मुगलकाल में भी दिवाली पर होती थी तंत्रसाधना, यहां मिलता है जिक्र

अमावस्या की इस रात को कालरात्रि, महानिशा, दिव्यरजनी और महाकृष्णा भी कहा गया है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
अमावस्या की इस रात को कालरात्रि, महानिशा, दिव्यरजनी और महाकृष्णा भी कहा गया है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

बज़्म-ए-आखिर में बताया गया है कि कैसे दिवाली (mentioning of Diwali in Bazm e Aakhir) के रोज महल में आने-जाने वालों पर अतिरिक्त नजर रखी जाती थी. यहां तक कि इस रोज बाहर से फल-सब्जियों की खरीदी तक बंद रहती थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 14, 2020, 8:09 AM IST
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दिवाली का दिन वैसे तो सुख-समृद्धि के त्योहार के रूप में देखा जाता है लेकिन इस दिन का तांत्रिकों के लिए भी खास महत्व है. अमावस्या की इस रात को कालरात्रि, महानिशा, दिव्यरजनी और महाकृष्णा भी कहा गया है और तांत्रिक और अघोरी शक्तियां इस रात में शक्तियों को सिद्ध करते हैं. तंत्रशास्त्रों में भी इसका जिक्र मिलता है कि कुछ खास दिनों में की गई तंत्रिक साधना विशेष फल देती हैं, इनमें दशहरा, नवरात्रि और दिवाली हैं. दीपावली की रात इन सबसे खास शक्तिशाली मानी जाती है और इसे तंत्रशास्त्र की महारात्रि कहा जाता है.

इस रोज जब सूर्य अस्त हो चुका हो और चंद्रमा भी अमावस्या के कारण निस्तेज हो जाए, उसी वक्त तंत्रविद्या के जानकार शक्तिअर्जन का काम शुरू करते हैं. दिवाली पर तांत्रिक अनुष्ठान की कई बातें ऐसी हैं, जिस बारे में आम लोगों को नहीं के बराबर जानकारी होती है.

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साल 1885 में छपी बज़्म-ए-आखिर में मुंशी फ़ैज़उद्दीन देहलवी ने मुगलों के काल में भी दिवाली के दिन तंत्र साधना का जिक्र किया है. इससे बचने के लिए दिवाली के दिन किसी भी कर्मचारी को महल परिसर से बाहर जाने का इजाजत नहीं होती थी. महल में कोई भी सब्जी इस रोज नहीं मंगाई जाती थी. अगर कोई बैंगन, कद्दू, चुकंदर या गाजर खाना चाहे तो पहले उसे छीलकर तब ही इस्तेमाल किया जाता था. ऐसी मान्यता थी कि इन फल-सब्जियों के जरिए महल के हरम की औरतों पर बाहरी व्यक्ति काला जादू कर सकता है.
bazm e aakhir diwali
बज़्म-ए-आखिर में मुंशी फ़ैज़उद्दीन देहलवी ने मुगलों के काल में भी दिवाली के दिन तंत्र साधना का जिक्र किया है


वूडू ब्लैक मैजिक दिवाली पर की जाने वाले तांत्रिक अनुष्ठानों में से एक है. इससे काली शक्तियों को बस में किया जाता है ताकि अपने शत्रुओं का अनिष्ट किया जा सके. हालांकि शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने के बाद से इस तरह की चीजों से लोगों का यकीन कम हुआ है लेकिन कुछ खास तबकों में अब भी ये प्रैक्टिस की जाती है.

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तंत्रशास्त्र की महारात्रि पर और भी कई शक्तियां सिद्ध करने की कोशिश की जाती है. इनमें बगलामुखी साधना, उच्चाटन और स्तंभन जैसी सिद्धियां मुख्य हैं. इनके तहत कोर्ट केस जीतने, शत्रु पर विजय, किसी को अपने बस में करने जैसे कई काम होते हैं. तंत्र-मंत्र के जानकार इनकी साधना करते हैं.

मान्यता है कि दिवाली पर देवी लक्ष्मी अपनी बहन अलक्ष्मी के साथ भूलोक की सैर पर आती हैं. तभी तांत्रिक अनुष्ठान से उन्हें या फिर पारलौकिक शक्तियों को सिद्ध किया जा सकता है. हालांकि इसमें तांत्रिक साधना और काला जादू दो अलग-अलग श्रेणी की चीजें हैं जो अलग-अलग स्तर पर की जाती हैं.

तंत्रशास्त्र की महारात्रि पर शक्तियां सिद्ध करने की कोशिश की जाती है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


दिवाली की रात को कर्णपिशाचिनी विद्या सिद्ध करने के उपयुक्त माना जाता है. मान्यतानुसार ये वो शक्ति है जो साधक के कान में आकर किसी भी व्यक्ति का अतीत और वर्तमान बता देती है. कर्णपिशाचिनी के जरिए भविष्य नहीं देखा जा सकता लेकिन इस विद्या के जानकार लोगों को प्रभावित कर उनसे पैसे ऐंठने में सफल रहते हैं.

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दीवाली के करीब उल्लुओं, रेतीली जगहों पर पाए जाने वाले एक खास अजगर, काली बिल्ली और 20 नाखूनों वाले कछुओं की मांग रहती हैं, तांत्रिक अनुष्ठानों को सिद्ध करने के लिए इनका उपयोग होता है. माना जाता है कि इन्हें पाने वाले व्यक्ति पर तांत्रिक शक्तियां कृपालु हो जाती हैं.

इस महारात्रि पर ब्लैक मैजिक यानी काला जादू भी साधा जाता है, इसमें परालौकिक शक्तियां निजी स्वार्थों या अक्सर किसी के अनिष्ट के लिए सिद्ध की जाती हैं. रॉबर्ट एम प्लेस की किताब मैजिक एंड एल्केमी में इसका उल्लेख मिलता है कि वाइट मैजिक की तोड़ पर ब्लैक मैजिक का जन्म हुआ. खराब इरादों की वजह से इसे लो मैजिक भी कहा जाता है.

ज्यादातर साधनाएं श्मशान में की जाती हैं और रात 12 बजे से शुरुआत होती है जो सुबह 4 बजे तक चलती है. ऐसा विश्वास है कि इस दौरान पारलौकिक शक्तियां विचरती हैं और उनका आह्वान या उन्हें सिद्ध करना ज्यादा आसान होता है. सुनसान जगहों पर ही इन क्रियाओं की शुरुआत होती है.
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