बीजेपी की फायरब्रांड नेता सुषमा स्वराज को क्यों था ज्योतिष पर इतना भरोसा

सुषमा स्वराज सिर्फ 25 साल की उम्र में कैबिनेट मिनिस्टर बन गई थीं

सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) के बारे में कहा जाता है कि वो ज्योतिष (Astrology) को बहुत मानती थीं. हर गुरुवार को पीले रंग की साड़ी पहनती.

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    आज बीजेपी (BJP) की फायरब्रांड नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) की जन्म जयंती है. एक नेता और खासतौर पर विदेशमंत्री रहते हुए सुषमा स्वराज ने जो ख्याति हासिल की. उसे लंबे वक्त तक भुलाया नहीं जा सकता. भारतीय राजनीति में उनके नाम कई रिकॉर्ड दर्ज हैं. वो पहली सबसे कम उम्र की महिला कैबिनेट मिनिस्टर बनीं, पहली फुल टाइमर महिला रक्षामंत्री बनीं, किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता बनीं. सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल के कुछ रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हैं.

    पिछले साल अगस्त में उनके निधन से बीजेपी को जबरदस्त झटका लगा. बीजेपी में रहते हुए सुषमा स्वराज ने पार्टी को अमूल्य योगदान दिया था. विदेशमंत्री के तौर पर वो इतनी लोकप्रिय हुईं कि उनके निधन पर पाकिस्तान के लोगों ने शोक संदेश भेजे और उन जैसे करिश्माई व्यक्तित्व वाली महिला के जाने पर दुख जताया.

    वकालत से शुरू किया था करियर
    सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला कैंट में हुआ था. उनके पिता का नाम हरदेव शर्मा और माता का नाम लक्ष्मी देवी था. सुषमा स्वराज के पैरेन्ट्स पाकिस्तान में लाहौर के धरमपुरा इलाके से ताल्लुक रखते थे. सुषमा स्वराज ने अंबाला कैंट के सनातन धर्म कॉलेज से शुरुआती शिक्षा हासिल की. उन्होंने संस्कृत और राजनीति शास्त्र में बीए की डिग्री हासिल की थी. इसके बाद उन्होंने पंजाब के लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली.

    1973 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से वकालत शुरू की. इसी दौरान वो सुप्रीम कोर्ट के वकील स्वराज कौशल के संपर्क में आईं. 13 जुलाई 1973 को उन्होंने स्वराज कौशल से शादी कर ली. स्वराज कौशल उस वक्त के मजदूर नेता के तौर पर विख्यात जॉर्ज फर्नाडिंस के करीबी थे. सुषमा स्वराज और स्वराज कौशल ने मिलकर जॉर्ज फर्नाडिंस का फेमस बड़ौदा डायनामाइट केस लड़ा था.

    1977 में बनीं सबसे कम उम्र की महिला कैबिनेट मंत्री
    1970 में ही सुषमा स्वराज भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़कर राजनीति में उतर गईं थीं. लेकिन राजनीति में अच्छे तरीके से सक्रिय आपातकाल के दौरान हुईं. उन्होंने जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति का समर्थन किया था. 1977 के हरियाणा चुनाव में वो पहली बार विधायक चुनी गईं. सिर्फ 25 साल की उम्र में वो कैबिनेट मंत्री बनीं. उन्होंने शिक्षा मंत्रालय का प्रभार दिया गया. यह उस समय सबसे कम उम्र में मंत्री होने का रिकॉर्ड था.

    उनके नाम सबसे कम उम्र में जनता पार्टी हरियाणा की अध्यक्ष बनने का रिकॉर्ड भी है. इसके अलावा उनके नाम किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता होने का भी रिकॉर्ड है.

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    सुषमा स्वराज के नाम कई राजनीतिक रिकॉर्ड दर्ज हैं


    साल 1990 में वह पहली बार सांसद बनीं. वह 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिनों की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री थीं. इसके बाद केंद्रीय राजनीति से उनकी वापसी फिर से एक बार राज्य में हुई. साल 1998 में उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई और वह दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि यह सरकार ज्यादा दिनों तक न चल सकी.

    जब सोनिया गांधी के खिलाफ चुनावी जंग में सुषमा स्वराज ने की आक्रामक राजनीति
    उनके राजनीतिक करियर ने साल 1999 में फिर से टर्न लिया और उन्हें सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी से चुनावी रण में उतारा गया. दरअसल बीजेपी का यह कदम विदेशी बहू सोनिया गांधी के जवाब में भारतीय बेटी को उतारने की नीति का हिस्सा था. बेल्लारी के चुनाव में देश ने उनकी आक्रमक राजनीति देखी.

