मुंबई पर टैंकर माफिया का कब्जा, सालाना कमाई है 8 से 10 हजार करोड़

क्या कभी सोचा है कि अगर शहर सूखाग्रस्त हैं तो टैंकरों के पास पानी आता कहां से है?

News18Hindi
Updated: July 2, 2019, 4:33 PM IST
मुंबई पर टैंकर माफिया का कब्जा, सालाना कमाई है 8 से 10 हजार करोड़
अकेले मुंबई में सालाना 8 से 10 हजार करोड़ का फायदा हो रहा है (फोटो- लोकमत)
News18Hindi
Updated: July 2, 2019, 4:33 PM IST
आरएन भास्कर

मुंबई और लगभग पूरा महाराष्ट्र या फिर तमाम देश भी टैंकर माफिया की गिरफ्त में है. इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए एक बार मुंबई पर गौर करें. ये बड़ा शहर है, जहां पैसों का लंबा-चौड़ा कारोबार है. यहां खूब पानी खर्च होता है. और इस शहर से जुड़े पानी के आंकड़े हमारे पास हैं. इसके अलावा एक और भी बात है जो हमें मुंबई पर गौर करने को कहती है- वो है शहर पर टैंकर माफिया का कब्जा.

इसे समझने के लिए सबसे पहले साल 2014 की तरफ देखें. तब देवेंद्र फड़नवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने. उन्होंने टैंकरों को बंद करने की घोषणा की. मराठावाड़ा से टैंकर लगभग खत्म हो गए. आज हालात और भयावह हैं. अब लगभग 6,200 टैंकर उन्हीं इलाकों में जा रहे हैं, जहां से उन्हें खत्म किया गया था. ये आंकड़ा अपनी पुरानी संख्या से 10 गुने से भी ज्यादा है.

हादसों के टैंकर

हाल ही में  मुंबई में एक 16 साल का कैरम खिलाड़ी पानी के टैंकर के नीचे आ गया. इस हादसे को दो हफ्ते भी नहीं बीते होंगे. मुंबई और पूरे भारत में पानी के टैंकरों से जुड़ी मौतों को Google करें तो आप हैरान रह जाएंगे. मुंबई में किसी भी व्यस्त चौराहे पर एक फुटओवर ब्रिज पर खड़े हो जाएं. वहां से देखें. जहां तक नजर जाए, पानी के टैंकर दिख जाएंगे. वो अंधाधुंध ट्रैफिक के नियम तोड़ते हैं. हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों के बावजूद ट्रैफिक पुलिस उनकी तरफ से बेपरवाह रहती है.



कार्रवाई क्यों नहीं 
Loading...

जवाब सीधा है. टैंकरों से पैसे मिलते हैं. यह अक्सर ग्रेटर मुंबई के नगर निगम (MCGM) के अधिकारियों और पुलिस की मिलीभगत होती है. जनता के चुने हुए लोग भी इसमें शामिल होते हैं. कई राजनेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदार टैंकर कारोबार से जुड़े हुए हैं. चूंकि हर टैंकर को रोज 10 से 40 ट्रिप्स तक पूरी करनी होती हैं. ऐसे में पुलिसवालों पर भी दबाव रहता है कि वे निरीक्षण या किसी जांच के चलते टैंकरों का वक्त जाया न करें. मुंबई जैसे शहर में, साल के 365 दिन टैंकर सड़कों पर दौड़ते हैं. इसकी वजह ये है कि यहां नगरपालिका ये पक्का करती है कि घरों और खासकर स्लम्स में पानी किसी भी हाल में पर्याप्त मात्रा में न पहुंचे. ऐसे में यहां के लोग टैंकरों पर ही निर्भर रहते हैं.

ऐसे हो रहा है टैंकर बिजनेस
अकेले मुंबई में ही टैंकर बिजनेस हर साल हजार करोड़ से ज्यादा का राजस्व कमाता है. ये आंकड़ा ज्यादा नहीं, बल्कि कम ही है. सबसे दिलचस्प ये है कि टैंकरों को जो पानी मिलता है, वो अक्सर खुद नगरपालिका ही मुहैया कराती है. जब टैंकरों से निजी लाभ की बात आती है, तो आमतौर पर अलसा-अलसाकर चलने वाले टैंकरों की स्पीड और क्षमता कई गुना बढ़ जाती है.



