही में अलग तरह के कोड होते हैं और हर नए वायरस या बैक्टीरिया का कोड बदल जाता है. जेनेटिक कोड पता करने के बाद उसे लिपिड में कोटॉ करते हैं ताकि वो शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश कर सके. वैक्सीन कोशिकाओं में प्रवेश करती है और एंटीबॉडी पैदा करती है. ऐसे में जब वायरस का हमला होता है तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता तुरंत एक्टिव हो जाती है और वायरस को या तो शरीर में आने ही नहीं देती या फिर हमला होता भी है तो वायरल लोड कम रहता है, जिससे रोगी की स्थिति गंभीर नहीं होती.

ये भी पढ़ें: जब मास्क के भीतर इत्र रखते थे चिकित्सक, महामारियों को मानते थे गंध से फैलने वाली बीमारी 

ज्यादातर वैक्सीन इंजेक्शन के रूप में दी जाती है

ये शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित कर ली जाती हैं और शरीर का काम आसान हो जाता है. वहीं पोलियो या रोटा वायरस जैसी बीमारियों की वैक्सीन पिलाई भी जाती है क्योंकि ये इसी तरह से ज्यादा असरदार रहती है. एक ओर वैक्सीन के कारण जहां सालाना लाखों जानें बच रही हैं, वहीं दुनिया का एक तबका इसके खिलाफ भी आ रहा है. साल 2019 में ही वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने वैक्सीन के खिलाफ बढ़ती सोच को दुनिया के 10 सबसे बड़े खतरों में गिना था और लोगों को आश्वस्त करते हुए कहा था कि टीकाकरण से कोई नुकसान नहीं है, बल्कि जान ही बचती है. अब पीएम मोदी के टीकाकरण की अपील को भी इसी तरह देखा जा रहा है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज