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सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर: चाचा के नक्शेकदम पर चलते हुए भतीजे ने जीता था नोबेल पुरस्कार

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Updated: October 19, 2019, 10:20 AM IST
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर: चाचा के नक्शेकदम पर चलते हुए भतीजे ने जीता था नोबेल पुरस्कार
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर को 1983 में नोबेल पुरस्कार मिला था

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (Subrahmanyan Chandrasekhar) को खगोलविज्ञान (astrophysicist) के क्षेत्र में उनके खोज के लिए 1983 में नोबेल पुरस्कार (nobel prize) दिया गया. हालांकि 1930 में जब उन्होंने खोज की थी, उस वक्त उनके खोज पर किसी को भरोसा नहीं था...

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आज भारत के महान खगोलशास्त्री सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (Subrahmanyan Chandrasekhar) का जन्मदिन है. सुब्रह्मण्यम चंद्रेशेखर को खगोलशास्त्र (astrophysicist) के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1983 में नोबेल पुरस्कार (Noble Prize) से सम्मानित किया गया था. उन्होंने अपने चाचा सी वी रमण (C C Raman) की राह पर चलते हुए नोबेल पुरस्कार हासिल किया था. सीवी रमण को 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार हासिल हुआ था.

चंद्रशेखर का जन्म 19 अक्टूबर 1910 को लाहौर में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मद्रास में हुई. उनकी प्रतिभा का पता बचपन में ही चल गया था. सितारों की दुनिया में वो कुछ नया करना चाहते थे. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनकी मां विद्वान बुद्धिजीवी महिला थीं. चंद्रशेखर के पिता चाहते थे कि वो किसी तरह से कोई सरकारी नौकरी हासिल कर लें. लेकिन मां ने उनकी इच्छा को देखते हुए उन्हें साइंस पढ़ने और उसमें कुछ नया करने को प्रोत्साहित किया.

चाचा सीवी रमण को 1930 में मिला था नोबेल पुरस्कार

विज्ञान की परंपरा में उनके परिवार में पहले से ही थी. जब सुब्रह्मण्यम चंद्रेशेखर की उम्र 20 बरस की थी उनके चाचा सीवी रमण को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था. उसी साल चंद्रशेखर ने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से फीजिक्स में ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल की थी. चंद्रशेखर अपने चाचा सीवी रमण की तरह साइंस के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करना चाहते थे. उन्होंने इसके लिए खगोल विज्ञान को चुना.

subrahmanyan chandrasekhar the nephew won the nobel prize following footsteps of his uncle cv raman
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर के चाचा सीवी रमण को 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला था


1930 में सुब्रह्मण्यम चंद्रेशेखर ने सितारों की उत्पति और उसके खत्म होने को लेकर रिसर्च पेपर प्रकाशित किया. चंद्रशेखर ने व्हाइट ड्वार्फ यानी श्वेत बौने नाम के नक्षत्रों का सिद्धांत दिया. तारों पर किए उनके गहन शोध और अनुसंधान कार्य और एक महत्वपूर्ण सिद्धांत चंद्रशेखर लिमिट के नाम से आज भी खगोल विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जाता है. 1983 में सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर को उनके इन कार्यों के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. चंद्रशेखर को विलियम फॉलर के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिला था.

चंद्रशेखर की खोज को शुरुआत में नहीं मिली थी मान्यता
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चंद्रशेखर ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में चंद्रशेखर लिमिट का सिद्धांत दिया था. लेकिन शुरुआती दौर में खगोलशास्त्री और उनके सहयोगी उनके काम से प्रभावित नहीं थे. चंद्रशेखर भारत सरकार के स्कॉलरशिप पर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने गए थे. यहीं पर उन्होंने चंद्रशेखर लिमिट का सिद्धांत दिया. लेकिन इस सिद्धांत से उनके शिक्षक और साथी छात्र प्रभावित नहीं थे. 11 जनवरी 1935 को उन्होंने अपनी खोज रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के सामने पेश की.

इसके बाद उस वक्त के महान खगोलशास्त्री सर आर्थर इडिंगटन ने चंद्रशेखर को अपना रिसर्च पेपर सबके सामने रखने को प्रोत्साहित किया. जब एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के सामने चंद्रशेखर ने अपने खोज के बारे में बताया तो उन्हीं सर आर्थर इडिंगटन ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. इडिंगटन का कहना था कि सिर्फ गणितीय खेल के जरिए चंद्रशेखर ने इस रिसर्च को तैयार किया है, जिसमें कोई दम नहीं है.

सर आर्थर इडिंगटन और चंद्रशेखर के बीच के झगड़े को बीबीसी ने अपने एक डॉक्यूमेंट्री में प्रसारित किया. इसमें इडिंगटन ने चंद्रशेखर की थ्योरी को Stellar buffoonery यानी तारकीय भैंस कहा था.
1944 में एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ने चंद्रशेखर को फिर से आमंत्रित किया. उस वक्त उनके खोज को मान्यता मिली. उसी साल इडिंगटन की मौत हो गई लेकिन आखिरी वक्त तक उन्होंने चंद्रशेखर से माफी नहीं मांगी.

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सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर की थ्योरी की वजह से ब्लैक होल के खोज में मदद मिली


कंप्यूटर के आविष्कार के बाद पता चली चंद्रशेखर के खोज की हकीकत

1966 में जब साइंस ने कुछ और तरक्की कर ली, कंप्यूटर और गणना करने वाली दूसरी मशीने सामने आ गईं तब जाकर पता चला कि चंद्रशेखर की गणना बिल्कुल सही थी. 1972 में ब्लैक होल की खोज हुई. ब्लैक होल के खोज में चंद्रशेखर की थ्योरी बड़े काम आई.

1937 में चंद्रशेखर अमेरिका शिफ्ट हो गए. सिर्फ 26 साल की उम्र में उन्होंने शिकागो यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू कर दिया. 1953 में अमेरिका ने उन्हें अपने यहां की नागरिकता दे दी. चंद्रशेखर अक्सर अमेरिका के लिए अपने प्यार के बारे मे बताते रहते थे. वो कहते थे कि अमेरिका में मुझे एक बात की बड़ी सुविधा है. यहां भरपूर आजादी है. मैं जो चाहे कर सकता हूं. कोई मुझे परेशान नहीं करता. 21 अगस्त 1995 को 84 साल की उम्र में हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया.

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First published: October 19, 2019, 10:20 AM IST
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