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‘क्रिमिनल’ नेताओं को क्यों टिकट देती हैं पॉलिटिकल पार्टियां

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को लेकर फैसला दिया है

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को लेकर फैसला दिया है

क्रिमिनल रिकॉर्ड (criminal record) वाले नेताओं की बढ़ती संख्या के बीच सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का ये महत्वपूर्ण फैसला है. पिछले काफी अरसे से सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर बहस चल रही थी.

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राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक अहम फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि (Criminal Background) वाले अपने नेताओं की जानकारी अपनी वेबसाइट पर दें. इसके साथ ही वो उनके बारे में फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बताएं. ऐसे नेताओं के बारे में राजनीतिक पार्टियां कम से कम एक स्थानीय और एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में जानकारी दें.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा है कि राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट देने के 72 घंटे के भीतर इसकी जानकारी चुनाव आयोग को दे और ऐसे लोगों को टिकट देने के पीछे वजह बताए. अगर राजनीतिक दल ऐसा नहीं करते हैं तो इसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी जाए.

क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले नेताओं की बढ़ती संख्या के बीच सुप्रीम कोर्ट का ये महत्वपूर्ण फैसला है. पिछले काफी अरसे से सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर बहस चल रही थी. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की बहस में हिस्सा लेते हुए चुनाव आयोग की तरफ से दलील दी गई थी कि इस बारे में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी तय की जाए. उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं को चुनाव में टिकट देने की जरूरत ही क्या है? वो ऐसे उम्मीदवारों को क्यों टिकट देते हैं?

राजनीतिक दल क्यों देते हैं आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट
इसका जवाब 2019 के लोकसभा चुनाव में जीते हुए उम्मीदवारों के आंकड़े से ही मिल जाता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में जीते उम्मीदवारों के आंकड़े से पता चलता है कि चुनाव में क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं की जीतने की संभावना 15.5 फीसदी रही. वहीं साफ सुथरी छवि वाले नेताओं के जीतने की संभावना सिर्फ 4.7 फीसदी रही. सवाल है कि जब जीत का यही फॉर्मूला है तो राजनीतिक पार्टियां चुनाव में क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं को कैसे न टिकट दे?

2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जीते हुए 539 उम्मीदवारों के बैकग्राउंड का अध्ययन किया गया. पता चला कि 233 सांसदों के ऊपर क्रिमिनल केसेज़ चल रहे थे. 2009 के मुकाबले 2019 में 44 फीसदी अधिक क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले सांसद लोकसभा में पहुंचे थे. यानी 10 साल में संसद के भीतर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या करीब दोगुनी हो गई. ऐसा क्यों हो रहा है? हम कहेंगे कि राजनीतिक पार्टियां क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को टिकट दे रही हैं, इसलिए वो चुनकर आ रहे हैं. राजनीतिक पार्टियां कहेंगी की जनता क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं को ही जिता रही है, इसलिए ऐसे लोगों को वो टिकट दे रहे हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजनीतिक दल अपने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की जानकारी वेबसाइट पर दें


2014 में लोकसभा के कुल 542 सांसदों में 185 सांसदों के ऊपर क्रिमिनल केसेज दर्ज थे. करीब 34 फीसदी दागी सांसद लोकसभा में पहुंचे थे. वहीं 2009 के चुनाव में 162 सांसद दागी थे, यानी करीब 30 फीसदी क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले सांसद लोकसभा की शोभा बढ़ा रहे थे.

2019 में जीते सांसदों का बायोडाटा डराने वाला है
2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे सांसदों का बायोडाटा स्कैन करने पर डराने वाली जानकारी सामने आती है. लोकसभा में कुल 233 दागी सांसद पहुंचे हैं. इनमें से करीब 159 सांसदों के खिलाफ गंभीर धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज है. यानी करीब 29 फीसदी सांसदों के ऊपर रेप, हत्या, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग और महिलाओं के खिलाफ किए अपराध के आरोप हैं.

