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जन्मदिन विशेष: अपने कॉलेज के दोस्त भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़े थे सुखदेव

सुखदेव (Sukhdev) को उनकी देशभक्ति के लिए ही नहीं बल्कि कुशल नेतृत्व क्षमता के लिए भी जाना जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

भगत सिंह (Bhagat Singh) के कॉलेज के समय से साथी रहे सुखदेव थापर (Sukhdev Thapar) का पूरा जीवन क्रांतिकारी (Revolutionary) विचारों और कार्यों से भरा था लेकिन उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे.

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    भारत में जब भी आजादी (Indian struggle for Independence) के क्रांतिकारियों की बात होती है तो भगतसिंह (Bhagat Singh) राजगुरू और सुखदेव थापर (Sukhdev Thapar) का नाम जरूर आता है. इनमें से सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को लुधिनयाना के लायलपुर मे पैदा हुए थे. कॉलेज के समय से ही उनके मन में देशप्रेम और क्रांति के बीज डले जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और देश का नाम रोशन कर शहीद हुए. लेकिन सुखदेख को देश में वह सम्मान और स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे.

    बचपन से देशसेवा की भावना
    बचपन से उनमें कुछ कर गुजरने की चाह थी. बचपन में पिता को खो चुके सुखदेव का लालन पालन उनके ताऊ लाला अचिन्त राम ने किया. उनका नेतृत्व कौशल कई समय पर उनके जीवन में बार बार दिखाई दिया. बचपन वे अछूत बच्चों को पढ़ाया करते थे. 12 साल की उम्र में उन पर जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना का गहरा असर हुआ और उनमें क्रांतिकारी बनने की भावना बलवती होती चली गई.

    कॉलेज में देशभक्ति का माहौल
    लायलपुर के सनातन धर्म हाईस्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद सुखदेव ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया जहां उनकी मुलाक़ात भगत सिंह के साथ हुई. यहां दोनों को क्रांतिकारी बनने के लिए उपयुक्त माहौल मिला इनके  इतिहास के अध्यापक ‘जयचंद्र विद्यालंकार’ ने इन्हें देशप्रेम से परिचित कराया और उन्हें  विद्यालय के प्रबंधक और जाने-माने क्रांतिकारी भाई परमानंद भी का सानिध्य मिला.

    कॉलेज में भी नेतृत्व कौशल
    एक कुशल नेता के रूप में सुखदेव कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों को भारत के गौरवशाली अतीत के बारे में भी बताया करते थे. उन्होंने अन्य क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर लाहौर में नौजवान भारत सभा शुरू की जिसके वे संयोजक थे. यह एक ऐसा संगठन था जो युवकों को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था. सुखदेव ने युवाओं में न सिर्फ देशभक्ति का जज्बा भरने का काम किया, बल्कि खुद भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया.

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    सुखदेव और भगतसिंह (Bhagat Singh) कॉलेज के समय से पक्के दोस्त थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


    एक प्रमुख योजनाकार
    1928 में ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ की स्थापना के बाद सुखदेव को पंजाब के संगठन की जिम्मेदारी दी गई. इसी बीच ‘साइमन कमीशन’ के विरोध करने पर हुए लाठीचार्ज में जब लाला लाजपथराय का देहांत हुआ तो सुखदेव और भगत सिंह ने ही बदला लेने का फैसला किया. इस सारी योजनाकार सुखदेव रहे. इतिहासकार कहते हैं कि सुखदेव इस युवा क्रांतिकारी आंदोलन की अन्य बहुत सी गतिविधियों के सूत्रधार थे.

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    भगत सिंह के नाम का सुझाव
    सुखदेव पर किताब लिख चुके डॉक्टर हरदीप सिंह के मुताबिक 1929 में सेंट्रल एसेंबली में बम फेंकने का जिम्मा पहले भगत सिंह को नहीं दिया गया था. क्योंकि पुलिस को पहले से ही उनकी तलाश थी जिसके चलते क्रांतिकारी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह पकड़े जाएं. लेकिन सुखदेव भगत सिंह के नाम पर अड़ गए. उनका कहना था कि भगत सिंह लोगों में जागृति पैदा कर सकते हैं.

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    भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर षड़यंत्र मामले में फांस दी गई थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


    दोस्त की कुर्बानी?
    सुखदेव का तर्क सुनने के बाद भगत सिंह को उनकी बात सही लगी. कई लोगों ने सुखदेव को कठोर दिल भी कहा कि उन्होंने अपने दोस्त भगत सिंह को मौत के मुंह में भेज दिया. किताबों में हमने यही पढ़ा है कि भगत सिंह के गिरफ़्तार होने के बाद सुखदेव बंद कमरे में बहुत रोए थे कि उन्होंने अपने सबसे प्यारे दोस्त को कुर्बान कर दिया. भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद चारों ओर से गिरफ्तारी का दौर शुरू हुआ. लाहौर में एक बम बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई, जिसमें सुखदेव भी अन्य क्रांतिकारियों के साथ पकड़े गए.

    गांधी जी का खत एक ऐतिहासिक दस्तावेज
    सुखदेव विचारों से दृढ़ व अनुशासित व्यक्ति थे. उनका गांधी जी की अहिंसक नीति पर बिलकुल विश्वास नहीं था. उनका महात्मा गांधी को जेल से लिखा एक पत्र आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज है. उन्होंने  गांधी जी को ये भी लिखे पत्र में याद दिलाया कि सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस लेने पर उनके बंदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन बहुत से क्रांतिकारी अब भी जेल में सड़ रहे हैं.

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    दूसरे कैदियों की सुध लेने की जरूरत
    सुखदेव ने गांधी जी को ध्यान दिलाया कि गदर पार्टी के क्रांतिकारी, मार्शल लॉ के जरिए कैद किए गए लोग, बब्बर आकालियों, जैसे कई मामलों को गिनाया जिनमें गिरफ्तार किए गए लोग जेल में कानून से ज्यादा समय की सजा भुगत रहे हैं. और ऐसे लोगों के लिए उन्होंने क्या किया.  सुखदेव ने यह पत्र अपने कारावास के काल में लिखा. गांधी जी ने इस पत्र को उनके बलिदान के एक मास बाद 23 अप्रैल, 1931 को ‘यंग इंडिया’ में छापा था.

    23 मार्च 1931 को सुखदेव को राजगुरू, और भगतसिंह के साथ लाहौर षड़यंत्र में आरोपी बनाकर फांसी दे दी गई. और मात्र 24 साल की उम्र में ही सुखदेव अपने दोस्त भगतसिंह के साथ देश के लिए कुर्बान हो गए, लेकिन उन्हें देश में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार रहे.
    Published by:Vikas Sharma
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