क्या एनकाउंटर के मामले पर स्वतः संज्ञान ले सकती है अदालत

क्या एनकाउंटर के मामले पर स्वतः संज्ञान ले सकती है अदालत
कोर्ट खुद ही संज्ञान लेते हुए इसपर सख्त आदेश दे सकती है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

एनकाउंटर का मामला अगर संदिग्ध लगता है तो कोर्ट इस मामले में खुद एक्शन ले सकती (suo motu cognizance of court on fake encounters) है. इसके लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट (Supreme court of India) दोनों के पास ही पावर है.

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कानपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के मास्टरमाइंड विकास दुबे की शुक्रवार सुबह एनकाउंटर में मौत हो गई. पुलिस का कहना है कि विकास भागने की कोशिश के दौरान फायरिंग कर रहा था और जवाबी कार्रवाई में वो मारा गया. हालांकि एनकाउंटर पर काफी सवाल उठ रहे हैं. आम लोगों से लेकर राजनेता भी इसे फेक एनकाउंटर बता रहे हैं. हाल के सालों में कथित नकली मुठभेड़ की घटनाएं बढ़ूी हैं. कानूनी जानकारों का कहना है कि कोर्ट खुद ही संज्ञान लेते हुए इसपर सख्त आदेश दे सकता है, तभी फेक इनकाउंटर पर रोक लगेगी. जानिए, कौन से एनकाउंटर के मामले चर्चित रहे हैं और क्या कहते हैं कानून के जानकार.

साल 2019 में हैदराबाद में गैंगरेप के बाद युवती की हत्या के मामले में पुलिस ने अपराधियों का एनकाउंटर कर दिया. एक तरफ आम जनता कार्रवाई के पक्ष में थी तो दूसरी और एक बड़ा तबका इसे पुलिस को कानून के रिप्लेसमेंट के तौर पर देख रहा था. इसे फेक मुठभेड़ कहते हुए खुद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कार्रवाई की मांग की. हालांकि अब तक कोर्ट ने कोई ठोस कदम नहीं लिया है. इस तरह के ढेरों मामले हैं, जिनमें प्रमाण मिलते रहे हैं कि पुलिस ने फेक एनकाउंटर किया. कई बार पुलिस दबाव में आकर निर्दोष को भी मुठभेड़ के बहाने मार देती है. ऐसे मामलों में शोरगुल होने, परिवार या मानवाधिकार संगठनों के एक्टिव होने पर कार्रवाई होती है. हालांकि कोर्ट खुद भी एक्शन ले सकता है.

पुलिसकर्मियों को हर एनकाउंटर के बाद इस्तेमाल किए गए हथियार व गोलियों का हिसाब देना होता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)




विकास दुबे मामले में एक तबका संतोष जता रहा है कि तुरंत कार्रवाई हो गई तो दूसरी तरफ बहुत से लोग इसपर परेशान हैं कि इसी तरह से चलता रहा तो कानून व्यवस्था के मायने खत्म हो जाएंगे. सोशिल मीडिया पर भी लोग काफी लिख-बोल रहे हैं. जैसे रिटायर्ड IAS सूर्य प्रताप सिंह ने विकास एनकाउंटर के खिलाफ लिखते हुए माना कि ऐसा होने पर तानाशाही आ जाएगी. उनका ट्वीट नीचे देखा जा सकता है-



इस बारे में न्यूज़18 से बातचीत में कड़कड़डूमा कोर्ट के वरिष्ठ वकील मनीष भदौरिया कहते हैं कि विकास दुबे मामले के कई पहलू हो सकते हैं. जैसे हो सकता है कि पुलिस की दबिश के दौरान विकास दुबे भाग गया हो और उसके गुर्गों ने 8 पुलिसवालों को मारा हो. हो सकता है कि खुद विकास ने मारा हो या फिर हो सकता है कि ऐसा करने का आदेश दिया हो. ये सब जांच की बात थी. अगर जल्दी कार्रवाई होनी थी तो इसके लिए भी कोर्ट आदेश दे सकती थी कि स्पेशल कोर्ट बैठेगी और तीन महीने या फलां वक्त तक जांच पूरी हो जाएगी. ऐसा बहुत से मामलों में हो चुका है. विकास दुबे मामले में भी पूरी जांच होनी चाहिए थी.

