कितना प्राचीन है Ayurveda, किस तरह हजारों साल पहले होती थी सर्जरी?

प्राचीन समय में  आयुर्वेद अपने में संपूर्ण चिकित्सा कहलाती रही - सांकेतिक फोटो (pixabay)

प्राचीन समय में आयुर्वेद अपने में संपूर्ण चिकित्सा कहलाती रही - सांकेतिक फोटो (pixabay)

प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सक सुश्रुत को सर्जरी का जनक माना जाता है. कथित तौर पर उनकी किताब सुश्रुत संहिता (Sushruta Samhita in Ayurveda) के अंग्रेजी अनुवाद को पढ़कर ब्रिटिश डॉक्टरों ने लाशों पर सर्जरी शुरू की, जो साल 1814 में कामयाब हुई.

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कोरोना संकट के बीच देश में आयुर्वेद और एलोपैथिक (Ayurveda versus Allopathy) के बीच बहस चल पड़ी है. चिकित्सा का लगभग 200 सदी पहले शुरू हुआ विज्ञान एलोपैथ खुद को ज्यादा बेहतर मानता है, तो आयुर्वेद भी दावों में पीछे नहीं. अनुमान है कि आयुर्वेद दुनिया के सबसे प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में से है. आयुर्वेदिक दवा लगभग 3 हजार साल पुरानी मानी जाती रही है. यहां तक कि इसमें सर्जरी भी होती थी.

किस शाखा के तहत आता है ये चिकित्सा विज्ञान 

ब्रिटानिक वेबसाइट के मुताबिक ज्यादातर आयुर्वेदिक चिकित्सक ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में काम करते हैं और लगभग 500 मिलियन लोगों को वैकल्पिक इलाज देते हैं. बता दें कि वैकल्पिक इलाज, उसे कहते हैं जो बीमारी के मुख्य इलाज के अलावा होता है. जैसे कैंसर के मरीज की दवाएं तो एलोपैथ होंगी, लेकिन साथ-साथ में वे पारंपरिक इलाज भी अपनाने लगते हैं, ताकि जल्दी राहत मिल सके.

वैसे आयुर्वेद अपने में संपूर्ण चिकित्सा कहलाती रही और माना जाता है कि वहीं से सर्जरी की शुरुआत हुई. यहां तक कि प्लास्टिक सर्जरी जैसी एकदम आधुनिक चीज भी आयुर्वेद का हिस्सा रह चुकी है.

Ayurveda versus Allopathy
ब्रिटानिक वेबसाइट के मुताबिक ज्यादातर आयुर्वेदिक चिकित्सक ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में काम करते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)

सर्जरी भी हुआ करती थी 

अगर आप मानते हैं कि प्लास्टिक सर्जरी और नाक-होंठों को आकार देना मॉर्डन युग और पश्चिमी देशों की देन है तो यहां ये कहना चाहिए कि इसकी शुरुआत करीब 2500 साल पहले भारत में हो चुकी थी. प्राचीन भारतीय चिकित्सक सुश्रुत, जिन्हें सर्जरी का जनक माना जाता है. उन्होंने सुश्रुत संहिता में इसका जिक्र किया है, जिस बारे में कोलंबिया सर्जरी नामक वेबसाइट में विस्तृत रिपोर्ट मिलती है.



अपराधी कराते थे नाक की सर्जरी 

प्राचीन भारत में क्यों नाक की प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ती थी. इसकी कहानी भी कम रोचक नहीं है. प्राचीन भारत में आमतौर पर गंभीर अपराधों में सजा के तौर पर नाक और कान काट दिए जाते थे. इसके बाद सजायाफ्ता अपराधी चिकित्सा विज्ञान की मदद से नाक वापस पाने की कोशिश करता था.

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लगभग 300 तरह की सर्जिकल प्रक्रियाओं का उल्लेख

माना जाता है कि सर्जरी के जनक माने जाने वाले सुश्रुत ने नाक वापस जोड़ने की सर्जरी सफलतापूर्वक करते थे. उन्होंने लिखा है कि नाक की सर्जरी कैसे हो और किस तरह से स्किन ग्राफ्टिंग की जाए. संहिता में लगभग 300 तरह की सर्जिकल प्रक्रियाओं का उल्लेख है. इसमें कैटरेक्ट, ब्लैडर स्टोन निकालना, हर्निया और यहां तक कि सर्जरी के जरिए प्रसव करवाए जाने का भी जिक्र है.

