'लट्ठ हमारा ज़िंदाबाद' कहकर किसान आंदोलन खड़ा करने वाला संन्यासी

स्वामी सहजानंद सरस्वती.

स्वामी सहजानंद सरस्वती.

Swami Sahajanand Birth Anniversary : सहजानंद सरस्वती, जिसने संन्यास का अर्थ धर्म नहीं, देशसेवा में खोजा, अन्न उपजाने वालों के लिए ज़िंदगी झोंक दी, ज़मींदारों की जड़ें हिलाईं तो रोटी और किसान को ही भगवान कहा, क्या आप उसे जानते हैं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 22, 2021, 7:57 AM IST
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एक संन्यासी (Sanyasi) किताब लिखता है 'किसान क्या करें' और इसमें मंत्र देता है : 1. खान-पान सीखें 2. इंसान की तरह जीना सीखें 3. हिसाब रखें भी और लें भी 4. डरें कतई नहीं 5. लड़ना सीखें 6. वर्गचेतना हासिल करें. ये बातें भले ही 80 साल से भी पहले लिखी गई हों, लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि अब भी ताज़ा हैं? भारत में किसान आंदोलन (Indian Farmers Movement) के जनक माने गए स्वामी सहजानंद सरस्वती ऐसे संन्यासी थे, जिन्हें देश के भूखे, नंगे, सताए किसानों में भगवान दिखा और उन्होंने अपना पूरा जीवन उन्हीं के नाम कर दिया. लेकिन यह आसान नहीं था.

सरसरी तौर पर इतिहास जानने वाले यही जानते हैं कि महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने चंपारण में किसान आंदोलन (Champaran Movement) छेड़ा था लेकिन किसानों को अखिल भारतीय स्तर पर जोड़कर बड़ा और असरदार आंदोलन खड़ा करने का काम स्वामी सहजानंद ने किया. गांधी के असहयोग आंदोलन ने जब बिहार में तहलका मचाया, तो उसके केंद्र में भी सहजानंद ही थे. सवाल है कैसे?

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ऐसे खड़ा किया किसान आंदोलन
सहजानंद ने देश भर में घूमकर अव्वल तो लोगों को समझा और अंग्रेज़ी राज से लड़ने के लिए खड़ा किया. लोगों से मिलते हुए उन्होंने देश के किसानों के हालात गुलामों से बदतर देखे. चूंकि स्वभाव में ही अन्याय के विरोध में डट जाना था, सो सहजानंद ने किसानों पर हो रहे अत्याचारों के लिए खड़े होने का निश्चय किया. 1927 में सहजानंद ने पश्चिमी किसान सभा की नींव रखी और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के प्रमुख बने.

जो अन्न वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा

यह भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वही चलाएगा



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सहजानंद ने पश्चिमी किसान सभा की नींव रखी और अखिल भारतीय किसान सभा के प्रमुख बने.

किसान सभा को यह नारा देने वाले सहजानंद ने अनुभव किया था कि कैसे किसान की मेहनत का फल ज़मींदार, साहूकार, बनिए, महाजन, पंडे, ओझा और यहां तक कि चूहे, कीड़े व पक्षी निगल लेते हैं. किसानों के लिए लिखी किताबों में सहजानंद ने साफ कहा कि किसान को समझना होगा कि उसकी पैदावार पर पहला हक उसके परिवार का है. लेकिन क्रांति यानी व्यवस्था बदलने के लिए उन्होंने किसानों के लिए लक्ष्य भी रखा.

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सहजानंद ने यह भी कहा कि किसानों को राजनीति को समझकर जागरूक व सतर्क रहना होगा. अपने दुश्मन को समझने के लिए किसानों को वर्ग चेतना विकसित करना होगी. उनका बेबाक ऐलान था कि लड़ाई तब तक चलती रहे, जब तक शोषण करने वाली सत्ता खत्म न हो जाए.

ज़मींदारी के खिलाफ लड़ाई

किसान के दुश्मन कम नहीं थे. एक तरफ अंग्रेज़ सरकार के ज़ुल्म थे, तो दूसरी तरफ ज़मींदार, जिन्हें सहजानंद ने गोरों का भूरा दलाल कहा. 1934 में जब बिहार में भूकंप से तबाही हुई तक राहत कार्यों में जुटे सहजानंद ने देखा कि लुट चुके किसानों से भी ज़मींदारों के लठैत टैक्स वसूल रहे थे. तब किसानों को अपने हक के लिए खड़े होने का साहस सहजानंद ने इस मंत्र से दिया 'कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा ज़िंदाबाद'.

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बाद में यह नारा किसान आंदोलन में लगातार गूंजा. सहजानंद की ओजस्वी भाषा और वाणी किसानों को जोड़ देती थी. बहुत कम समय में किसानों का बड़ा आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया. हर ज़िले और प्रखण्ड में किसानों की बड़ी-बड़ी रैलियां और सभाएँ हुईं. बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया. इससे पहले 1920 में गांधी जी से मुलाकात के बाद सहजानंद कांग्रेस से जुड़ चुके थे.

सहजानंद होने का अर्थ

यह सहजानंद के आंदोलन का ही कमाल था कि उस वक्त लोहिया हों या नंबूदरीपाद, जेपी हों या नरेंद्र देव, समाजवाद के तमाम बड़े नाम किसान सभा से जुड़े थे. गांधी के अनुयायी हों, वामपंथी सीपीआई हो या नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आंदोलनकारी, सहजानंद सबके लिए अपने रहे. स्वामी सहजानंद ने पटना के समीप बिहटा में सीताराम आश्रम स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना.

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1950 में सिधारे सहजानंद के साथ ही भारत के किसान आंदोलन का सितारा भी अस्त हुआ. उनके निधन पर राष्ट्रकवि रामाधारी सिंह दिनकर ने कहा था 'दलितों का संन्यासी' चला गया. आज़ादी के बाद ज़मींदारी प्रथा तो खत्म हुई लेकिन किसानों के लिए संघर्ष खत्म नहीं हुआ. दर्जनों किसान संगठनों की भीड़ में देश अब भी सहजानंद जैसे एक किसान नेता की बाट जोहता है. सहजानंद जन्म से ब्राह्मण थे, लेकिन भूमिहारों के पक्ष को जिया था और उन पंडितों को शास्त्रार्थ से जवाब देकर साबित किया था कि संन्यास सिर्फ ब्राह्मणों की बपौती नहीं.

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अंत में किसानों पर उनकी एक पुस्तक का वह अंश पढ़िए, जो आज के समय में प्रासंगिक भी है :

"बहुत लोगों का खयाल है कि हमारे देश में किसानों का आंदोलन बिल्कुल नया और कुछ खुराफाती दिमागों की उपज मात्र है. उनके जानते भोले भाले किसानों को बरगला बहकारकर थोड़े से सफेदपोश और फटेहाल बाबू अपना उल्लू सीधा करने पर तुले हैं... यह भी नहीं कि केवल स्वार्थी और नादान ज़मींदार मालगुज़ार या उनके पुष्ट पोषक ऐसी बातें करते हों. कांग्रेस के कुछ चोटी के नेता और देश के रहनुमा भी ऐसा ही मानते हैं. वे किसान आंदोलन को राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संग्राम में रोड़ा समझते हैं... परंतु ऐसी धारणा भ्रान्त तथा निर्मूल है. भारतीय किसानों का आंदोलन प्राचीन है, लेकिन इसका लिपिबद्ध वर्णन न होना बड़ी त्रुटि है."

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