इस जज ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कोर्ट में बुलाकर छह घंटे तक कटघरे में बिठाया था

1971 का चुनाव हारने के बाद राजनारायण ने चुनावी गड़बड़ियों को लेकर इंदिरा पर सात आरोप लगाए. इन आरोपों की सुनवाई कर रहे थे जगमोहन लाल सिन्हा. जो आज के दिन ही साल 1920 में जन्मे थे.

News18Hindi
Updated: May 12, 2019, 1:13 PM IST
इस जज ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कोर्ट में बुलाकर छह घंटे तक कटघरे में बिठाया था
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा
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Updated: May 12, 2019, 1:13 PM IST
समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ हर जगह लड़ाई लड़ी थी, संसद में और सड़क पर भी, चुनाव के मैदान में और अदालत में भी, कोई मोर्चा नहीं छोड़ा थी.  फिर 1969 में जिन समाजवादियों को लगता था कि इंदिरा सही काम कर रही हैं, उनका मोहभंग हो चुका था. 1971 के चुनावो में विपक्ष ने इंदिरा गांधी के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार खड़ा करने की योजना बनाई लेकिन इंदिरा के खिलाफ उतरने के लिए न ही चंद्रभानु गुप्ता तैयार हुए और न ही चंद्रशेखर. ऐसे में राजनारायण को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया था.

जाहिर है इंदिरा के सामने तब किसी को टिकना नहीं था और टिके भी नहीं. राजनारायण 1971 का चुनाव हार गए. हालांकि राजनारायण ने इन चुनावों पर कड़ी नज़र रखी तो उन्हें चुनावों में की गई इंदिरा गांधी की गलतियों का भी पता था ऐसे में चुनाव खत्म होते ही वे न्यायालय पहुंचे और इंदिरा पर सात आरोप लगाए. फिर मुकदमा शुरू हुआ, जो लंबा चला. ऐसे में एक समय वह भी आया जब इंदिरा को खुद अदालत में हाज़िर होना पड़ा और सफाई देनी पड़ी. 6 घंटे तक पूछताछ चलती रही. लेकिन इस वाकये से ज्यादा चर्चा का विषय बना वो जज, जिसने यह हिम्मत दिखाई. ये जज थे जगमोहन लाल सिन्हा.



कौन थे जगमोहन लाल सिन्हा
सत्ता में रहने के दौरान एक प्रधानमंत्री को कोर्ट में बुलाना और उसके बाद 6 घंटे तक उनसे पूछताछ करना छोटी बात नहीं थी. तमाम बहसें उस दौर में इस केस और प्रोटोकॉल पर देश में चल रही थीं लेकिन जगमोहन लाल सिन्हा अपनी बात पर अडिग थे. 12 मई, 1920 को जन्मे जगमोहन लाल सिन्हा 1970 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए थे.

जन प्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन करने के लिए उनके चुनाव को रद्द कर दिया था और 6 सालों तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी थी. जगमोहन लाल सिन्हा के जीवन में यह केस सबसे बड़ा केस रहा. जगमोहन लाल सिन्हा का निधन 20 मार्च, 2008 को हो गया.

जब इंदिरा गांधी को गवाही के लिए बुलाया गया हाईकोर्ट
राजनारायण की ओर से इस केस को लड़ रहे थे मशहूर वकील शांति भूषण. वे लिखते हैं, "इंदिरा गांधी को अदालत कक्ष में बुलाने से पहले उन्होंने भरी अदालन में ऐलान किया कि अदालत की परंपरा है कि लोग तभी खड़े हों जब जज अदालत के अंदर घुसे. इसलिए जब कोई गवाह अदालत में घुसे तो वहां मौजूद लोगों को खड़ा नहीं होना चाहिए."
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इसके बाद जब इंदिरा गांधी अदालत में घुसीं तो उनके सम्मान में उनके वकील एससी खरे को छोड़ कोई खड़ा नहीं हुआ. वे भी सिर्फ आधे खड़े हुए. इंदिरा गांधी के लिए कटघरे में एक कुर्सी का इंतजाम किया गया था ताकि वे उसपर बैठ अपनी गवाही दे सकें.

फैसले को प्रभावित करने की बहुत कोशिशें हुईं
जगमोहन लाल काफी सख्त जज माने जाते थे और कई अलग-अलग तरीकों से उनसे संपर्क करके उन्हें प्रभावित करने की कोशिशें के बावजूद भी वे अपनी ईमानदारी से टस से मस नहीं हुए थे. जगमोहन ने यह कोशिश करने के लिए कि कोई उनका फैसला प्रभावित न करे, इसके लिए उन्होंने अपने घर वालों से कह दिया था कि वे सभी को कहें कि जगमोहन उज्जैन चले गए हैं. और 28 मई से 7 जून तक वे पूरी तरह से घर में बंद हो गए.