    1999 के चुनाव में कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी एक साथ दो लोकसभा सीट, उत्तर प्रदेश में गांधी परिवार की पुश्तैनी सीट अमेठी और कर्नाटक में कांग्रेस की सुरक्षित मानी जाने वाली बेल्लारी सीट से चुनावी मैदान में उतरी थीं. जबकि बीजेपी ने 'आदर्श भारतीय नारी' के तौर पर सुषमा स्वराज को चुनावी रण में उतारा.

    उन दिनों बीजेपी स्वराज को आदर्श भारतीय नारी की तरह प्रदर्शित कर रही थी. सुषमा के उन दिनों जो फोटो सामने आते थे, उनमें वह माथे पर एक बड़ी बिंदी, मांग में सिंदूर लगाए भारतीय त्योहारों को मनाते देखी जाती थीं. इस अवतार में वह बीजेपी के लिए एक ऐसी राष्ट्रवादी छवि बन गई थीं, जो इटली में जन्मी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा पत्नी सोनिया गांधी की छवि का मुकाबला कर सकती थीं.

    जब सुषमा स्वराज ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल होने को लेकर तीखे बयान दिए
    1999 के चुनावी जंग ने सुषमा और सोनिया के रिश्ते तल्ख कर दिए थे. 'भारतीय बेटी' और 'विदेशी बहू' के बीच संघर्ष ने तल्खियों के बीज बोए गए थे. सुषमा स्वराज बेल्लारी में चुनाव हार गईं. लेकिन यह तो इन दो ताकतवर राजनीतिक महिलाओं के बीच संघर्ष की शुरुआत मात्र थी. साल 2004 में इनके बीच की खटास को फिर से देखा गया. जब यूपीए ने आम चुनाव जीता और कांग्रेस के वफादारों ने सोनिया गांधी से प्रधानमंत्री पद संभालने का आग्रह किया.

    इन सुर्खियों के बीच स्वराज के भीतर का आक्रोश बाहर आ गया और उन्होंने ऐसा होने पर अपना सिर मुड़वाने और सफेद वस्त्र पहन लेने की धमकी तक दे दी. यह शोक जाहिर करने का हिंदू पारंपरिक संकेत होता अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन जातीं. उस समय, स्वराज ने कहा था कि उनकी यह प्रतिक्रिया शहीदों से भावनात्मक लगाव के कारण थी. साल 2000 में वह राज्य सभा सांसद चुनी गईं और अटल बिहारी सरकार में फिर से सूचना प्रसारण मंत्री बनीं.

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    सुषमा स्वराज को ज्योतिष पर अटूट भरोसा था


    उन्होंने कहा था, 'ब्रिटिश शासन की समाप्ति और कई भारतीयों द्वारा किए गए बलिदान के बाद भी आज एक विदेशी को (प्रधानमंत्री) चुना जा रहा है.' स्वराज तब से इस बात के समर्थन में रहीं. उन्होंने कई मौकों पर सोनिया गांधी की प्रशंसा व्यक्त की लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए उनके चयन को हमेशा अस्वीकार्य ही किया.

    हालांकि बाद में सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री पद को स्वीकार करने से इनकार कर दिया तो यह खेल उलटा पड़ गया. भारतीय बहू के साथ परम बलिदान करने वाली छवि सोनिया ने अपने इस फैसले से गढ़ दी थी.

    सुषमा स्वराज को था ज्योतिष पर अटूट भरोसा
    साल 2000 में वह राज्य सभा सांसद चुनी गईं और अटल बिहारी सरकार में फिर से सूचना प्रसारण मंत्री बनीं. इस दरमियान न सिर्फ बीजेपी बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका कद काफी बढ़ गया था. यही कारण था कि साल 2009 में उन्हें बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री उम्मीदवार माना जा रहा था. हालांकि जब इन चुनावों में कांग्रेस फिर से सत्ता में आई तब स्वराज विपक्ष की नेता के तौर पर चुनी गईं. इस पद पर वह साल 2014 तक बनी रहीं. 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद मोदी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया.

    सुषमा स्वराज के बारे में कहा जाता है कि वो ज्योतिष को बहुत मानती थीं. हर गुरुवार को पीले रंग की साड़ी पहनती. उस दिन सिर्फ पीले रंग का खाना खातीं. वो स्वभाव से धार्मिक महिला थीं. करवाचौथ जैसे त्योहारों पर उनकी तस्वीरें वायरल होतीं. लोग उन्हें काफी पसंद करते. एक भारतीय पारंपरिक नारी की भूमिका में रहकर भी जितने अच्छे तरीके से उन्होंने राजनीति की, इसके उदाहरण कम ही मिलते हैं. 6 अगस्त 2019 को हार्ट अटैक से सुषमा स्वराज का निधन हो गया.

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