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Ayodhya Verdict : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को किस आधार पर पलटा

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 5:13 PM IST
Ayodhya Verdict : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को किस आधार पर पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने इलाबाद हाईकोर्ट के फैसले में कई विसंगतियों के चलते पूरी तरह से उलट फैसला दिया.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 2.77 एकड़ की विवादित जमीन मंदिर बनाने के लिए राम लला विराजमान को सौंप दी. साथ ही सरकार को मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन अलग से उपलब्ध कराने का निर्देश दिया.

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  • Last Updated: November 9, 2019, 5:13 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों से लंबित अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (Ram Janmabhoomi-Babri Masjid dispute) विवाद पर आज फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को मंदिर बनाने के लिए राम लला विराजमान के अधिकार में सौंप दिया है. जबकि सरकार को मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश जारी किया है. दरअसल अयोध्या विवाद का मामला 2010 में सुप्रीम कोर्ट आया था. बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि विवाद पर इलाहाबाद काईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया था.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर 40 दिनों तक लगातार सुनवाई के बाद फैसले के लिए सुरक्षित कर लिया था. बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि विवाद पर चार अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई की. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को तीन हिस्सों में विभाजित किया था. विवादित जमीन को बराबर-बराबर राम लला विराजमान, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा को सौंपा गया था.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को तीन हिस्सों में विभाजित किया था.


हाईकोर्ट के फैसले से कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं था. जिससे यह मामला 2010 में सुप्रीम कोर्ट में चला गया. 2010 में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई थीं. गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की एक बेंच ने अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई की थी.

हाईकोर्ट के बेंच में शामिल जस्टिस एस. यू. खान ने अपने फैसले में कहा था कि मामला विवादित स्थान पर कब्जे के बाद का है. इसलिए विवादित स्थल को तीनों पक्षों के बीच समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए. वहीं इस बेंच के दूसरे जज जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने कहा कि पूर्ण न्याय करने के लिए और मुकदमेबाजी से बचने के लिए विवादित भूमि को तीन हिस्सा में विभाजित किया जाना आवश्यक है.

2010 में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई थीं.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में कई गंभीर दोष
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से रद्द करते हुए अपना नया फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल के तीन हिस्सों में विभाजन के हाई कोर्ट के फैसले में एक गंभीर दोष की तरफ भी इशारा किया है. कोर्ट ने कहा कि याचिकर्ताओं को राहत देने के लिए कानून के सिद्धांतों के विपरीत जाकर फैसला दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्मोही अखाड़ा का विवादित भूमि के प्रबंधन और पूजा के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता है.  साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा की हाईकोर्ट का भूमि को तीन हिस्सा में बांटना कानूनन सही नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल के तीन हिस्सों में विभाजन के हाई कोर्ट के फैसले में एक गंभीर दोष की तरफ भी इशारा किया.


सार्वजनिक शांति बनाए रखने के मामले में भी हाई कोर्ट के फैसलों को सही नहीं माना जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि को विभाजित करने से दोनों पक्षों के हितों का संरक्षण नहीं होगा और न ही स्थायी शांति की स्थापना होगी.

राम जन्मभूमि में पहली याचिका 1950 में दायर
बता दें कि राम जन्मभूमि विवाद में मुकदमेबाजी की शुरुआत 1950 में हुई थी. भगवान राम के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने विवादित स्थल पर हिंदुओं की पूजा के अधिकार का दावा करते हुए फैजाबाद जिला अदालत में एक पिटीशन दायर की थी. इसके बाद चार और पिटीशन अदालत में दायर की गईं.

1950 में ही एक अन्य भक्त परमहंस रामचंद्र दास ने भी बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्तियों की पूजा और मूर्तियों को रखने के लिए मुकदमा दायर किया था. जिसे बाद में वापस ले लिया गया था. निर्मोही अखाड़ा ने एक याचिका दायर कर अयोध्या में 2.77 एकड़ भूमि पर प्रबंधन और पूजा करने का अधिकार मांगा.

बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्तियों की पूजा और मूर्तियों को रखने के लिए मुकदमा दायर किया था.


सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड बना मुस्लिम पक्षकार
निर्मोही अखाड़े की याचिका पर ट्रायल 1959 में शुरू हुआ था. इसके दो साल बाद सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व का दावा करते हुए अदालत में याचिका दायर की. मूल याचिकाकर्ताओं में शामिल राम लला विराजमान ने जन्मभूमि पर अधिकार के लिए अंत में मुकदमा दायर किया.

राम लला विराजमान ने 1989 में मुकदमा दायर किया गया था, जिसमें पूरे परिसर पर अधिकार की मांग की गई थी. 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद  सभी मुकदमों को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया. लगभग 18 साल बाद  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. जबकि याचिका के 9 साल बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया.

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First published: November 9, 2019, 4:47 PM IST
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