जहां से नौकरी शुरू की और रिटायर हुए, वहीं मंत्री होंगे जयशंकर

वो ऐसे नौकरशाह हैं, जिसने अपनी विदेश संबंधी समझबूझ से मोदी को कायल कर दिया, 1977 में शुरू की थी विदेश सेवा में नौकरी

News18Hindi
Updated: May 30, 2019, 7:42 PM IST
जहां से नौकरी शुरू की और रिटायर हुए, वहीं मंत्री होंगे जयशंकर
सुब्रह्मण्यम जयशंकर (फाइल फोटो)
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Updated: May 30, 2019, 7:42 PM IST
64 साल के एस जयशंकर के बारे में कहा जाता है कि जब वो विदेश सचिव थे तो उनकी जितनी शानदार पकड़ अमेरिकी सरकार में थी उतने ही दमदार राजनयिक संबंध चीन से भी. अपने संबंधों और बुद्धिमत्ता के बल पर मुश्किल से मुश्किल राजनयिक समस्याओं को हल करना उनकी विशेषता रही है. पिछले डेढ दशक में कई बार ऐसे मौके आए, जब उन्होंने दोनों महाशक्तियों से संपर्कों के जरिये भारत की अड़चनों की तोड़ निकाली.

कोई ऐसा शख्स, जो इस समय दुनिया की इन दोनों महाशक्तियों की नब्ज पहचानता हो. विदेशी नीति के बारीक पहलुओं के जरिए समस्याएं हल करने का उस्ताद रहा हो, उसे अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर रहे हैं तो यकीन मानिए कि वो इस शख्स की बुद्धिमत्ता और राजनयिक सूझबूझ के कायल रहे होंगे.

सुब्रह्मण्यम जयशंकर की मंत्री के रूप में नियुक्ति से साफ है कि वो काफी हद तक विदेश विभाग में  ही कामकाज संभालेंगे.

यहां ये भी साफ है कि मोदी सरकार की नीति अमेरिका और चीन दोनों से रिश्तों को बेहतर करने की रहेगी, जिसमें मृदुभाषी और अनुभवी जयशंकर काफी काम आएंगे.

तब जयशंकर विदेश सचिव थे 
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान जयशंकर विदेश सचिव थे. इस पोजिशन पर रहते हुए उन्होंने जिस तरह से विदेशी मामलों पर सरकार की दिशा और दशा तय करने वाली नीतियां बनाईं, वो सरकार के लिए काफी उपयोगी रहीं. चीन से भारत से संबंधों में कई बार उतार-चढाव देखने को मिले, जिसे जयशंकर ने बहुत खूबसूरती से संभाला.

जयशंकर मंत्रिमंडल में शामिल

जापान से बेहतर संबंधों के सूत्रधार 
मोदी के ही कार्यकाल में भारत के रिश्ते जापान के साथ नई सोपान की ओर गए. मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के बीच जो मधुरतम रिश्ते बने, उसमें वाकई किसी भी खास भूमिका रही थी, तो वो जयशंकर ही थे. साउथ ब्लाक के जानकार बताते हैं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में आमतौर पर सरकार ने विदेशी मोर्चों पर जो कामकाज किया, जिस तरह से संबंधों को आगे बढाया, उसमें हर जगह जयशंकर की छाप थी.

मोदी को प्रभावित किया 
ये भी कहा जाता है कि 2015 से 2018 तक विदेश सचिव रहने के दौरान उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता, जानकारी और काम करने की शैली से मोदी को खासा प्रभावित किया. यहां तक जब वो 2018 में विदेश सचिव पद से रिटायर हुए तो उसके बाद भी भारत सरकार लगातार उनसे राय लेती रही थी.

जयशंकर इन दिनों टाटा संस के ग्लोबल अफेयर्स के प्रेसीडेंट थे


अभी टाटा के साथ काम कर रहे थे
इन दिनों जयशंकर टाटा संस के ग्लोबल कारपोरेट अफेयर्स में प्रेसीडेंट के तौर पर काम कर रहे थे. 1977 में विदेश सेवा ज्वाइन करने के बाद उन्होंने हर पग पर अपनी काबिलियत की छाप छोड़ी. विदेश मंत्रालय की अमेरिका डेस्क से लेकर कई देशों में उन्होंने पहले फर्स्ट सेक्रेट्री, सेकेंड सेक्रेट्री और अन्य भूमिकाओं में काम किया. फिर वो चीन और अमेरिका जैसे देशों में भारत के राजदूत रहे.
चीन से भारत के संबंधों में हाल के बरसों में जो स्थिरता और समझबूझ बनी है, उसके सूत्रधार निश्चित तौर पर जयशंकर कहे जा सकते हैं.

दिल्ली में पैदा हुए और यहीं पढ़े
वो दिल्ली में पैदा हुए. दिल्ली के एयरफोर्स स्कूल में पढ़े. इसके बाद सेंट स्टीफेंस के प्रतिभाशाली छात्रों में शुमार किये गए. उनके भाई संजय सुब्रह्मण्यम जाने माने इतिहासकार हैं. उनके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी है. जयशंकर को पढने का बहुत शौक है साथ ही विदेशी मामलों पर वो लिखते भी रहे हैं. कहा जाना चाहिए कि मोदी सरकार में विदेश विभाग को एक ऐसा मंत्री मिलने जा रहा है, जो इसी विभाग की देन रहा है, जो इस विभाग से जुड़ी हर छोटी बात का जानकार भी है.
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