प्यार में पड़ा इंसान संत क्यों बन जाता है ?

ईश्वर की खोज और प्रेम की तलाश क्या इनमें कोई रिश्ता है. वैज्ञानिकों का दावा है कि इन दोंनों में गहरा ताल्लुक है और इस ताल्लुक का नाम है ऑक्सीटोसिन.

News18India
Updated: September 12, 2018, 4:24 PM IST
प्यार में पड़ा इंसान संत क्यों बन जाता है ?
ईश्वर की खोज और प्रेम की तलाश क्या इनमें कोई रिश्ता है. वैज्ञानिकों का दावा है कि इन दोंनों में गहरा ताल्लुक है और इस ताल्लुक का नाम है ऑक्सीटोसिन.
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Updated: September 12, 2018, 4:24 PM IST
क़ैस ( मजनूं ) ईश्वर की तलाश में निकला था. आखिरकार लैला के इश्क में पड़कर अमर हो गया. तुलसीदास अपनी पत्नी के प्रेम में गिरफ्तार थे. झिड़की के बाद राम चरित मानस और हनुमान चालीसा लिख डाली. ये दोनों मामले एक दूसरे से अलग नहीं हैं. ईश्वर की खोज और प्रेम की तलाश क्या इनमें कोई रिश्ता है. वैज्ञानिकों का दावा है कि इन दोनों में गहरा ताल्लुक है और इस ताल्लुक का नाम है ऑक्सीटोसिन. ऑक्सीटोसिन एक हार्मोन है जो वैसे तो गाय-भैंस से ज़्यादा दूध उत्पादन के काम में आने के लिए बदनाम है लेकिन वैज्ञानिकों ने इस हार्मोन को इश्क और आध्यात्मिकता के बीच की कड़ी भी बताया है. इसे लव हार्मोन भी कहा जाता है. पहले ये जान लें लव हार्मोन है क्या और आपके शरीर में इसका दखल क्या है ?

लव हॉर्मोन
दरअसल ये हॉर्मोन प्‍यार से जुड़ी आपकी भावनाओं को उभारने में मददगार होता है. ये आपके मन में प्यार करने का जज्बा पैदा करता है. ऑक्सीटोसिन को ही 'लव हार्मोन' की संज्ञा दी गई है, जो पुरुष और महिलाओं दोनों को बंधन में बांधने में मदद करता है. यह एक-दूसरे से जुड़े रहने में मदद करता है, साथ ही खुशमिजाज भी बनाता है. दिमाग के एक खास हिस्से में इसकी सक्रियता होने पर लोगों में प्यार की भावना पैदा होती है. ये हार्मोन पोस्टेरियर लैब के पिट्यूटेरी ग्लैंड से स्त्रावित होता है. रिसर्च कहते हैं ये ग्लैंड में तभी सक्रीय होता है जब किसी के प्रति आपका खिंचाव हो.

क्या कहती है रिसर्च

वैज्ञानिकों का दावा है कि यही वजह है इश्क़ में पड़ा इंसान अक्सर रुहानी बातें करने लगता है और रुहानी बातें करने वाले अक्सर प्रेम की तरफदारी करते नज़र आते हैं. सूफ़ी कवि बुल्ले शाह ने हीर-रांझा की लोक कथा को इस तरह दर्शाते हैं.

रांझा-रांझा करदी हुण मैं आपे रांझा होई,
सखियो नी मैंनू धीदो रांझा, हीर ना आको कोई
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यानी इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-हबीब के बीच का तार असल में ऑक्सीटोसिन है.

 

दरअसल ये बात एक रिसर्च में सामने आई. वैज्ञानिकों ने कुछ लोगों को ऑक्सीटोसिन सूंघने को कहा. असर ये हुआ कि लोगों को ज़ेहन में ईश्वर और प्रेम दोनों समा गए. वो भी कुछ घंटों के लिए नहीं कई दिनों के लिए. शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को इस हार्मोन के बारे में शायद ही पता हो लेकिन उन्हें अंदाज़ा था कि इनके बीच रिश्ता ज़रूर है.

ग़म अगरचे जां-ग़ुसिल है, पे कहां बचे के दिल है,
ग़म-ए-इश्क़ जो न होता, ग़म-ए-रोज़ग़ार होता

यानी अगर उन्हें इश्क की फिक्र नहीं होती तो दुनियादारी की होती. यानी आपके जां-ग़ुसिल ( जान के दुश्मन ) ग़म की वजह हैं. ऑक्सिटोसिन यानी सदियों से जो वजह पत्थर के सनम में खुदा की तलाश की थी वो एक कैमिकल था. दरअसल आध्यात्मिकता का वैज्ञानिक आधार तलाशने की कोशिश पश्चिम में लम्बे वक्त से चल रही है.

लव हार्मोन का रिश्ता अध्यात्म से क्या है ?

जगजीत सिंह और चित्रा की गजल के कुछ लाइनें हैं-

हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे,
ताविजें भी बंधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा.

इस रिसर्च को संचालित करने वाले वैन कैपलिन का भी ऐसा ही मानना है. उनका कहना है कि आक्सीटोसोन हार्मोन का रोल आपके शरीर में अध्यात्म को बढ़ावा देने का भी होता है. यानी जब आप प्यार में होते हैं तो आपका मन प्यार के साथ- साथ अध्यात्म से भी रिश्ता जोड़ लेता है. ये स्ट़डी उन्होंने कुछ लोगों पर की. ऑक्सीटोसिन को सूंघाने के बाद कुछ दिनों के लिए उनके व्यवहार को ऑब्जर्व किया. जिससे ये नतीजे तक पहुंचे कि इस हार्मोन का शिकार इंसान अध्यात्म की तरफ भी झांकता है.

सेक्स करने के दौरान भी ऑक्सीटोसिन स्त्रावित होता है. जब वैन कैपलिन ने इस संदर्भ में सवाल किया गया तो क्या अत्याधिक सेक्स करना भी आपको अध्यात्म के करीब ले जाता है. वैन कैपलिन का कहना था कि मेरा ये रिसर्च इंसान के व्यव्हार और उनकी बातों को ऑब्जर्व करने तक सीमित था. ये अनुशासित लैब में की गई ना कि बिस्तर पे.

जहां हिप्पी दौर में पश्चिम नशे की मदद से ईश्वर को ढूंढ रहा था. पूरब में प्रेम के ज़रिए प्रभु के दर्शन की बात सामान्य थी.भारतीय उप महाद्वीप में जो शांति शायरी पढ़ कर मिल जाती है. विदेशों में उसी की तलाश में बड़ी बड़ी दवा ईजाद की गईं.. अब इस कड़ी में लव हार्मोन का इस्तेमाल दिलचस्प है.

 

 
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