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फ़ैज़ : जिनके कलाम में इंक़लाब के शोले और इश्क़ की लज्‍़ज़त थी

Naaz Khan | News18Hindi
Updated: February 14, 2020, 12:27 PM IST
फ़ैज़ : जिनके कलाम में इंक़लाब के शोले और इश्क़ की लज्‍़ज़त थी
फ़ैज़ ने कहा था कि मुझे शायर बनाने में कोई एक ही गुनाह शामिल नहीं. इसमें दिल की लगी भी शामिल हैं.

फ़ैज़ ने भी मुहब्बत की थी. यह बात अलग है कि उनका इश्क़ भी 'मीर' के इश्क़ की तरह नाकाम रहा. मुहब्‍बत के बारे में ख़ुद फ़ैज़ का नज़रिया था कि 'मुहब्बत ज़िंदगी में एक ही बार होती है. इसके बाद सब हेराफेरी है.'

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  • Last Updated: February 14, 2020, 12:27 PM IST
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(जन्‍मदिवस पर विशेष)

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (Faiz Ahmed Faiz) मुहब्‍बत के शायर कहे जाते हैं. उनकी शायरी की यह ख़ासियत है कि जहां उनके कलाम में इश्क़ (Love) की लज्‍़ज़त मिलती है, तो इंक़लाब (Revolution) के शोले भी भड़कते महसूस होते हैं. अगर इश्‍क़ में मिली नाकामी ने उन्‍हें मुहब्‍बत का शायर बनाया, तो क़ैद में लिखे गए 'ज़िंदानामा' से भी उन्हें शोहरत मिली. यही वजह है क‍ि जहां वह शायरे-इंक़लाब थे, वहीं मुहब्बत के शायर भी थे.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 13 फरवरी, 1911 को अविभाजित हिंदुस्‍तान के शहर सियालकोट (Sialkot) में चौधरी सुल्तान मुहम्मद खां के घर पैदा हुए. उस ज़माने का चलन था कि बच्चों की शुरुआती तालीम घर पर ही होती थी. फ़ैज़ की तालीम की शुरुआत भी घर से ही हुई. उन्होंने घर पर ही उर्दू, फ़ारसी और क़ुरान की तालीम पाई. उनके पिता की साहित्य (Literature) में गहरी रुचि थी और साहित्य से जुड़े लोगों से उनका गहरा लगाव था. मशहूर शायर मुहम्मद इक़बाल भी उनके दोस्तों में शामिल थे. अदब के इस माहौल का असर फ़ैज़ पर भी हुआ. नतीजा यह हुआ कि वह बचपन से ही नज़्म और ग़ज़ल कहने लगे.

फ़ैज़ की शायरी, जिसे लोगों ने दिल से लगाया

फ़ैज़ जब छठी-सातवीं क्लास में थे तब साहित्य के लिए उनका लगाव इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि वह अपने मकान के क़रीब एक दुकान से दो पैसे किराया पर किताब पढ़ने के लिए लाने लगे. यह सिलसिला चलता रहा. उन्होंने कम उम्र में ही 'तिलिस्म होशरुबा', 'फ़साना ए अजायब' जैसी कितनी ही किताबें पढ़ डालीं. जिस वक़्त फ़ैज़ की शायरी की शुरुआत हुई, उस दौर में इक़बाल की नई और जोश से भरने वाली शायरी लगभग हर उभरते हुए शायर को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रही थी. यही दौर शायरे-इंक़लाब जोश मलीहाबादी की शायरी का भी था. उनके कलाम के बहाव में नई नस्ल बही जा रही थी. फ़ैज़ की शख़्सियत की ख़ासियत यह भी थी कि ख़ुद अपनी शायरी के बारे में भी उन्‍होंने बेबाकी से कहा है. 'नक़्शे-फ़रियादी' की प्रस्तावना में उन्होंने लिखा, 'इस किताब की दो-चार नज़्में ही शायद काबिले-बर्दाश्त हों.' फ़ैज़ की इस बात के बावजूद यह उनके कलाम की ख़ासियत ही है कि लोगों ने उनकी नज़्मों को दिल से लगाया और इसे शोहरत की बुलंदी पर बैठा दिया. मगर हक़ीक़त यह है कि ये नज्‍़में इसलिए भी लोगों को पसंद आईं कि इनकी ज़बान सादा, मिठास से भरी और आम इंसान के समझ में आने वाली है. वहीं
फ़ैज़ की शोहरत में प्रगतिशील मुहिम का ख़ास योगदान रहा. क्‍योंकि यह मुहिम आम इंसान के साथ ही रोज़मर्रा के काम कर पेट पालने वाले मज़दूरों, किसानों से जुड़ी हुई थी. यही वजह है कि इनको अपने कलाम में जगह देने वाले शायरों की शोहरत आम तबके तक पहुंच चुकी थी.

