युवराज सिंह के वो जख्म जो शायद आपको कभी नजर नहीं आएंगे

वो कहानी, जो उस दर्द को बयां करती है, जिसे इस क्रिकेटर ने बचपन से जिया, जो अब भी उसके मन के कोने में बरकरार है.

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12 दिसंबर 1981. रात 09 बजकर 45 मिनट पर जब युवराज सिंह चंडीगढ़ में पैदा हुए तो उनका भाग्य पिता योगराज सिंह पहले ही लिख चुके थे. "मेरा बेटा दुनिया का बेस्ट क्रिकेटर बनेगा." पैदाइश ने युवराज के साथ एक बात और तय कर दी, वो था दर्द से हमेशा बने रहने वाला रिश्ता. मुंबई में संन्यास की घोषणा करते हुए युवराज के शब्द थे, "मेरे पापा मेरे लिए शुरू से ही एक ड्रैगन हैं, मैं तो मैच्योर हो गया, उनका पता नहीं कि वो हुए हैं या नहीं."

ये दर्द ऐसा है कि बयां करने पर बहुत से पेरेंट्स कांप उठें. मनोचिकित्सक कहेंगे, "कोई अगर अपने बच्चों को ऐसे पालता है तो वो सामान्य नहीं मनोरोगी है." कहना चाहिए कि युवराज से उनका बचपन काफी हद तक छीन लिया गया. इसकी वजह पिता का बेटे को बेस्ट क्रिकेटर बनाने का सपना था. उनका बचपन सामान्य तो कतई नहीं बल्कि उसे कठोर कहना चाहिए.

"ओपन" मैगजीन में 02 अप्रैल 2011 अंक में छपे अक्षय सवाई लिखते हैं कि योगराज सिंह के एक पड़ोसी ने कहा, "मुझे नहीं मालूम युवराज और योगराज के रिश्ते कैसे हैं लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि युवराज का बचपन वाकई खौफनाक था." इसी लेख में योगराज भी कहते हैं, "मैं अपने बेटे को मजबूत करने के लिए उसे एक्स्ट्रीम सीमा तक ले गया."



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इसके बाद योगराज की मां उनसे लंबे समय तक नहीं बोलीं
योगराज खुद भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेल चुके हैं. वो पंजाबी फिल्मों में हीरो रह चुके हैं. लेकिन जिस बात के लिए हाल के बरसों में उनकी ज्यादा चर्चा हुई है, वो उनका उग्र व्यवहार है. कब वो बात करते हुए त्योरियां चढ़ा लें, कहा नहीं जा सकता. इसे लेकर बहुत कुछ मीडिया में आता रहा है.

एक वाकया है, वो दस साल के छोटे युवराज सिंह को घर के पीछे के अहाते में कैच की प्रैक्टिस करा रहे थे. उन्होंने इतनी तेजी से गेंद युवराज की ओर फेंकी कि उसके नन्हें हाथ उसे कैच नहीं ले पाये, सिर फूट गया. पिता के चेहरे पर बेशक शिकन न आई हो लेकिन गुस्से से दादी का पारा चढ़ गया. उस दिन से उन्होंने अपने बेटे से जो बोलना बंद किया तो लंबे समय तक नहीं बोलीं. सारा घर डिस्टर्ब हो गया. मां शबनम ये सब देखकर आंसू बहाती रहती थीं. पिता पर कोई असर नहीं होता था.

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पिता ने मेडल्स बाहर फेंका और कहा- आइंदा ये नहीं करोगे
युवराज किसी छोटी सी क्लास में थे. जब उन्होंने पहली बार स्कूल में स्केटिंग का मेडल जीता था. कार में बैठने के बाद जब उन्होंने पिता को ये मेडल दिखाए तो यही सोचा कि पिता से वाहवाही मिलेगी. लेकिन ये देखते ही पिता की त्यौरियां चढ़़ गईं. उन्होंने कार से मेडल्स बाहर फेंकते हुए चेतावनी दी, खबरदार, अगर दोबारा ये लड़कियों वाला खेल खेला, तुम केवल क्रिकेट खेलोगे. सोचिए उस बालमन पर क्या असर पड़ा होगा.

उस दिन के बाद से सात-आठ साल के युवराज का रूटीन बदल गया. उन्हें सुबह जल्दी उठना होता था. मैदान पर जाकर दौड़ना होता था. फिर वहां से सीधे डीएवी मैदान की ओर जाना होता था, जहां पिता क्रिकेट कोच थे, वहां सुबह और शाम घंटों प्रैक्टिस करनी होती थी. घर आने के बाद रात को भी घंटों प्रैक्टिस चलती रहती थी. चोटें शरीर पर भी लगती थीं. अक्सर पिता के कठोर व्यवहार के कारण दिल और दिमाग पर भी. चार-पांच साल यही चलता रहा.

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सिद्धू ने कहा था- ये लड़का क्रिकेट में कुछ नहीं कर पाएगा
उन्हीं दिनों योगराज ने दोस्त नवजोत सिंह सिद्धू से कहा, "जरा मेरे बेटे का खेल देखकर बताओ ये कैसा खेलता है." सिद्धू ने खेल देखा, फिर कुछ देर बाद, "ये लड़का क्रिकेट में कुछ कर नहीं पाएगा." योगराज का चेहरा लाल हो गया. कुछ देर वो चुप रहे और फिर उन्होंने युवराज की ओर गहरी नजर से देखकर कहा, "देखता हूं कि तुम कैसे क्रिकेटर नहीं बनते. मैं तुमको क्रिकेटर बनाकर रहूंगा."

