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'कारु, सारु, केसीआरु...' तेलंगाना का 'बाहुबली' जिसे 10 साल पहले सबने खत्‍म मान लिया था

D P Satish | News18Hindi
Updated: December 13, 2018, 5:25 PM IST
'कारु, सारु, केसीआरु...' तेलंगाना का 'बाहुबली' जिसे 10 साल पहले सबने खत्‍म मान लिया था
तेलंगाना विधान सभा चुनाव में जीतने के बाद केसीआर

के चंद्रशेखर राव के लिए 1909 से 2009 का समय बहुत मुश्किल था लेकिन उसके बाद वो विजेता की तरह कैसे उभरे

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  • Last Updated: December 13, 2018, 5:25 PM IST
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“काल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव जुझारु योद्धा हैं. बागी हैं. उनके बारे में कुछ भी पहले से कहा नहीं जा सकता. वे रिस्क उठाना पसंद करते हैं. 1985 में कांग्रेस छोड़ टीडीपी में शामिल होना उनके लिए जोखिम भरा था. उससे भी ज्यादा जोखिम था जब उन्होंने शानदार दौर से गुजर रहे चंद्रबाबू नायडू के विरोध में झंडा उठा लिया. वाइएसआर का विरोध भी कठिन था. शायद सबसे ज्यादा कठिन था, अपने निर्धारित वक्त से नौ महीना पहले विधानसभा को भंग करने का फैसला. सबके बावजूद उन्होंने हर चुनौती का सामना किया. आखिर में विजेता के रूप में सामने आए.”

केसीआर के नाम से लोकप्रिय के. चंद्रशेखर राव के लिए 1999 से 2009 तक का दौर बहुत खराब रहा. 1999 में वह तेलुगुदेशम पार्टी के खास नेताओं में थे. उसके टिकट पर चुनाव जीते. उम्मीद थी कि उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा. उससे पहले वह श्रम मंत्री रह चुके थे. तब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू ने उम्मीदों पर पानी फेरते हुए उन्हें राज्य विधानसभा का डिप्टी स्पीकर बना दिया.

केसीआर ने पद स्वीकार तो कर लिया, लेकिन साल भर में ही बदला लेने के लिए उस टीडीपी को छोड़ दिया, जिससे वह चार बार से जीतते रहे थे. उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर अलग तेलंगाना राज्य के अभियान को खड़ा किया. 2004 में उन्हें सफलता मिली. उन्होंने लोकसभा की चार सीटों पर जीत हासिल की.



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केसीआर केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई में बनी यूपीए-1 सरकार में श्रम विभाग के कैबिनट मंत्री बनाए गए. तेलंगाना को अलग राज्य बनाने कांग्रेस की हीलाहवाली से खफा हो कर उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ दी. उपचुनाव में उतर गए.

2009 में एनडीए में शामिल हुए 
2009 में वे अकेले लड़े. नतीजों से एक दिन पहले वे आडवाणी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हुए लेकिन अगले ही दिन नतीजे कुछ और ही रहे. उन्हें संसद में सिर्फ दो ही सीटें मिली. कांग्रेस 206 सीटों के साथ सत्ता में वापस आ गई. आंध्र प्रदेश में डॉ. वाईएसआर फिर ताकतवर हो गए.

(फाइल फोटो- केसीआर)


उनकी इस हालत पर टिप्पणी करते हुए दिल्ली के एक एंकर ने टीवी पर कहा कि अब तेलंगाना और केसीआर दोनों सपने खत्म हो गए हैं. उस एंकर की टिप्पणी का जवाब देते हुए अमेरिका में पढ़ी लिखी और न्यूजर्सी में लेक्चरर की नौकरी छोड़ कर तेलंगाना के लिए संघर्ष करने आई उनकी बेटी के कविता ने कहा-“हम खत्म नहीं हुए हैं. तेलंगाना को हकीकत बनाकर ही दम लेंगे. मेरे पिता जुझारू हैं. उनको कमतर मत आंकिए.”

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केसीआर को लगा यही सही समय है
कुछ ही महीनों बाद मुख्यमंत्री वाईएसआर की एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई. कांग्रेस में कलह शुरु हो गई. वक्त का इंतजार कर रहे केसीआर को लगा यही सही समय है. उन्होंने फिर से तेलंगाना का संघर्ष शुरू कर दिया.

