लेबनान पर क्यों एक के बाद एक मुसीबतें आ रही हैं?

लेबनान पर क्यों एक के बाद एक मुसीबतें आ रही हैं?
लेबनान की अर्थव्यवस्था कोरोना काल से पहले से चरमराई हुई है (Photo-flickr)

लेबनान में धमाका (Lebanon blast) उस वक्त हुआ है, जब वो पहले से ही कई सारे संकटों से गुजर रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 7, 2020, 11:25 AM IST
  • Share this:
लेबनान की राजधानी बेरूत में मंगलवार रात हुए धमाके में अब तक 137 मौतें हो चुकी हैं और 5000 से ज्यादा घायल हैं. माना जा रहा है कि दुर्घटनावश हुए इस ब्लास्ट के पूरे नुकसान का अभी अंदाजा नहीं लगाया जा सका है. ये धमाका उस वक्त हुआ है, जब लेबनान पहले ही कई संकटों से जूझ रहा है. खासकर इस देश में आर्थिक संकट इतना गहराया हुआ है कि कोरोना को भूलकर लोग सड़कों पर उतर चुके हैं.

क्या मुसीबत आई है अर्थव्यवस्था पर?
लेबनान की अर्थव्यवस्था कोरोना काल से पहले से चरमराई हुई है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर जितना उत्पादन है, उससे ज्यादा कर्ज है. इस तरह से कर्ज लेने वाले देशों में ये दुनिया में तीसरे नंबर पर रहा. यहां बेरोजगारी दर 25% से भी ऊपर जा चुकी है और लगभग एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे रह रही है. इसी समय कोरोना का प्रकोप हुआ. बंदी के कारण पहले से ही बेरोजगारी झेल रहे देश में और भी नौकरियां जाने लगीं.

आर्थिक संकटों के चलते सरकार से नाराज लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं

बुरे हैं देश के हालात


इन सबके बीच पूरे देश में बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं. जैसे यहां बिजली कटौती दिन के 20 घंटे होना मामूली बात है. सड़कों पर कचरे का ढेर जमा हो रहा है लेकिन उसे उठाने के लिए सफाईकर्मी नहीं क्योंकि सरकार उन्हें भी वेतन नहीं दे पा रही है. यहां तक कि लोग कम दामों पर एक्सपायर्ड खाना खरीदने और गंदा पानी पीने को मजबूर हो चुके हैं. इसबीच ये धमाका हुआ. इससे पहले से ही संवेदनशील हालातों में जी रहे लेबनान की हालत और चरमरा गई है. धमाके में लेबनान की आयात की गई खाद्य सामग्री भी बर्बाद हो चुकी है. इसके चलते आशंका जताई जा रही है कि लेबनान अब और भी मुश्किल समय देखने वाला है.

ये भी पढ़ें: क्यों पेड़ लगाने के कारण लेबनान पर भड़का हुआ है इजरायल?

क्यों हो रहे प्रदर्शन
आर्थिक संकटों के चलते सरकार से नाराज लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं. लोगों का आरोप है कि सरकार अपनी जेबें भरने में लगी रही और इसलिए देश की ऐसी हालत हो गई है. विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत अक्टबूर 2019 से हुई, जब विदेशी मुद्रा की कमी के कारण लेबनानी पाउंड में बुरी तरह से गिरावट आई. ऐसे में आयातकों को अनाज और ईंधन के बदले डॉलर में भुगतान की बात हुई, जिससे भड़की हुई यूनियनों ने हड़ताल शुरू कर दी.

आशंका जताई जा रही है कि लेबनान अब और भी मुश्किल समय देखने वाला है


इस वजह से और भड़का आक्रोश
हालातों को और बदतर किया लेबनान के जंगलों में लगी आग ने. तापमान में बढ़त के कारण यहां जंगलों में भीषण आग लग गई. फायर सर्विस में उतनी सुविधाएं न होने के कारण आग भी जल्दी बुझाई नहीं जा सकी. जब तक आग बुझी, काफी नुकसान हो चुका था. अब सरकार ने इस नुकसान को भरने के लिए भी जनता पर बोझ डाला. उसने कहा कि वाट्सएप यूजर्स को हर महीने 6 डॉलर देने होंगे. सरकार का कहना था कि देश की आर्थिक हालत को ठीक करने के लिए ऐसे कई कदम उठाने होंगे.