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एक ही अच्छी चीज थी- मां का प्यार 
युवराज की मां शबनम ने चंडीगढ़ में घर के पीछे गार्डन बना रखा था. पिता ने उस गार्डन को उखाड़कर वहां क्रिकेट का विकेट बना दिया. "ओपन" मैगजीन ने लिखा, "पिता के कठोर अनुशासन और गुस्सैल व्यवहार के बीच युवराज के पास एक अच्छी चीज थी, मां का अथाह प्यार और ममता." हालांकि मां और पिता के बीच लगातार मतभेद और विवाद की स्थितियां बनी रहती थीं.

वर्ष 2007 में जब युवराज खुद को बड़े क्रिकेटर के रूप में स्थापित कर चुके थे तो योगराज ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, "अगर मेरा छोटा बेटा बॉडीबिल्डिंग कर पाता और वो मुझसे चार साल ढंग से ट्रेनिंग लेता तो यकीनन हॉलीवुड स्टार बन जाता." उसी तरह उन्होंने छोटी बेटी अमरजोत के लिए कहा, "मैं चाहता हूं कि वो सानिया मिर्जा नहीं बल्कि सेरेना विलियम्स की तरह बने और विंबलडन जीते."  ये तो नहीं मालूम कि युवराज के छोटे भाई-बहनों का बचपन इतना कठोर था या नहीं लेकिन दोनों खेलों में कुछ खास नहीं कर पाए.

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मुंबई में वेंगसरकर एकेडमी में भी जीवन कठिन रहा
युवराज के लिए अच्छी बात ये हुई कि पिता के साथ चार-पांच साल की ट्रेनिंग के बाद वो मुंबई में वेंगसरकर एकेडमी चले गए. हालांकि जीवन वहां भी मुश्किल था. रोज अंधेरी से चर्चगेट ट्रेन में आना-जाना दिक्कत भरा था. युवराज ने अपने इस जीवन के बारे में बाद में कहा, "अगर पिता के साथ चंडीगढ़़ में ट्रेनिंग बहुत कठोर थी तो मुंबई का जीवन भी उतना ही मुश्किल. अच्छी बात ये हुई कि इन सबने मुझे वाकई कठोर बना दिया."

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हालांकि ज्यादातर लोगों का मानना था कि ये अच्छा ही हुआ कि युवराज पिता के साये से निकलकर वेंगसरकर एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए आ गए. अपने संन्यास के समय युवराज ने पिता को लेकर जो बात कही, उससे जाहिर है कि उनके अंदर पिता को लेकर जो दर्द है, वो शायद ही कभी खत्म हो.

तब भी युवराज मानसिक दबाव से गुजर रहे थे 
इसमें कोई शक नहीं कि युवराज में क्रिकेट के बीज तो योगराज ने ही डाले लेकिन ये भी सही है कि उनमें टैंपर की सीरियस प्रॉब्लम हमेशा रही. जूनियर वर्ल्ड कप क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन के बाद युवराज सीनियर टीम में चुने गए और देखते ही देखते छा गए. उनके आलराउंड खेल का जादू सिर चढ़कर बोलने लगा.

हालांकि तब वो लगातार एक मानसिक दबाव से गुजर रहे थे. मां शबनम ने आखिरकार फैसला किया कि वो अलग रहेंगी. उनके इस फैसले में बच्चे उनके साथ थे. क्रिकेटर के रूप में पहचान बनाने के बाद युवराज ने कभी पिता के बारे में बोलना पसंद नहीं किया.

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दर्द से दूसरा रिश्ता
दर्द से उनका दूसरा रिश्ता तब हुआ जब उन्हें कैंसर हुआ. वो अमेरिका के अस्पताल में इलाज कराने गए. इलाज के दौरान पीड़ाभरे इलाज से जूझते रहे. कोई और होता तो बीमारी से सही होने के बाद मैदान की ओर शायद ही रुख कर पाता, क्योंकि इसके लिए कहीं ज्यादा स्टेमिना, ताकत और मानसिक मजूबती की जरूरत होती है. लेकिन जब वो वापस मैदान पर लौटे और खुद को इसके लिए तैयार किया, वो वाकई एक मिसाल थी, जो हम सबको एक प्रेरणा देती है. ये बात सही है कि वो वाकई चैंपियन हैं.

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02 अप्रैल 2011 की रात जब वो आए
ये बिल्कुल 02 अप्रैल 2011 उस रात के बाद की बात है, जिस रात वो टीम इंडिया को वर्ल्ड कप के फाइनल में जिताने के बाद "मैन ऑफ द टूर्नामेंट" बने थे. उस जीत के बाद जब रात में वो वानखेडे स्टेडियम में नीचे बने प्रेस कांफ्रेंस हाल में आए तो खुशी के बाद कुछ उदासी ओढ़े लग रहे थे. कुछ खांस भी रहे थे. ये एक अलग तरह का युवराज था, जो मस्तमौला नजर आने वाले क्रिकेटर से अलहदा लग रहा था.
हां, यहां ये भी कहना चाहिए कि अगर महेंद्र सिंह धौनी सफल कप्तान हैं तो शायद इसलिए भी, क्योंकि युवराज सिंह उनके साथ थे. यकीनन युवराज की पूरी उर्जा और क्षमता सामने नहीं आ पाई. कहा जाता है ना कि "कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता."

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