सतह से हजार गुना गर्म क्यों है सूर्य का वायुमंडल, वैज्ञानिकों ने सुलझाई समस्या

सूर्य (Sun) के कोरोना और सतह के बीच तापमान का विशाल अंतर की जानकारी वैज्ञानिकों के 90 साल पहले से थी. (फाइल फोटो)

सूर्य (Sun) के कोरोना और सतह के बीच तापमान का विशाल अंतर की जानकारी वैज्ञानिकों के 90 साल पहले से थी. (फाइल फोटो)

सूर्य (Sun) का वायुमंडल कोरोना (Corona) उसकी सतह Photosphere की तुलना में हजार गुना गर्म है. इस पहली को वैज्ञानिक दशकों से सुलझाने का प्रयास कर रहे थे.

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कोरोना (Corona) यानी हमारे सूर्य का वायुमंडल (Atmosphere of Sun) हजार किलोमीटर तक ऊंचा है. यह सूर्य के आकार  की तुलना में बहुत कम दूरी है. जहां सूर्य की सतह जिसे फोटोस्फियर (Photosphere) कहते हैं करीब छह हजार डिग्री सेल्सियस तक गर्म रहती है. लेकिन उसके कुछ ही हजार किलोमीटर ऊपर मौजूद सौर वायुमंडल जिसे कोरोना कहा जाता है कि उससे सैकड़ों गुना ज्यादा गर्म है जिससे वहां का तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. अब इसकी वजह एक शोध में पता लगा ली गई है.

आमतौर पर नहीं होता है ऐसा

आमतौर पर किसी तारे की सतह का तापमान उसके वायुमंडल से कम ही होता है, लेकिन ऊंचाई के साथ सूर्य से दूरी बढ़ने का बाद भी तापमान में बेतहाशा वृद्धि दशकों से हमारे वैज्ञानिकों के लिए पहली बनी हुई थी. साल 1942 में स्वीडन के वैज्ञानिक हैन्स एल्फ्वेन इस पहेली का हल सुझाया था जिसके अनुसार सूर्य के अंदर से चुंबकीय प्लाज्मा बड़ी भारी मात्रा में ऊर्जा फोटोस्फियर को पार करते हुए ऊपर जाती हैं जिससे कोरोना इतना गर्म हो जाता है.

तब नहीं हो सका था प्रमाणित
इस सिद्धांत को व्यापक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली थी क्योंकि इसे तब प्रमाणित नहीं किया जा सका था. आनुभाविक अवलोकनों के आधार पर बताया गया था. नेचर में प्रकाशित इस अध्यय ने 80 साल पुराने इस सिद्धांत को सही ठहराया है. इसे इस उच्च ऊर्जा की प्रक्रिया का पृथ्वी पर उपयोग किए जाने की दिशा में एक और कदम बताया जा रहा है.

कब हुई थी इस घटना की पहचान

कोरोना की गर्म होने की समस्या को 1930 के दशक में पहचाना गया था, जब स्वीडन के ही स्पैक्ट्रोस्कोपिस्ट बेंग्ट एडलन और जर्मन खगोलभौतिकविद वाल्टर ग्रोट्रेन ने सबसे पहले इस घटना का अवलोकन किया. उन्होंने बताया कि कोरोना का अस्तित्व तभी हो सकता है जब उसका तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच पाता हो.



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सूर्य (Sun) में पाया जाने वाला यह अनोखेपन की वजह उसकी संरचना में छिपी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

सतह का तापमान

पृथ्वी पर देखने से पता चलता है कि कोरोना सूर्य की सतह फोटोस्फियर से हजार गुना ज्यादा गर्म है. फोटोस्फियर के बारे में पता लगाना वैज्ञानिकों के लिए तुलनात्मक रूप से काफी आसान था. इलेक लिए हमें केवल सूर्य से पृथ्वी तक पुहंचने वाली किरणों को मापने की जरूरत होती है और उसके तुलना स्पैक्ट्रम मॉडल से करनी होती है जिससे प्रकाश के स्रोत का तापमान का पता चल जाता है.

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प्लाज्मा की गतिविधि

पिछले कई दशकों से प्रोटोस्फियर के तापमान का अनुमान छह हजार डिग्री के आसपास तक ठहर रहा था. वैज्ञानिकों के मुताबिक सूर्य लगभग पूरी तरह से प्लाज्मा से बना है जो बहुत अधिक आयनिकृत गैस होती है जिसमें विद्युत आवेश होता है. सूर्य के अंदरूनी भाग के ऊपर के हिस्से में प्लाज्मा की गतिविधि विशाल मात्रा में विद्युत तरंगें और शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड पैदा करती है.

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सूर्य (Sun) के आंतरिक हिस्सों से बड़ी मात्रा में उच्चा ऊर्जा तरंगे सतह को पार कर कोरोना तक पहुंचती हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

कैसे होता है ये

वैज्ञानिकों ने देखा कि मैग्नेटिक और विद्युतीय फील्ड सूर्य के अंदर से संवहन द्वारा ऊपर उठते हैं जैसे पृथ्वी के वायुमंडल में पानी की वाष्प ऊपर उठती है. ये सतह पर पहुंच कर काले धब्बों का निर्माण करते हैं जो केवल मैग्नेटिक फील्ड का समूह होते हैं. एल्फेन की थ्योरी कहती है कि सूर्य के अंदर चुंबकीय प्लाज्मा और आवेशित कण मैग्नेटिक फील्ड में व्यवधान पैदा कर देते हैं जिससे विशाल मात्रा में ऊर्जा तरंगे लंबी दूरी तक, सूर्य के ऊपरी वायुमंडल तक चली जाती हैं और उच्च तापमान की स्थिति बना देती हैं.

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इन तरंगों को एल्फवेन तरंगें कहा जाता है जिसके लिए एल्फवेन को 1970 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था, लेकिन इन तरंगों को अवलोकित नहीं किया जा सका था. हाल ही में न्यू मैक्सिको में स्थापित एक उन्नत उपकरण इंटरफेरोमीचर बाइडाइमेंशनल स्पैक्ट्रोपोलरीमीटर (IBIS) ने इन तरंगों का अवलोकन संभव बनाया और सात शोध संस्थानों के शोधकर्ता इन तरंगों की पुष्टि कर सके.

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