उनके आमरण अनशन से केंद्र को मजबूर होकर आंध्र को बांटना पड़ा. उस वक्त के केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम, जो पहले केसीआर को दिवास्वप्न देखने वाला कहकर खारिज कर चुके थे, उन्हें नार्थ ब्लॉक के अपने कार्यालय में आधी रात को घोषणा करनी पड़ी. केसीआर पहला राउंड जीत चुके थे.

तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने
अपने वादों को हकीकत बनाने के लिए केसीआर को अगले चार साल मेहनत करनी पड़ी. उनकी युवा बेटी ने भी नई दिल्ली में पर्दे के पीछे से राज्य के लिए बहुत कुछ किया. उनकी मेहनत रंग लाई. यूपीए -2 ने संसद में तेलंगाना बिल पारित कर दिया. जैसा अपेक्षा थी वह 2 जून 2014 को तेलंगाना राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने.

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(File photo)


मैं चिल्लाया देश की नेता इंदिराजी हैं
2013 के मध्य में उन्होंने इस रिपोर्टर से बात करते हुए कहा था कि संजय गांधी उनका समर्थन करते थे. उनकी मौत के बाद से मुझे कांग्रेस छोड़ना पड़ा.

उन्होंने कहा था, “उस वक्त मैं युवा कांग्रेस में था. इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थीं. उनके साथ कोई भी नहीं था. उस समय मैं संसद भवन गया उनका समर्थन करने. जैसे ही उस वक्त के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई अपनी कार से उतरे. मैं चिल्लाया देश का नेता कौन है देश का नेता कौन है देश की नेता इंदिराजी हैं.”

केसीआर तेलुगू आंदोलन के नेता एनटी रामाराव के जोरदार फैन थे. जब एनटीआर ने तेलुगुदेशम बनाई तो केसीआर उसमें शामिल हो गए. उन्होंने 1985 से 1999 तक चार बार विधानसभा चुनावों में टीडीपी से जीत हासिल की.

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गरीबों, किसानों के लिए दर्जनों घोषणाएं 
किसी भी तरह की आलोचना से बिना डरे केसीआर 2014 तक अपनी पार्टी को हांकते रहे. उन्होंने ये भी भांप लिया कि लोगों से जुड़े रहने के लिए उन्हें कल्याणकारी योजनाएं चलानी होंगी. उन्होंने इसके बाद दर्जनों योजनाओं की घोषणा कर दी. ये गरीबों किसानों और ग्रामीणों के लिए थी.

वैसे तो केसीआर हर मायने में सेक्युलर हैं लेकिन बीजेपी से भी उनके रिश्ते अच्छे रहे. फिर उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रति नजरिया उदार रखा. उनका मानना है कि केंद्र से अच्छे रिश्ते से राज्य का फायदा होगा. उन्होंने रिश्ते किसी निजी फायदे के लिए नहीं रखे.

(फाइल फोटो- केसीआर)


आलोचना करने वालों के लिए उनका एक रटारटाया जवाब है-“मैं सबसे बेहतर हिंदू हूं. मैं सबसे बेहतर मुसलमान हूं और मैं सबसे बेहतर कम्युनिस्ट हूं. ”

पार्टी के एक धड़े की सलाह के बाद भी उन्होंने एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी से अच्छे रिश्ते रखे. अंत में वह सही साबित भी हुए.

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केंद्रीय राजनीति में है महत्वाकांक्षा 
केसीआर की महत्वाकांक्षा केंद्रीय राजनीति में है और उनके नजदीकी मानते हैं कि वे मुख्यमंत्री का पद अपने बेटे केटी रामा राव को सौंप देंगे. वे भी अमेरिका से पढ़े लिखे हैं.

उनकी बेटी कविता का तेलंगाना जागृति नाम का एनजीओ है, जो राज्य में सबसे ताकतवर संगठन बन चुका है. उन्होंने बातुकाम्मा उत्सव को फिर से चालू किया. उसे ग्लोबल बना दिया.

जोरदार तरीके से विधानसभा का चुनाव जीत कर केसीआर ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है. चाहे वे केंद्र में हो या राज्य में. वे एक आस्तिक हिंदू हैं. ज्योतिष के साथ वास्तु में विश्वास करते हैं. वे अपनी सफलता के श्रेय परमात्मा को देते हैं.

उनके चाहने वाले समर्थक लय में कहते हैं, "कारु सारू केसीआरू", और ये लय आने वाले वक्त में तेलंगाना में गूंजती लग रही है.

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First published: December 13, 2018, 3:22 PM IST
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