टैंकरों के पास पानी कहां से आ रहा है
नगरपालिका के लोग यह सुनिश्चित करते हैं कि पानी लोगों के घरों और स्लम इलाकों तक न पहुंचे. या फिर पहुंचे भी तो पर्याप्त न हो. यही वजह है कि बहुत सा पानी नॉन- रेवेन्यू वॉटर (NRW) के तहत आता है यानी वो पानी जो गायब हो जाए, भाप बनकर उड़ जाए या फिर चोरी चला जाए. अब इस पानी का कोई हिसाब नहीं है.

अब मुंबई का वो डाटा देखें, जो हमें बताता है कि पूरे शहर के लिए कितना पानी उपलब्ध है. यूएसएआईडी ने इस बारे में साल 2016 में एक रिपोर्ट तैयार की. ये कई बातें कहती हैं. मिसाल के तौर पर, मुंबई में नॉन- रेवेन्यू वॉटर फिलहाल 30 प्रतिशत है. राज्य सरकार ने इसे 15 प्रतिशत तक लाने का इरादा किया है. हालांकि इसके बावजूद इसमें कोई कमी नहीं आई. पानी पर सबसे अच्छी तरह से काम कर रहे राज्यों में नॉन- रेवेन्यू वॉटर 5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है.

तब 15 प्रतिशत अतिरिक्त नॉन- रेवेन्यू वॉटर के क्या मायने हैं? इसके लिए मुंबई में उपलब्ध पानी के आंकड़े देखें. यहां साफ है कि शहर के पास अपने जलग्रहण क्षेत्रों और झीलों (वैतरणा, उल्हास, पातालगंगा और अंबा) से लगभग 8,043 एमसीएम पानी आता है. इसमें से 2,185 एमसीएम सिंचाई के लिए रखा गया है. अब शहर के पास बचता है कुल 5,858 MCM पानी.



रोज लगभग 48 करोड़
इस 15 प्रतिशत में नॉन- रेवेन्यू वॉटर की लागत बैठती है रोज के 2,407 मिलियन. इतना पानी 2 लाख 50 हजार टैंकरों के लिए पर्याप्त है. अगर हम हर टैंकर के हजार लीटर पानी की ट्रिप का न्यूनतम चार्ज 2000 रुपए भी मानें तो साफ है कि ये टैंकर ट्रक रोज लगभग 48 करोड़ रुपए कमा रहे हैं. यानी सालभर के 17,574 करोड़ रुपए.

इस संख्या में जितनी चाहें रियायत करें लेकिन तब भी आप पाएंगे कि पानी के इस माफिया को 8 से 10 हजार करोड़ का फायदा हो रहा है. ये हम अकेले मुंबई शहर की बात कर रहे हैं.

सूखे के हालातों की वजह से टैंकरों में 6,200 टैंकरों का इजाफा हो गया है ताकि वे सूखाग्रस्त इलाकों में पानी पहुंचा सकें. अब इनमें दूसरे शहरों को भी शामिल करें, मसलन- नागपुर, पुणे, नासिक और औरंगाबाद जैसे कई दूसरे शहर. इसमें दूसरे राज्यों को भी जोड़ लें.

अब ये समझ पाना आसान होगा कि कैसे और क्यों पानी माफिया देश के राजनैतिक और ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम के लिए सख्त जरूरी हो चुका है. इससे यह भी साफ हो जाता है कि इन सबको सूखा इतना क्यों लुभाता है. हर सूखा पैसा कमाने का एक और जरिया बन जाता है.

(लेखक आरएन भास्कर मनीकंट्रोल में कंसल्टिंग एडिटर हैं.)

ये भी पढ़ें-
#HumanStory: 'शेतकरी नवरा नको जी बाई... किसान पति नहीं चाहिए! 3 साल में 8वीं बार सुनी ‘न’
First published: July 2, 2019, 4:33 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...