Ayurveda versus Allopathy
सुश्रुत संहिता में लगभग 300 तरह की सर्जिकल प्रक्रियाओं का उल्लेख है- सांकेतिक फोटो (twitter)

आज इसे रिकंस्ट्रक्टिव राइनोप्लास्टी के रूप में जानते हैं 

सुश्रुत संहिता में जिक्र है कि गालों या माथे से नाक के बराबर की स्किन काट कर उसका सर्जरी के दौरान इस्तेमाल किया जाता था. सर्जरी के बाद किसी तरह का संक्रमण रोकने के लिए औषधियों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती थी. इसके तहत नाक में औषधियां भरकर उसे रूई से ढंक दिया जाता था.

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सुश्रुत संहिता का 8वीं सदी में अरबी भाषा में अनुवाद हुआ, जिसके बाद ये पश्चिमी देशों तक पहुंचा. 14वीं और 15वीं सदी में इटलीवालों को इसकी जानकारी हुई.

लंदन की पत्रिका में लिखा था इस बारे में 

बाद में साल 1793 में भारत प्रवास के दौरान दो अंग्रेज सर्जनों ने नाक की सर्जरी अपनी आंखों से देखी. ये तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान की बात है. अगले साल लंदन की 'जेंटलमैन' मैगजीन में इसका जिक्र भी हुआ. एक ब्रिटिश सर्जन जोसेफ कॉन्सटेन्टिन ने इस प्रक्रिया के बारे में पढ़ने के बाद 20 सालों तक लाशों के साथ इस प्रक्रिया की प्रैक्टिस की. इसके बाद असल ऑपरेशन किया गया जो कामयाब रहा. ये साल 1814 की बात है.

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सुश्रुत को सर्जरी का जनक कहा जाता है

उनकी तस्वीर एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ऑफ इंडिया की मुहर (सील) पर बनी होती है. पूरी दुनिया में नाक की सर्जरी के सुश्रुत के तरीके का ही संशोधित तरीका इस्तेमाल होता है, जिसे इंडियन मैथड के तौर पर जाना जाता है.

Ayurveda versus Allopathy
सर्जरी के अलावा सुश्रुत संहिता में 11 सौ बीमारियों का जिक्र है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

कई तरह के इलाज के बारे में लिखा 

सर्जरी के अलावा सुश्रुत संहिता में 11 सौ बीमारियों का जिक्र है. साथ ही उनके इलाज के लिए 650 तरह की दवाओं का भी उल्लेख है. ये बताती है कि चोट लगने पर खून के बहाव को कैसे रोका जाए, टूटी हड्डियां कैसे जोड़ी जाएं. सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश करने के लिए शराब के साथ कई तरह की औषधियां मिलाई जाती थीं.

ऐसे की जाती थी सर्जरी के बाद सिलाई 

सबसे अनोखा था कटे हुए स्थान की सिलाई का तरीका. चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख है कि ये काम बड़ी और खास तरह की चींटियां किया करतीं. उन्हें क्रम में घाव के ऊपर रख दिया जाता. उनके जबड़े घाव के लिए क्लिप (wound clips)का काम करते. टांकों की जगह चींटियों का उपयोग तब आम था.

कब शुरू हुआ एलोपैथ

एलोपैथ टर्म का सबसे पहले इस्तेमाल साल 1810 में हुआ था, जिसे जर्मन चिकित्सक सैमुअल हेनिमैन (Samuel Hahnemann) ने दिया था. शुरू-शुरू में इसका विरोध हुआ लेकिन जल्दी ही इसने मुख्य चिकित्सा की जगह ले ली. इसके तहत डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट, और दूसरे हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री-डिप्लोमा लेकर और फिर लाइसेंस लेकर प्रैक्टिस कर सकते हैं. इसके तहत दवाएं, सर्जरी, रेडिएशन और दूसरी तरह की थैरेपी आती हैं.

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