दो पन्नों के उस दस्तावेज ने कश्मीर को भारत का बना दिया

फाइल फोटो

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ये विलय पत्र कश्मीर के लिए अलग से तैयार नहीं किया गया था. बल्कि वही दस्तावेज था, जिस पर दो महीने पहले भारत में 569 रियासतों से साइन कराकर उन्हें इंडिया डोमिनियन का अंग बनाया गया था

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 26, 2018, 2:12 PM IST
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जम्मू-कश्मीर के डोगरा वंश के शासक महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को एक विलय पत्र यानी 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन' पर हस्ताक्षर किए. ये वो समझौता था, जिसके जरिए कश्मीर के शासक ने अपने प्रिंसले स्टेट को भारत में विलय पर सहमति जाहिर की थी. इस पत्र की शर्तें जाहिर करती थीं कि महाराजा अपने राज्य का भारत में विलय में तैयार थे.

हालांकि ये विलय पत्र कश्मीर के लिए अलग से तैयार नहीं किया गया था. बल्कि वही दस्तावेज था, जिस पर दो महीने पहले भारत में 569 रियासतों से साइन कराकर उन्हें इंडिया डोमिनियन का अंग बनाया गया था. ये दो पन्ने का दस्तावेज था.

ये वही मसौदा था, जिसे अगस्त 1947 के दौरान स्वतंत्र रियासतों के विलय पत्र के तौर पर तैयार किया गया था. ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन स्थिति के हिसाब से खासतौर पर तैयार भी नहीं किया था.



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दिल्ली के गृह मंत्रालय ने एक फ़ॉर्म तैयार किया था. इसमें खाली जगह छोड़ी गई थी, जिनमें रियासतों के नाम, उनके शासकों के नाम और तारीख भरे जाने थे.



कश्मीर के महाराजा ने यूं लगाई थी विलय पर सहमति की मुहर
विलय पत्र की शुरुआती लाइन में महाराजा हरिसिंह ने इस तरह सहमति जाहिर की थी, "मैं श्रीमन इंद्र महेंद्र राजराजेश्वर महाराजा श्री हरि सिंह जी, जम्मू एंड कश्मीर नरेश तथा तिब्बतादी देशाधिपति, जम्मू और कश्मीर का शासक, अपने राज्य की संप्रभुता के विलय पर मुहर लगा रहा हूं."

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"मैं घोषित करता हूं कि मैं इंडिया के गर्वनर जनरल की इच्छा पर इंडिया डोमिनियन में विलय को स्वीकार करता हूं." इस पत्र में कई प्रावधानों का उल्लेख है, जिन पर सभी पर महाराजा हरि सिंह ने सहमति जताते हुए इस समझौते पर हस्ताक्षर किए.



फिर माउंटबेटन ने किया विलय को स्वीकार
27 अक्टूबर को भारत के तत्कालीन गर्वनर लार्ड माउंटबेटन ने एक पत्र के जरिए विलय को स्वीकार किया. उन्होंने टिप्पणी लिखी, कश्मीर में ज्यों ही क़ानून व्यवस्था ठीक हो जाती है और उसकी सरज़मीन से हमलावरों को खदेड़ दिया जाता है, भारत में राज्य के विलय का मुद्दा जनता के हवाले से निपटाया जाएगा. हालांकि लार्ड माउंटबेट की इस टिप्पणी ने आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के बीच बड़े विवाद को जन्म दिया. हालांकि भारत ने हमेशा यही दावा किया कि विलय बेशर्त और अंतिम थी. भारत हर साल इस दिन को विलय दिवस के रूप में मनाता है.

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शेख अब्दुल्ला ने भी किया था विलय का समर्थन 
महाराजा हिंदू थे. बंटवारे और आज़ादी के साथ बढ़े हुए सांप्रदायिक तनाव की वजह से उनके लिए अपने राज्य को स्पष्ट रूप से मुस्लिम राज्य का हिस्सा बनाना मुश्किल था. उस समय की प्रमुख राजनीतिक हस्ती शेख़ अब्दुल्ला ने भी भारत में विलय का समर्थन किया था, हालांकि बाद में उनका झुकाव आज़ादी की ओर हो गया था.

ये संकेत मिलने लगे थे कि महाराजा भारत में विलय की तैयारी कर रहे थे. पाकिस्तान से आने वाले क़बायली लड़ाकों के आक्रमण करने पर उन्होंने विलय के फ़ैसला को और पुख्ता कर दिया. पाकिस्तान की नई सरकार और सेना के एक हिस्से ने इन लड़ाकों का समर्थन किया था और उन्हें हथियार मुहैया कराए थे.



जब क़बायलियों की फ़ौज श्रीनगर की ओर बढ़ी, ग़ैर मुस्लिमों की हत्या और उनके साथ लूट पाट की ख़बरें आने लगीं, तब हरि सिंह 25 अक्टूबर को श्रीनगर से गाड़ियों के काफ़िला के साथ जम्मू के सुरक्षित महल पंहुच गए. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि महाराजा ने श्रीनगर छोड़ने से पहले ही काग़ज़ पर दस्तख़त कर दिया था.

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27 अक्टूबर को भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची 

27 अक्टूबर के तड़के पहली बार भारतीय सेना कश्मीर की ओर बढ़ी. उसे हवाई जहाज़ से श्रीनगर की हवाई पट्टी पर उतारा गया. तमाम दिक्क़तों के बावजूद भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तानियों को श्रीनगर में घुसने से रोक दिया. उन्होंने उन लोगों को कश्मीर घाटी से बाहर भी धकेल दिया, पर वे उन्हें पूरी रियासत से बाहर नहीं निकाल पाए.

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