2014 में गंभीर मुकदमों का सामना करने वाले सांसदों की संख्या 112 (21 फीसदी) थी. 2009 में इनकी संख्या 76 (14 फीसदी) थी. 2009 की तुलना में गंभीर अपराध का मुकदमा झेल रहे सांसदों की संख्या में 109 फीसदी का इजाफा हुआ है. अगर इन नेताओं से उन पर लगे आपराधिक मुकदमों को लेकर सवाल पूछा जाता है, तो उनका एक ही जवाब होता है- ये सब राजनीति से प्रेरित है. मुकदमा चल रहा है, कोर्ट ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया है. आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट देने के पीछे राजनीतिक पार्टियों के पास भी यही बहाना है.

क्यों जीत जाते हैं क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेता
क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेता हर पार्टी में हैं. किसी में थोड़े कम तो किसी में ज्यादा. मौजूदा दौर में चुनाव काफी खर्चीला हो चुका है. हर अगले चुनाव का खर्च पिछले चुनाव की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है. ईमानदारी से कहें तो किसी भी नेता या राजनीतिक पार्टी का साफसुथरे तरीके से चुनाव जीतना मुश्किल है.

राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अकेले दम पर अपने उम्मीदवारों का चुनाव प्रचार खर्च नहीं उठा सकतीं. उन्हें ऐसे उम्मीदवारों की जरूरत होती है, जो न सिर्फ अपना चुनाव का खर्च उठा सकें बल्कि पार्टी फंड को भी बढ़ाते रहें. आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता इसलिए बढ़ रहे हैं. धन और बाहुबल का कॉकटेल राजनीति में सत्ता हासिल करने का सबसे सटीक फॉर्मूला बन चुका है.

राजनीतिक पार्टियों का मकसद होता है, चुनाव में जीत हासिल करना. इसमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता अपनी ताकत के बल पर बेहतर प्रतियोगी साबित होते हैं. ज्यादातर क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं की अपने इलाके में रॉबिन हुड की छवि होती है. वो लोकप्रिय होते हैं. उनकी जनता में पैठ होती है. राजनीतिक पार्टियां ऐसे नेताओं की जीतने की संभावना को देखते हुए उनसे किनारा नहीं कर सकतीं.

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राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की है


क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले नेताओं को क्यों जिताती है जनता
क्या ये माना जाए कि अशिक्षित होने की वजह से, जानकारी न होने की वजह से या लापरवाही से जनता आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेता को चुन लेती है? ऐसा कहना ठीक नहीं होगा. सिर्फ यही सारी वजहें नहीं हैं. इस पर कई तरह के फैक्टर काम करते हैं.

ऐसे उम्मीदवारों के लिए कई बार जातीय और धार्मिक समीकरण काम कर जाता है. इस तरह के कई नेताओं को उनकी रॉबिन हुड वाली छवि का फायदा मिलता है. लोग ऐसे नेताओं से इंसाफ और सुरक्षा मिलने की उम्मीद से भी लोग उन्हें वोट करते हैं.

2009 के लोकसभा चुनाव में लोकनीति ने वोटर्स के व्यवहार को लेकर एक सर्वे किया. उस चुनाव में वडोदरा (गुजरात) और कासरगोड (केरल) को छोड़कर बाकी सभी संसदीय क्षेत्रों में एक न एक साफ सुथरी छवि वाला नेता चुनाव लड़ रहा था. सर्वे में मतदान करने वाले लोगों ने बताया कि अगर उम्मीदवार उनके काम करवा दे तो उन्हें ऐसे उम्मीदवारों के क्रिमिलन बैकग्राउंड से कोई फर्क नहीं पड़ता है. सर्वे में इस बात का पता चला कि लोग ईमानदार नेता की बजाए ऐसा नेता चाहते हैं, जिन तक वो आसानी से पहुंच सकें.

ये एक कड़वी हकीकत है कि राजनीति में ईमानदारी की गुंजाइश कम ही लोगों को रहती है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये तो कह दिया है कि सभी राजनीतिक दल अपने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की जानकारी जनता को दें. सवाल है कि इससे कुछ असर पड़ेगा? क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों से वाकिफ नहीं होते. जैसे राजनीतिक पार्टियां समझबूझ कर ऐसे उम्मीदवारों का चयन करती हैं, वैसे ही जनता भी जानते बूझते ऐसे नेताओं को निर्वाचित करती है.

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