 शायर बनाने में एक ही गुनाह शामिल नहीं
जहां तक फ़ैज़ की शायरी की बात है तो इस बारे में ख़ुद फ़ैज़ ने कहा है, 'मुझे शायर बनाने में कोई एक ही
गुनाह शामिल नहीं. इसमें बचपन की फ़ज़ाएं, शायरी का चर्चा और दिल की लगी सभी कुछ शामिल हैं. इस सब कलाम का क़रीब-क़रीब एक ही ज़हनी और जज़्बाती हादसे से ताल्लुक़ है और ज़ाहिरी तौर पर मुहब्बत ही एक हादसा है, जो इस उम्र में अक्सर नौजवान दिलों पर गुज़रता है.' फ़ैज़ ने भी मुहब्बत की, पर किससे यह राज़ उन्‍होंने अपने चंद दोस्‍तों तक ही रखा, लेकिन उनकी पूरी शायरी जैसे इस बात की गवाह है कि उन्होंने भी इश्क़ किया था. यह बात अलग है कि उनका इश्क़ भी 'मीर' के इश्क़ की तरह नाकाम रहा. कहा जाता है कि 17 बरस की उम्र में फ़ैज़ को एक अफ़ग़ान लड़की से मुहब्बत हुई थी.उनके साथ पढ़ने वाले उनके एक दोस्त शेर मुहम्मद हमीद के मुताबिक फ़ैज़ का इश्क़ हमेशा राज़ रहा. अमृता
प्रीतम से हुई एक बातचीत में फ़ैज़ ने यह इज़हार किया था, 'मैंने 18 साल की उम्र में इश्क़ किया था.' मुहब्बत के बारे में ख़ुद फ़ैज़ का नज़रिया था कि 'मुहब्बत ज़िंदगी में एक ही बार होती है. इसके बाद सब हेराफेरी है.' यह उनकी उसी नाकाम मुहब्‍बत का असर है कि उनका शुरुआती कलाम इश्क़ की नाकामी से भरा पड़ा है. उनकी किताब 'नक़्श फ़रियादी' की तमाम नज़्में उनकी इसी नाकाम मुहब्बत की याद ताज़ा करती हैं.

अमृतसर हिंदुस्‍तान बन गया और हिंदुस्‍तान फ़ैज़
फ़ैज़ की आगे की ज़िन्दगी भले ही ऐश से गुज़री हो, लेकिन उनकी ज़िंदगी में भी तंगहाली के साथ काफ़ी उतार-चढ़ाव भी रहे. यह वह ज़माना था जब हिंदुस्‍तान के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे. अफ़रा-तफ़री का माहौल था और लोग रोज़गार की तलाश में मारे-मारे फिर रहे थे. हालांकि इन हालात में भी फ़ैज़ की क़िस्मत ने उनका साथ दिया. 1935 में वह अमृतसर में लेक्चरर हो गए. अमृतसर में फ़ैज़ की शादी भी हुई. दरअसल, अमृतसर में उनकी मुलाकात एलिस कैथरीन जॉर्ज (Alys Catherine-George) से हुई, जो बाद में उनकी हमसफ़र बनीं. एलिस ने फ़ैज़ के लिए अपनी मुहब्बत का इज़हार कुछ इन इस तरह किया था, 'मेरे लिए अमृतसर हिंदुस्‍तान बन गया और हिंदुस्‍तान फ़ैज़.' कई दिक्‍़क़तों के बाद आखि़र वह दिन भी आ गया जब 28अक्टूबर 1941 को श्रीनगर में एलिस और फ़ैज़ का निकाह हुआ.

अपनी शादी के बारे में एलिस ने कहा था कि, 'यह तीन आदमियों की बरात थी, जिसमें फ़ैज़ के अलावा उनके एक दोस्त और भाई शामिल थे. उन्‍होंने फ़ैज़ की शायरी के बारे में एक दिलचस्‍प बात कही थी. उन्‍होंने कहा था, 'यह सवाल मुझसे कई बार पूछा गया है कि क्या तुम अपने शौहर की शायरी समझ लेती हो? काफ़ी ग़ौर करने के बाद मैंने इसका एक हीजवाब ढूंढ़ लिया है. मैं फ़ैज़ की शायरी को समझने का दावा तो नहीं करती, लेकिन यह दावा ज़रूर है कि मैं शायर को समझती हूं.'

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First published: February 13, 2020, 2:40 PM IST
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