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कौन है वो साहसी पाकिस्तानी जज, जिसने मुशर्रफ को सुनाई फांसी की सजा

News18Hindi
Updated: December 20, 2019, 1:20 PM IST
कौन है वो साहसी पाकिस्तानी जज, जिसने मुशर्रफ को सुनाई फांसी की सजा
मुशर्रफ को फांसी की सजा सुनाने वाले जस्टिस वकार अहमद सेठ

पाकिस्तान में जब पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ को स्पेशल कोर्ट ने देशद्रोह मामले में फांसी की सजा सुनाई तो दुनियाभर में हैरानी हुई कि क्या पाकिस्तान में कोई कोर्ट वहां की ताकतवर सेना के रहते हुए ऐसा फैसला सुना सकती है. जानते हैं कि वो फैसला सुनाने वाला जज कौन है, जिस पर पाकिस्तान की सरकार कार्रवाई करना चाह रही है

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  • Last Updated: December 20, 2019, 1:20 PM IST
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पेशावर की जिस स्पेशल कोर्ट ने पाकिस्तान के पूर्व शासक परवेज मुशर्रफ को फांसी की सजा सुनाई है. उसके मुख्य जज वकार अहमद सेठ हैं. जिन्होंने अपने फैसले में ये भी लिखा था कि अगर फांसी लगने से पहले मुशर्रफ की मृत्यु हो जाती है तब भी उनके शव को तीन दिन तक सार्वजनिक तौर पर लटकाया जाए. अब पाकिस्तान सरकार उन्हें हटाने की कार्रवाई कर रही है.

पाकिस्तान के मजबूत सैन्य शासक रहे मुशर्रफ के खिलाफ फांसी का फैसला देना साहसिक ही कहा जाएगा, क्योंकि पाकिस्तान में सेना ना केवल बहुत ताकतवर मानी जाती रही है बल्कि जनरल परवेज मुशर्रफ सेना में हमेशा लोकप्रिय रहे हैं. सेना के सभी मौजूदा बड़े अफसर कभी उनके जूनियर रहे हैं. सेना कभी नहीं चाहेगी कि मुशर्रफ को ऐसी कड़ी सजा मिले.
पाकिस्तान की इमरान खान की सरकार खुद मुशर्रफ को लगातार बचाती रही है. इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले ऊपरी कोर्ट में अपील करने का फैसला भी पाकिस्तान सरकार ने कर डाला है.

अब जानते हैं कि ये वकार अहमद सेठ कौन हैं. जिनके साहस की तारीफ पाकिस्तान का एक बड़ा वर्ग कर रहा है. इस समय वो पाकिस्तानी मीडिया में छाए हुए हैं. हालांकि उनके फैसले पर पाकिस्तानी सरकार ने उनकी मानसिक स्थिति में सवाल उठाते हुए मामले को पाकिस्तान की जूडिशियल कौंसिल में ले जाने का फैसला किया है.



वकार अहमद सेठ पेशावर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस भी हैं. उनकी पढाई लिखाई पेशावर में ही हुई. उनकी उम्र 58 साल है. पेशावर के एक कॉलेज से उन्होंने 1985 में कानून की डिग्री ली. फिर निचली अदालतों में वकालत शुरू कर दी. 1990 में उन्होंने खुद को हाईकोर्ट के वकील के तौर पर रजिस्टर कराया. 2008 में वो सुप्रीम कोर्ट के वकील बने.

जस्टिस सेठ को उनके साहसिक फैसलों के लिए जाना जाता है. वो आमतौर पर लो-प्रोफाइल रहने वाले शख्स हैं


जज के तौर पर करियर आठ साल का
जज के रूप में उनका करियर बाद में 2011 में शुरू हुआ. तब उन्हें पेशावर हाईकोर्ट में अतिरिक्त जज के रूप में शामिल किया गया. उन्हें साथ ही बैंकिंग जज, कंपनी जज और जूडिशियरी सर्विस ट्रिब्यूनल का काम भी दिया गया.

पिछले साल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने
28 जून 2018 को उन्हें पेशावर हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया. जब परवेज मुशर्रफ के खिलाफ स्पेशल कोर्ट ने देशद्रोह मामले की सुनवाई शुरू की तो अक्टूबर 2019 में उन्हें तीन सदस्यीय स्पेशल कोर्ट का प्रमुख बनाया गया.

इसी कोर्ट ने मुशर्रफ को मृत्युदंड की सजा सुनाते हुए उन्हें फांसी पर लटकाने का हुक्म सुनाया. पाकिस्तान सेना में इस फैसले की तीखी प्रतिक्रिया हुई. पाकिस्तान मिलिट्री के इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशन के डायरेक्टर जनरल आसिफ गफूर ने कहा कि मुशर्रफ ने देश को बचाया है. उनके खिलाफ फैसले से पाकिस्तानी सेना में रोष है.

इस पैरे से उपजा विवाद
मुशर्रफ के खिलाफ फांसी के फैसले के बाद जस्टिस सेठ के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है. सरकार ने उन्हें मानसिक तौर पर अनफिट बता रही है. दरअसल जस्टिस वकार सेठ ने साथी जजों के साथ इस फैसले को 75 पेजों में लिखा है. इसी के 66वें पैरे में लिखा गया है कि मुशर्रफ अगर फांसी से पहले ही दिवंगत हो जाते हैं तो उनके शव को इस्लामाबाद के डी चौक पर तीन दिनों तक लटकाया जाए.

परवेज मुशर्रफ को फांसी देने से पहले भी वो सेना के खिलाफ दो कड़े फैसले सुना चुके हैं


हमेशा शांत रहने वाले शख्स
पाकिस्तान के समाचार माध्यमों के अनुसार जस्टिस सेठ हमेशा लो-प्रोफाइल और शांत रहने वाले शख्स रहे हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वो ना तो किसी से दबते हैं और ना ही किसी तरह के दबाव में आते हैं. उन्हें कभी सियासती लोगों के करीब भी नहीं कहा गया. वो कोई फैसला कभी सियासी दबाव में नहीं लेते रहे हैं.

उनके जानने वाले ये भी कहते हैं कि उनके फैसलों में कभी ये भी नहीं लगा कि वो सियासी बुनियाद पर कोई फैसला देते हैं. वो आमतौर पर मीडिया से दूर रहते हैं.
जज बनने के बाद कई जिम्मेदारियां सौंपी गईं
उनके करीबी दोस्त कहते हैं कि जस्टिस सेठ जब वकालत करते थे तब वो बहुत शांत और विवादों से परे रहने वाले शख्स थे. उनकी कानूनी विद्वता पर कभी किसी को शक नहीं रहा. इसलिए उन्हें जज बनने के बाद लगातार कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं.

फौज के खिलाफ कड़े फैसले पहले भी कर चुके हैं
जस्टिस वकार इससे पहले भी फौज के खिलाफ दो कड़े फैसले कर चुके हैं. वर्ष 2018 में उन्होंने पाकिस्तान की फौजी अदालतों द्वारा 74 दहशतगर्तों को सुनाई मौत की सजा को मुअत्तल कर दिया था. अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है. इससे पहले वो खैबर पख्तून में फौज को ज्यादा अधिकार देने के खिलाफ भी फैसला सुनाया था.

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First published: December 20, 2019, 1:18 PM IST
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