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चीन के पड़ोसी मुल्क ताइवान ने सार्स से सीख लेकर ऐसे जीती कोरोना वायरस से जंग

चीन से बिल्कुल सटे हुए ताइवान में सिर्फ 355 लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए.
चीन से बिल्कुल सटे हुए ताइवान में सिर्फ 355 लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए.

ताइवान (Taiwan) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) की आबादी लगभग बराबर है. दोनों ही देश चीन (China) के साथ व्यापार करते आए हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में कोरोना के मामले 5500 से ज्यादा हो चुके हैं, जबकि ताइवान में सिर्फ 355 लोग कोरोना से संक्रमित (coronavirus infection) पाए गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 5, 2020, 11:54 AM IST
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करीब ढाई करोड़ की आबादी वाला देश ताइवान चीन से समुद्री रास्ते से सिर्फ 100 मील दूर है. समुद्री और हवाई मार्ग से लगातार संपर्क के बाद भी ताइवान में कोरोना का संक्रमण और देशों के मुकाबले काफी कम है. वहीं चीन के दूसरे पड़ोसी और यहां तक यूरोपीय देशों में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. कोरोना से बचाव में ताइवान की रणनीति अब आदर्श मानी जा रही है. देखते हैं इस छोटे से मुल्क ने कैसे इस संक्रामक बीमारी से मुकाबला किया.

साल 2003 में जब सार्स का प्रकोप हुआ, तब ताइवान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ था. इस दौरान डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को क्वारंटीन किया गया, जबकि 181 लोगों की सार्स से मौत हो गई. चीन और हांगकांग में भी सार्स का कहर बुरी तरह बरपा. हालांकि कोरोना की दहशत के आगे सार्स अब कुछ भी नहीं लग रहा, लेकिन उस दौरान इसी बीमारी के कारण प्रभावित देशों ने आने वाली संक्रामक बीमारियों के लिए योजनाएं बनानी शुरू कर दी थीं. यहां तक कि कोरोना का पहला मामला आने के बाद ताइवान के आम लोग भी दूसरे देशों की जनता के मुकाबले ज्यादा सचेत थे.

कोरोना का पहला मामला आने के बाद ताइवान के आम लोग भी दूसरे देशों की जनता के मुकाबले ज्यादा सचेत थे




Journal of the American Medical Association (JAMA) की एक रिपोर्ट के अनुसार ताइवान ने कोरोना के फैलने का इंतजार नहीं किया, बल्कि जैसे ही चीन के वुहान में एक रहस्यमयी संक्रमण फैलने की खबर आने लगी, ताइवनी सरकार सतर्क हो गई. यहां की National Health Command Center (NHCC) ने तेजी से तैयारियां शुरू कर दीं. ये बात तबकी है, जबकि ताइवान में एक भी मामला नहीं आया था. ताइवान के डॉक्टर Jason Wang के अनुसार सरकार ने ताइवान की सीमाएं बंद करने और मास्क बांटने की शुरूआत कर दी. इसके अलावा पिछले 5 हफ्तों में 124 ऐसे एक्शन लिए गए, जो कोरोना संक्रमण रोकने में कारगर हैं. NHCC ने सीमाएं सील करने से पहले से भी सीमा पार कर आने वालों के लिए स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी. साथ ही किसी भी देश से आने या यात्रा करके लौटने वालों को 2 हफ्तों के क्वारंटीन में रहना जरूरी था. ये कदम दिसंबर के अंत में ही लिया जा चुका था.
ताइवान चीन से समुद्री रास्ते से लगभग 100 मील की ही दूरी पर है. यहां से लाखों लोग चीन आते-जाते हैं. ऐसे में ये देश संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता था. यही देखते हुए सार्स हमले के बाद से संभली सरकार ने बॉर्डर बंद करने का फैसला तब ले लिया, जबकि कोई भी देश ऐसा सोच नहीं पा रहा था. इसके बाद होम क्वारंटीन के आदेश दिए गए. सरकार ने नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई भी शुरू की, जिससे मामला तुरंत नियंत्रण में आ गया.

डिजिटल थर्मामीटर, मास्क और वेंटिलेटर आदि के निर्यात पर 04 मार्च से 31 मार्च तक बैन लगा दिया


ताइवान में डिजिटल थर्मामीटर, मास्क और वेंटिलेटर आदि के निर्यात पर 04 मार्च से 31 मार्च तक बैन लगा दिया ताकि अपने निवासियों को देखा जा सके. साथ ही घरेलू फेस-मास्क बनाए जाने पर जोर दिया गया. अब WHO भी फेस मास्क को जरूरी बता रहा है. मास्क बनाए और बंटवाएं जाने के साथ ही यहां पर तेजी से संदिग्धों की जांच हुई. री-टेस्टिंग में भी ताइवान काफी आगे रहा. अगर किसी को पहले कभी निमोनिया रहा हो, उन्हें भी जांच के लिए आना अनिवार्य कर दिया गया. जो लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं, उनपर कार्रवाई हो सकती है. जनता में डर न पैदा हो, या फिर बीमारी के असल हालात पता रहें, इसके लिए ताइवान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रोज पब्लिक ब्रीफिंग शुरू की. इससे जनता का यकीन बढ़ा और लोग होम क्वारंटीन को ठीक तरह से मानने लगे.

एक ओर जहां दुनिया का बड़े से बड़ा मुल्क वायरस से जंग में संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, वहीं ताइवान ने हाल ही में कहा है कि उनके पास 10 मिलियन मास्क हैं, जो वे अमेरिका, इटली, स्पेन और दूसरे यूरोपियन देशों में दान करने को तैयार हैं. बता दें कि इन दिनों अमेरिका के अलावा इटली और स्पेन कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देश हो चुके हैं.

ताइवान के उप-राष्ट्रपति Chen Chien-jen साथ में एक एपिडेमियोलॉजिस्ट भी हैं. वे कहते हैं कि ताइवान इस ग्लोबल संकट में अपने सबसे अच्छे डॉक्टर, रिसर्चर और नर्सेज भेजना चाहता है लेकिन कई कारणों से ऐसा हो नहीं पा रहा है. इसमें एक वजह ये भी है कि ताइवान को अब तक WHO के सदस्य देश के तौर पर मान्यता नहीं मिल सकी है.

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