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कॉलेज की वो घटना जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को क्रांतिकारी बना दिया

कॉलेज के जमाने में जब सुभाष चंद्र बोस ने देखा कि भारतीय छात्र के साथ अंग्रेज प्रोफेसर ने दुर्व्यवहार किया है तो उन्होंने इसका विरोध किया. हालांकि इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.
कॉलेज के जमाने में जब सुभाष चंद्र बोस ने देखा कि भारतीय छात्र के साथ अंग्रेज प्रोफेसर ने दुर्व्यवहार किया है तो उन्होंने इसका विरोध किया. हालांकि इसकी बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.

सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) पढ़ने में खासे मेधावी थे. मैट्रिक की परीक्षा में टॉप करके उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंट कॉलेज (Presidency College, Kolkata)में एडमिशन लिया. लेकिन यहां ऐसी घटना हुई, जिसके बाद सुभाष को लगा कि अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर करना चाहिए. इसके बाद उनके रास्ते क्रांतिकारी बनने की ओर मुड़ गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 22, 2021, 4:12 PM IST
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ये वो घटना है, जिसने असल  में सुभाष चंद्र बोस के जीवन को ही नहीं बल्कि उनकी पूरी सोच को बदल कर रख दिया. इसके बाद वो क्रांतिकारी बनने के रास्ते पर चल पड़े. सुभाष ने जब कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमिशन लिया, वो जबरदस्त मेघावी छात्र थे. हमेशा पढाई में डूबे रहने वाले. इसी बीच एक घटना ऐसी हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी.

वह उस दिन कॉलेज की लाइब्रेरी में थे, तभी पता चला कि एक अंग्रेज प्रोफेसर ने खीझ में उनके कुछ साथियों से दुर्व्यवहार किया है और जोर से धक्का दिया है. चूंकि सुभाष ही क्लास के छात्र प्रतिनिधि थे, लिहाजा तुरंत प्रिंसिपल के पास पहुंचे. उन्हें इस बात के बारे में बताया. अंग्रेज प्रोफेसर का रवैया चूंकि बहुत खराब था, इसलिए सुभाष चाहते थे कि वो प्रोफेसर माफी मांगें. प्रिंसिपल ने खारिज कर दिया.


इसके विरोध में अगले दिन से छात्र हड़ताल पर चले गए. पूरे शहर में जब खबर फैली तो हड़ताल को समर्थन मिलने लगा. आखिरकार प्रोफेसर को झुकना पड़ा. दोनों पक्षों के बीच एक सम्मानजनक समझौता हो गया.






कुछ ही दिनों बाद जब उसी अंग्रेज प्रोफेसर ने फिर यही हरकत की तो छात्रों ने कानून को हाथ में लेते हुए बल प्रयोग किया. एक जांच समिति बनी, जिसमें सुभाष ने तर्कों के साथ छात्रों का पक्ष रखा. उनकी कार्रवाई को परिस्थितिवश सही ठहराया. जिस पर कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें कुछ छात्रों के साथ काली सूची में डाल दिया.



सुभाष चंद्र बोस जब कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ रहे थे



तब सुभाष को लगा कि अंग्रेज भारतीयों से कितना खराब व्यवहार करते हैं

इस घटना ने सुभाष को अहसास कराया कि अंग्रेज भारतीयों के साथ कितना खराब व्यवहार कर रहे हैं. अंग्रेजों को लेकर सुभाष के मन में जो गुस्सा भरा, उसने उन्हें क्रांतिकारी बना दिया. उनके दिलोदिमाग में ये भावना बढ़ती गई कि किसी भी तरह से अंग्रेजों को इस देश से बाहर किया जाना चाहिए.


कॉलेज ही नहीं यूनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया गया 

सुभाष को कॉलेज से ही नहीं बल्कि यूनिवर्सिटी से भी निकाल दिया गया. वो वापस गृह जनपद कटक लौट गए. उनके माता-पिता ने उन्हें कुछ नहीं कहा. भाइयों की सहानुभूति उनके साथ थी, क्योंकि हर कोई मान रहा था कि उन हालात में सुभाष ने जो कुछ किया, वह सही था. वो हीरो बन चुके थे. जहां जाते वहां छात्र उनका स्वागत और सम्मान करते.




करीब एक साल तक सुभाष ने किताबें किनारे रख दीं. जी-जान से समाजसेवा में जुट गए. वो अपने दल के साथ गांव में जाते. हैजा व चेचक जैसी बीमारियों का इलाज कर रहे डॉक्टरों का हाथ बंटाते. गांववालों के लिए दवाई की व्यवस्था करते. उन्हीं दिनों उन्होंने धार्मिक उत्सवों के जरिए युवाओं में सामुदायिकता की भावना जगाने का काम शुरू किया.



इंग्लैंड में आईसीएस की परीक्षा से पहले पढाई के दौरान सुभाष चंद्र बोस



एक साल बाद निलंबन खत्म हुआ

करीब एक साल बाद वो फिर कोलकाता वापस लौटे. उन्हें उम्मीद थी कि कोलकाता विश्वविद्यालय उनका निलंबन खत्म कर देगा. ऐसा ही हुआ भी. खैर किसी तरह से उन्हें स्कॉटिश चर्च कॉलेज में एडमिशन मिला. उन्हीं दिनों वो कालेज की इंडिया डिफेंस फोर्स विश्वविद्यालय यूनिट में शामिल हो गए. इसमें रहकर उन्होंने मेहनत और अनुशासन का पाठ सीखा.




यहीं पहली बार उन्होंने सैन्य शिक्षा पाई

यहीं उन्होंने युद्ध के तौर तरीके सीखे. गौरिल्ला युद्ध से परिचित हुए. बंदूक चलाने का प्रशिक्षण लिया. इस ट्रेनिंग ने उनके आत्मविश्वास और शक्तिशाली होने के अहसास को बढ़ाया. कॉलेज में जहां तीन साल वह पूरी तरह सैन्य प्रशिक्षण से जुडे़ रहे तो चौथे साल आकर अपनी पढाई पर ध्यान देना शुरू किया. 1918 में उन्होंने बीए फर्स्ट क्लास से पास किया. मेरिट लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहे.



इंग्लैंड में दोस्तों के बीच छात्र सुभाष चंद्र बोस



कलेक्टर बनने की परीक्षा पास की लेकिन छोड़ दी ये नौकरी

सुभाष के पिता और बडे भाई को अंदाज था कि सुभाष को आईसीएस की परीक्षा पास करने में कोई दिक्कत नहीं होगी. उन्होंने इसके लिए उन्हें इंग्लैंड भेजने का फैसला किया. सुभाष नहीं जाना चाहते थे. वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज सरकार के तहत कोई पद स्वीकार करें. फिर ये सोचकर इंग्लैंड गए कि अगर सेलेक्ट हो भी गए तो उनके पास सोचने का काफी समय होगा कि क्या करना चाहिए.

बाद में उन्होंने आईसीएस में सेलेक्ट होने के बाद ये नौकरी करने से जब मना कर दिया तो सनसनी फैल गई, क्योंकि आईसीएस बहुत बड़ा ओहदा हुआ करता था, कोई इसे सेलेक्ट होने के बाद छोड़ देगा, ये अंग्रेज सोच भी नहीं सकते थे.

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