यहां तक की जगमोहन के पास इलाहाबाद के चीफ जस्टिस डीएस माथुर आए हुए थे, जिन्होंने होम मिनिस्ट्री के एडीशनल सेक्रेटरी पीपी नायर को फोन करके रिक्वेस्ट की कि फैसला जुलाई तक टाल दिया जाए. लेकिन जगमोहन मानते थे कि ऐसा होने पर सच हमेशा के लिए दब जाएगा. इसलिए उन्होंने कहा कि फैसला 12 जून को ही आएगा.

यूं अपने फैसले को रखा दुनिया से सुरक्षित
पांच साल बाद जब फैसला आया तो इंदिरा गांधी के दबाव के बाद भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने कानून के पालन के सामने कोई परवाह नहीं की थी. हालांकि जज की जासूसी के लिए एक IB का अफसर लगा था, जिसे पता करना था कि क्या फैसला आने वाला है. लेकिन जगमोहन सिन्हा भी कम नहीं थे उन्होंने अपने टाइपिस्ट को घर बुलवाकर फैसला अपने टाइपिस्ट को लिखवाया और इसके बाद उसे तभी जाने दिया जब फैसला सुना दिया गया.

आखिर इंदिरा गांधी का चुनाव हो गया रद्द
दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर लिखते हैं, 'दुबले-पतले 55 साल के जज साहब गाड़ी से सीधे कोर्ट पहुंचे. कमरा नंबर 24 में वे जैसे ही कुर्सी पर बैठे, अट्ठे कपड़ों में तैयार होकर आए पेशकार ने खचाखच भरे कोर्ट में ऊंची आवाज में कहा, ध्यान से सुनिए, जज साहब जब राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला सुनाएंगे तो कोई ताली नहीं बजनी चाहिए.

अपने सामने 258 पेज के फैसले के साथ मौजूद सिन्हा ने कहा कि मैं इस केस के विभिन्न पहलुओं पर केवल अपने निष्कर्षों को पढूंगा. फिर उन्होंने कहा, याचिका स्वीकार की जाती है. एक पल के लिए सन्नाटा छा गया और फिर हर्षध्वनि से कोर्टरूम गूंज उठा. अखबार वाले टेलिफोन की तरफ भागे और खुफिया विभाग के लोग अपने दफ्तरों की तरफ. और सुबह 10:02 बजे शेषन कने यूएऩआई की मशीन पर घंटी की आवाज सुनी और फ्लैश मैसेज देखा- 'इंदिरा गांधी अपदस्थ.'

जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को दो मुद्दों पर चुनाव में अनुचित साधन अपनाने का दोषी पाया. पहला तो ये कि इंदिरा गांधी के सचिवालय में काम करने वाले यशपाल कपूर को उनका चुनाव एजेंट बनाया गया जबकि वो अभी भी सरकारी अफ़सर थे. माना गया था कि इंदिरा गांधी ने लाउडस्पीकरों और शामियाने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर कराई.

इसके बाद लगी इमरजेंसी
जैसी इंदिरा को आशा थी, वैसा ही हुआ. फैसला उनके खिलाफ आया. उनपर अगले 6 सालों तक चुनाव लड़ने से रोक लगा दी गई थी. इंदिरा गांधी की मित्र पुपुल जयकर ने इंदिरा की जीवनी में लिखा है, इंदिरा को आशंका थी कि फैसला उनके खिलाफ आ सकता है. 12 जून, 1975 को फैसला आया और इसके 14 दिनों के बाद इंदिरा ने देशभर में आपातकाल लगा दिया.

भारत के चीफ जस्टिस और उपराष्ट्रपति ने भी की थी तारीफ
प्रशांत भूषण की किताब 'द केस दैट शुक इंडिया' की भूमिका में तत्कालीन उप राष्ट्रपति मोहम्मद हिदायतुल्ला ने जस्टिस सिन्हा को अमेरिका के वाटरगेट कांड की सुनवाई करने वाले जस्टिस जॉन सिरिका जैसा बताया था. इस जज के चलते वहां के राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था.

शांति भूषण खुद लिखते हैं कि जनता पार्टी की सरकार में कानून मंत्री बनने के बाद वे जस्टिस सिन्हा को हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय में ऐसे ट्रांसफर कराना चाहा ताकि वे वहां आगे चलकर मुख्य न्यायाधीश बन जाएं लेकिन जस्टिस सिन्हा ने इसके लिए विनम्रतापूर्वक मना कर दिया.

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