युद्ध में एक दिन में 40,000 सैनिक शहीद होने के बाद आया था इस सोसायटी को बनाने का विचार

युद्ध में एक दिन में 40,000 सैनिक शहीद होने के बाद आया था इस सोसायटी को बनाने का विचार
रेड क्रॉस सोसायटी के संस्‍थापक जीन हेनरी ड्यूनेंट को 1901 में पहले शांति नोबेल पुरस्‍कार से सम्‍मानित ि‍किया गया.

वर्ल्‍ड रेड क्रॉस डे: पहले और दूसरे युद्ध में सेवा करने के बाद दुनिया भर में गरीबों, बेसहारा लोगों के लिए काम करने वाली इस संस्‍था के संस्‍थापक जीन हेनरी ड्यूनेंट का 8 मई, 1828 को जन्‍म हुआ था. हेनरी को 1901 में मानव सेवा कार्यों के लिए पहले नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था.

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कोरोना संकट के दौरान एक सोसायटी ऐसी है, जो ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में लोगों की सेवा कर रही है. ये सोसायटी कहीं मास्‍क और ग्‍लव्‍स बांटकर तो कहीं स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों के काम में हाथ बंटाकर कोरोना वायरस के खिलाफ मुकाबले में अपना योगदान दे रही है. पहले और दूसरे विश्‍व युद्ध में अपनी सेवाएं देने वाली इसी रेड क्रॉस सोसायटी (Red Cross Society) के संस्‍थापक जीन हेनरी ड्यूनेंट (Jean Henri Dunant) का जन्‍म 8 मई 1828 को स्विट्जरलैंड के जिनेवा (Geneva) में हुआ था. इसीलिए वर्ल्‍ड रेड क्रॉस डे (World Red Cross Day) को भी हर साल 8 मई को ही मनाया जाता है.

जीन हेनरी ड्यूनेंट को पहले और दूसरे विश्‍व युद्ध से पूर्व ही 1901 में नोबेल शांति पुरस्‍कार (Nobel Peace Prize) से सम्‍मानित किया जा चुका था. बता दें कि इसी साल नोबेल पुरस्‍कारों की शुरुआत हुई थी. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर इस सोसायटी को बनाकर लोगों की सेवा करने का विचार हेनरी को कब और कहां आया. आइए जानते हैं कि कारोबारी हेनरी ने समाज सेवा करने वाली सोसायटी क्‍यों बनाई.

सॉल्‍फेरिनो में ड्यूनेंट ने की सैनिकों की सेवा
स्विटजरलैंड के कारोबारी जीन हेनरी ड्यूनेंट 1859 में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय की तलाश कर रहे थे, लेकिन वह उनसे मिल नहीं पाए. इसी दौरान वह इटली गए, जहां उन्होंने सॉल्फेरिनो का युद्ध देखा. सॉल्‍फेरिनो के युद्ध में एक ही दिन में 40,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे. वहीं, काफी सैनिक घायल भी हुए थे. किसी भी सेना के पास घायल सैनिकों की देखभाल के लिए मेडिकल कोर नहीं थी.
पहले विश्‍व युद्ध के दौरान रूस में घायल जवानों का इलाज करते रेड क्रॉस सोसायटी के स्‍वयंसेवक.




ड्यूनेंट ने स्वंयसेवकों का एक समूह बनाया. इस समूह में शामिल हुए लोगों ने युद्ध में घायल हुए जवानों तक खाना और पानी पहुंचाया. घायलों का इलाज किया और उनके परिजनों को चिट्ठियां भी लिखीं. इस घटना के 3 साल बाद हेनरी ने अपने अनुभव को एक किताब 'ए मेमोरी ऑफ सॉल्‍फेरिनो' की शक्‍ल दे दी और प्रकाशित कराया.

किताब में दिया सोसायटी गठन का सुझाव
हेनरी ने युद्ध के भयानक मंजर और उस दौरान अपने अनुभवों के बारे में किताब में सबकुछ लिखा था. उन्होंने बताया कि कैसे युद्ध में अपने अंगों को गंवाने वाले लोग कराह रहे थे. उनको मरने के लिए छोड़ दिया गया था. पुस्तक के आखिर में उन्होंने एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय सोसायटी की स्थापना का सुझाव दिया था. ऐसी सोसायटी जो युद्ध में घायल लोगों का इलाज कर सके. ऐसी सोसायटी जो हर किसी भी देश की नागरिकता के आधार पर नहीं बल्कि मानवीय आधार पर लोगों के लिए काम करे. उनके इस सुझाव पर अगले ही साल अमल किया गया. जिनेवा पब्लिक वेल्फेयर सोसायटी ने फरवरी, 1863 में एक कमेटी का गठन किया. कमेटी में स्विटजरलैंड के पांच नागरिक शामिल किए गए थे. इस कमेटी को हेनरी ड्यूनेंट के सुझावों पर गौर करना था.

अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आयोजन हुआ
कमेटी के पांच सदस्यों में जनरल ग्यूमे हेनरी दुफूर, गुस्तावे मोयनियर, लुई ऐपिया, थियोडोर मॉनोइर और हेनरी ड्यूनेंट खुद शामिल थे. ग्यूमे हेनरी दुफूर स्विटजरलैंड की सेना के जनरल थे. एक साल के लिए वह कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए थे. हालांकि, बाद में उन्‍हें मानद अध्यक्ष बना दिया गया था. युवा गुस्तावे मोयनियर वकील थे और पब्लिक वेल्फेयर सोसायटी के अध्यक्ष थे.

दूसरे ि‍विश्‍व युद्ध के दौरान मोर्चे पर सैनिकों की सेवा के लिए जाते रेड क्रॉस सोसायटी के स्‍वयंसेवक.


इसके बाद से गुस्तावे मोयनियर ने अपने जीवन को रेड क्रॉस से संबंधित कार्यों के लिए समर्पित कर दिया. लुई और थियोडोर पेशे से डॉक्‍टर थे. कमेटी की ओर से अक्टूबर 1863 में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (International Summit) का आयोजन किया गया. सम्मेलन में 16 राष्ट्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जिसमें कई प्रस्तावों और सिद्धांतों को अपनाया गया.

अंतरराष्‍ट्रीय प्रतीक चिह्न का चयन हुआ
अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में शामिल सभी 16 देशों ने ऐसे स्वैच्छिक संगठनों की स्थापना की अपील की, जो किसी भी युद्ध में बिना देश देखे बीमार और जख्मी लोगों की देखभाल करें. इन यूनिटों को नेशनल रेड क्रॉस सोसायटीज के नाम से जाना गया. इसी सम्मेलन में कमेटी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक चिह्न (Symbol) का भी चयन किया गया. बाकी पांच सदस्यों वाली कमेटी को शुरू में इंटरनेशनल कमेटी फॉर रिलीफ टू द वूंडेड के नाम से जाना गया. बाद में इसका नाम बदलकर इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस कर दिया गया. युवा वकील गुस्तावे इसके पहले अध्यक्ष बनाए गए. रेड क्रॉस सोसायटी ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध में अहम भूमिका निभाते हुए घायल सैनिकों की सहायता की थी.

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