माना जा रहा है कि विकास दुबे मामले के कई पहलू हो सकते हैं


वैसे किसी भी संदिग्ध फेक एनकाउंटर को लेकर 156 सीआरपीसी में ये प्रोविजन है कि अगर कोर्ट को अपने-आप या किसी से सूचना मिलती है कि कहीं पुलिस एनकाउंटर हुआ है तो इलाका मजिस्ट्रेट के पास ये ताकत है कि वो तुरंत FIR करके आगे के लिए दिशा-निर्देश दे सकता है. इसी तरह से 482 सीआरपीसी और 226 आर्टिकल में हाईकोर्ट को और आर्टिकल 32 में सुप्रीम कोर्ट को ये ताकत मिली है कि वो स्वतः किसी भी मामले पर संज्ञान ले सकता है. आज से कुछ सालों पर सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट भी आई थी कि तुरंत FIR की जाएगी और पुलिसवालों की जांच होगी. फिर ये बात हुई कि पुलिस खूंखार अपराधियों के मामले में भी डरी रहेगी कि काम करने पर जांच हो रही है. तब उसमें कई नियम जोड़े गए.

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एनकाउंटर मामले में सु्प्रीम कोर्ट कहता है कि पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे. सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंचने एक फैसले के दौरान एनकाउंटर के बारे में बात करते हुए लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर की भी जांच होनी चाहिए. अगर किसी मामले में पुलिस की तरफ से कार्रवाई की बात आता है, जिसमें अपराधी/आरोपी की मौत हो जाए तो इसपर तत्काल प्रभाव से धारा 157 के तहत कोर्ट में FIR दर्ज करनी चाहिए. इसी तरह से धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फायरिंग में हुई हर एक मौत की मजिस्ट्रियल जांच होनी ही चाहिए. साथ ही पुलिसकर्मियों को हर एनकाउंटर के बाद इस्तेमाल किए गए हथियार व गोलियों का हिसाब देना होता है.

आर्टिकल 32 में सुप्रीम कोर्ट को ये ताकत मिली है कि वो स्वतः किसी भी मामले पर संज्ञान ले सकता है


देखा जाए तो असल में भारतीय संविधान में एनकाउंटर टर्म ही नहीं है. पुलिस इसका उपयोग उन हालातों को बताने के लिए करती है, जब पुलिस और अपराधी के बीच भिड़ंत में अपराधी की मौत हो जाए. कानूनन एनकाउंटर वैध नहीं है क्योंकि इसमें मासूम की मौत का खतरा हमेशा रहता है क्योंकि मामला कोर्ट तक पहुंचा नहीं होता और न ये पक्का होता है कि पुलिस के सामने आया शख्स अपराधी है ही. ऐसे में खुद को जस्टिफाई करने के लिए पुलिस कहती है कि उसे आत्मरक्षा के लिए गोलियां चलानी पड़ीं. सीआरपीसी की धारा 46 के मुताबिक अपराधी अगर भागे या पुलिस पर हमला करे तो पुलिस जवाबी हमला कर सकती है.

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बीते कुछ दशकों में मुंबई, चैन्नई जैसे महानगरों में पुलिस एनकाउंटर की घटनाएं तेजी से बढ़ीं. National Human Rights Commission (NHRC) का आरोप है कि बहुत से एनकाउंटर फर्जी होते हैं. जो भी हो, एनकाउंटर के मामलों में काफी दांव-पेंच दिखते हैं. आरोपी/अपराधी का पक्ष लेने वाले और एककाउंटर का विरोध करने वालों के खिलाफ कई कार्रवाइयां हो चुकी हैं. जैसे पंजाब में क्रिमिनल डिफेंस अटॉर्नी सुखविंदर सिंह भाटी साल 1994 की मई में अचानक गायब हो गए. कथित तौर पर अपराधियों के पक्ष में एनकाउंटर के खिलाफ बोलने के कारण पुलिस ने ही उनकी हत्या कर दी. भारत में कई सारे विवादास्पद एनकाउंटर रहे तो पाकिस्तान भी कमोबेश ऐसा ही है. वहां भी काफी एनकाउंटर होते आए हैं, जिन्हें कथित तौर पर फेक एनकाउंटर माना जाता है.
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