ये भी पढ़ें: किसलिए इजरायल का पड़ोसी देश दिवालिया होने जा रहा है? 

इसे लेकर पूरे देश में भारी प्रदर्शन शुरू हो गए. ये प्रदर्शन इतना बड़ा था जो लगभग 15 सालों तक चले गृहयुद्ध के बाद पहली बार दिखा था. इस वजह से कुछ ही घंटों में सरकार को अपनी बात वापस लेनी पड़ी. यहां तक कि तत्कालीन पीएम साद हरीरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा. उसके बाद नए पीएम हसन दियाब आए लेकिन तब से ही गरीबी और महंगाई दर को लेकर प्रदर्शन चल ही रहे हैं.

कैसे कोरोना ने मामला बिगाड़ा?
कोरोना के शुरुआती मामले आने और मौतों के साथ ही मार्च में यहां पर लॉकडाउन लगा दिया गया. चूंकि यहां अस्पताल जैसी सुविधाएं एकदम कम हैं, लिहाजा ये जरूरी माना गया. हालांकि इससे प्रदर्शनकारी और भड़क गए. इसकी वजह थी बंदी के कारण बढ़ी बेरोजगारी और तनख्वाह में कटौती.

ये भी पढ़ें: क्या है कन्फ्यूशियस संस्थान, जो भारत में चीन का एजेंट बना हुआ है 

बहुत सी कंपनियों ने लोगों को नौकरी से निकाल दिया या लीव विदाउड पे पर भेज दिया. इससे लेबनानी पाउंड (LBP) की कीमत और गिरी और मंहगाई आसमान छूने लगी. मई में जब लॉकडाउन हटाने की शुरुआत हुई, तब तक लेबनान में चीजों की कीमत दोगुनी या उससे भी ज्यादा हो चुकी थी. यहां तक कि खुद पीएम ने चेतावनी दी कि देश बहुत बड़े फूड क्राइसिस से गुजर रहा है.

धमाके में लेबनान की आयात की गई खाद्य सामग्री भी बर्बाद हो चुकी है (Photo-cnbc)


क्यों लेबनान के हालात नहीं सुधर रहे?
इसकी सबसे बड़ी राजनैतिक अस्थिरता मानी जा रही है. मध्यपूर्व का ये देश सबसे जटिल देशों में से आता है. साल 1943 में आजादी से पहले फ्रांस के अधीन रहा ये देश शिया, सुन्नी और ईसाई तबकों का मिश्रण है. बाद में सीरिया से होते हुए यहां भारी संख्या में फलस्तीनी आए. इनके आने के बाद यहां राजनैतिक अस्थिरता और बढ़ी. सत्तर की शुरुआत से ही यहां पर अलग-अलग मजहबों के लोग लड़ने लगे. यहां तक कि ईरान और इजरायल जैसे देशों के लिए लेबनान लड़ाई का मैदान बनकर रह गया.

ये भी पढ़ें: क्या अमेरिका के एरिया-51 में एलियंस हैं कैद? है दुनिया का सबसे बड़ा रहस्य 

धर्म है बड़ी वजह
यहां साल 1975 से 1989 तक यहां गृहयुद्ध चलता रहा. इसकी बड़ी वजह यहां अलग -अलग धर्मों के वर्चस्व की लड़ाई है. यहां तक कि संसद में भी ये लड़ाई चलती रहती है, जहां धर्म के आधार पर लोगों को सीटें मिली हुई हैं. माना जाता रहा है कि धर्म में इतनी डायवर्सिटी के कारण बाहरी ताकतें इस देश को निशाना बनाती आई हैं. भ्रष्टाचार भी यहां काफी ऊपर है. साल 2019 में ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन में 180 देशों में ये देश 137वें स्थान पर है. बता दें कि ये आंकड़ा रैंक के साथ बढ़ते क्रम में है. संस्था के मुताबिक करप्शन इस देश में राजनैतिक पार्टियों तक ही सीमित नहीं, बल्कि हर स्तर पर है. ये भी इसकी खस्ताहालत की एक वजह है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज