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जब इजरायल ने लिया था आतंकवादी हमले का बदला, इस तरह चुन-चुनकर मारे थे आतंकी

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Updated: February 20, 2019, 3:11 PM IST

म्यूनिख आतंकवादी हमले में इजरायल के 11 खिलाड़ी मार दिए गए थे. इसके बाद इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने आतंकवादियों की लिस्ट बनाई और सबको चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा गया था.

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ऑपरेशन 'रैथ ऑफ गॉड'. ये इजरायल के उस ऑपरेशन का नाम था, जिसमें दुनिया के खूंखार आतंकवादियों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा गया था. वो 1972 का वक्त था जब जर्मनी के म्यूनिख शहर में ओलंपिक खेलों का आयोजन हो रहा था. दुनियाभर के तमाम देशों के खिलाड़ी इसमें हिस्सा लेने आए थे. खेल शुरू हुए एक हफ्ते से ज्यादा वक्त बीत चुका था. कोई नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में ओलंपिक गेम्स विलेज में कुछ ऐसा होने वाला है, जो खेलों के इतिहास का सबसे काला अध्याय बन जाएगा.

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क्या हुआ था?
तारीख थी 5 सितंबर 1972. खिलाड़ियों की तरह ट्रैक सूट पहने 8 अजनबी लोहे की दीवार फांदकर ओलंपिक विलेज में घुसने की कोशिश कर रहे थे. तभी वहां कनाडा के कुछ खिलाड़ी पहुंच गए. दीवार फांदने वाले अजनबी सहम गए, लेकिन गलती से कनाडा के खिलाड़ियों ने उन्हें किसी दूसरे देश का खिलाड़ी समझा और फिर दीवार फांदने में उनकी मदद की. लोहे की दीवार पार करने के बाद कनाडा के खिलाड़ी अपने रास्ते पर आगे बढ़ गए. दूसरी तरफ ट्रैक सूट पहने अजनबी उस इमारत के बाहर पहुंच गए जहां इजरायली खिलाड़ियों को ठहराया गया था. इस इमारत में दाखिल होते ही इन अजनबियों का असली चेहरा सामने आ गया. ये कोई खिलाड़ी नहीं बल्कि हथियारों से लैस आतंकी थे. ये पीएलओ यानी फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन से जुड़े थे.

आठों आतंकी हाथों में हथियार लेकर अपने मिशन को अंजाम देने निकल पड़े. जैसे ही आतंकवादियों ने अपार्टमेंट में दाखिल होने की कोशिश की, उसमें रह रहे पहलवान योसेफ गटफ्रंड ने शोर मचा दिया, लेकिन तब तक आतंकी अंदर घुस चुके थे. पूरे हॉस्टल में हड़ंकप मच गया, कुछ खिलाड़ी भागने की कोशिश करने लगे. रेसलिंग कोच मोसे वेनबर्ग दौड़कर किचन में घुसे और मुकाबला करने के लिए चाकू उठा लिया. लेकिन अगले ही पल एक गोली मोसे के गालों को छेदती हुई निकल गई. इसके बाद आतंकियों ने हॉस्टल के एक-एक कमरे की तलाशी ली और सभी खिलाड़ियों को बंधक बना लिया. गोलीबारी के बीच कुछ खुशकिस्मत खिलाड़ी भागने में कामयाब रहे. लेकिन कुछ ऐसे बदकिस्मत भी थे, जिन्होंने पूरी हिम्मत जुटाकर आतंकियों का मुकाबला किया. वो अपने साथियों को बचाने के लिए दुश्मनों से भिड़ गए, लेकिन आतंकियों ने उन्हें गोली मारने में देर नहीं लगाई.

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दुनिया रह गई हैरानअगले दिन ये खबर सनसनी बनकर पूरी दुनिया में फैल गई कि फलस्तीनी आतंकवादियों ने जर्मनी के म्यूनिख शहर में 11 इजरायली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया है. तब तक किसी को भी ये पता नहीं था कि दो खिलाड़ी पहले ही मारे जा चुके हैं. आतंकियों ने मांग रखी कि इजरायल की जेलों में बंद 234 फलस्तीनियों को रिहा किया जाए, लेकिन इजरायल ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि आतंकियों की कोई मांग नहीं मानी जाएगी. इसके बाद आतंकियों ने दो खिलाड़ियों के शवों को हॉस्टल के दरवाजे से बाहर फेंक दिया, वो ये संदेश देना चाहते थे कि यही हाल बाकी खिलाड़ियों का भी होगा लेकिन इजरायल का इरादा नहीं बदला. इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर के सख्त तेवर देखकर दुनिया दंग थी. लोगों को लग रहा था कि इजरायल ने अपने खिलाड़ियों को आतंकियों के भरोसे छोड़ दिया है. लेकिन हकीकत ये थी कि इजरायल जर्मनी को इस बात के लिए राजी करने में जुटा था कि वो म्यूनिख में अपने स्पेशल फोर्सेस भेज सके, लेकिन जर्मनी इसके लिए तैयार नहीं हुआ.

सांसें रोक देने वाला था आतंकी हमला
ओलंपिक खेलों के दौरान खिलाड़ियों को बंधक बनाना और मोलभाव करना. पूरी दुनिया टकटकी लगाकर इजरायल की ओर देख रही थी. लोग सांसें थामे इंतजार कर रहे थे कि आखिर इजरायली खिलाड़ियों का क्या होगा. इसी बीच आतंकियों ने एक नई मांग रखी और जर्मन सरकार ने वो मांग मान भी ली. आतंकियों ने मांग रखी कि उन्हें यहां से निकलने दिया जाए, वो बंधक इजरायली खिलाड़ियों को अपने साथ ले जाना चाहते थे. जर्मन सरकार की रणनीति थी कि इसी बहाने आतंकी और खिलाड़ी बाहर निकलेंगे और एयरपोर्ट पर आतंकियों को निशाना बनाना आसान होगा. प्लान के मुताबिक आतंकियों को बस मुहैया कराई गई, जो उन्हें एयरपोर्ट तक ले गई. एयरपोर्ट पर अंधेरे में जगह-जगह शार्प शूटर तैनात कर दिए गए थे.

पूरी दुनिया अपने टीवी स्क्रीन पर इस मंजर को लाइव देख रही थी. खिलाड़ियों को बस से उतारकर हेलीकॉप्टर में बिठाया गया. इसके कुछ ही सेकेंड बाद शार्प शूटरों ने आतंकियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. खुद को चारों तरफ से घिरता देख आतंकियों ने निहत्थे खिलाड़ियों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. एक हेलीकॉप्टर को बम से उड़ा दिया गया. फिर दूसरे हेलीकॉप्टर में बैठे खिलाड़ियों को भी गोलियों से भून दिया गया. कुछ ही मिनटों में एयरबेस पर मौजूद हर आतंकी मारा गया. साथ ही इजरायल के 9 खिलाड़ी भी आतंकियों की गोलियों के शिकार बन गए. शुरू में टीवी के जरिए ये खबर फैलाई गई कि सिर्फ आतंकी मारे गए हैं, सभी 9 खिलाड़ी सुरक्षित हैं लेकिन अगली सुबह ये साफ हो गया कि इजरायल का कोई भी खिलाड़ी जिंदा नहीं बचा है.

इसके बाद शुरू हुआ बदले का मिशन
बात देश की शान की थी, लिहाजा बदले के लिए प्लान तैयार किया गया. इजरायल ने अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से उन सभी लोगों के कत्ल की योजना बनाई, जिनका वास्ता ऑपरेशन ब्लैक सेंप्टेंबर से था. इस मिशन को नाम दिया गया 'रैथ ऑफ गॉड' यानी ईश्वर का कहर. म्यूनिख नरसंहार के दो दिन के बाद इजरायली सेना ने सीरिया और लेबनान में मौजूद फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के 10 ठिकानों पर बमबारी की और करीब 200 आतंकियों और आम नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर इतने भर से रुकने वाली नहीं थीं. उन्होंने इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के साथ गुप्त मीटिंग की और उनसे एक ऐसा मिशन चलाने को कहा जिसके तहत दुनिया के अलग-अलग देशों में फैले उन सभी लोगों को जान से मार दिया जाए, जिनका वास्ता ब्लैक सेप्टेंबर से था.

मोसाद ने तैयार की लिस्ट
सबसे पहले मोसाद ने ऐसे लोगों की लिस्ट बनाई, जिनका संबंध म्यूनिख हमले से था. इसके बाद ऐसे एजेंट्स तलाशे गए जो गुमनाम रह कर ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड को अंजाम दे सकें. मिशन शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर मोसाद एजेंट्स ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी का कत्ल कर सनसनी मचा दी. अब बारी थी अगले निशाने की. यहां भी मोसाद की टीम ने ब्लैक सेप्टेंबर से संबंध रखने के शक में एक शख्स की दिन-रात निगरानी शुरू की. हुसैन अल बशीर नाम का ये शख्स होटल में रहता था, और होटल में वो सिर्फ रात को आता था और दिन शुरू होते ही निकल जाता था. मोसाद की टीम ने उसे खत्म करने के लिए उसके बिस्तर में बम लगाने का प्लान बनाया.

बम लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था, ये काम तो आसानी से हो गया. मुश्किल ये था कि कैसे ये पता किया जाए कि हुसैन अल बशीर बिस्तर पर है तभी धमाका किया जा सकता है. इसके लिए एक मोसाद एजेंट ने बशीर के ठीक बगल वाला कमरा किराए पर ले लिया. वहां की बालकनी से बशीर के कमरे में देखा जा सकता था. रात को जैसे ही बशीर बिस्तर पर सोने के लिए गया. एक धमाके के साथ उसका पूरा कमरा उड़ गया. इजरायल का मानना था कि वो साइप्रस में ब्लैक सेप्टेंबर का प्रमुख था, हालांकि उसकी हत्या के पीछे रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से उसकी नजदीकियां अहम मानी गईं.

हथियार मुहैया कराने वाले को मारी गई गोली
फलस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने के शक में बेरूत के प्रोफेसर बासिल अल कुबैसी को गोली मार दी गई. मोसाद के दो एजेंट्स ने उसे 12 गोलियां मारीं. मोसाद की लिस्ट में शामिल तीन टार्गेट लेबनान में भारी सुरक्षा के बीच रह रहे थे और अभी तक की हत्याओं के तरीकों से उन तक पहुंचना नामुमकिन था. इसलिए उनके लिए विशेष ऑपरेशन शुरू किया गया, जिसका नाम था ऑपरेशन स्प्रिंग ऑफ यूथ. ये ऑपरेशन रैथ ऑफ गॉड का ही एक हिस्सा था.

ऑपरेशन 'स्प्रिंग ऑफ यूथ'
9 अप्रैल 1973 को इजरायल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीडबोट के जरिए पहुंचे. इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टार्गेट के करीब पहुंचाया. कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे, और कुछ ने महिलाओं के कपड़े पहन रखे थे. पूरी तैयारी के साथ इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया. इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारा गया. वहीं इजरायल का एक कमांडो घायल हो गया. इस ऑपरेशन के फौरन बाद तीन हमले और किए गए. इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया. वहीं ब्लैक सेप्टेंबर के दो किशोर सदस्य अब्देल हमीन शिबी और अब्देल हादी नाका रोम में कार धमाके में घायल हो गए.

चलता रहा ऑपरेशन
मोसाद के एजेंट्स दुनिया में घूम-घूम म्यूनिख क़त्ल-ए-आम के गुनहगारों को मौत बांट रहे थे लेकिन क्या इजरायल के बदले की कहानी थम गई. इंतकाम की आग में धधक रहे इजरायल की सीक्रेट सर्विस एजेंसी मोसाद का खूनी खेल अभी थमा नहीं था क्योंकि उसकी हिट लिस्ट में और लोगों के नाम शुमार थे और जब तक इस हिटलिस्ट से सभी नाम मिटा नहीं दिए जाते तब तक उसके एजेंट्स का मिशन खत्म नहीं हो सकता था लिहाज़ा मोसाद के एजेंट्स एक बार फिर अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में जुट गए. अब बारी थी उन लोगों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की जो सीधे तौर पर म्यूनिख कत्ल-ए-आम से जुड़े थे और एक बार फिर शुरू हुआ मोसाद का खूनी इंतकाम और अपने इस मिशन के तहत...

- 28 जून 1973 को ब्लैक सेप्टेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उड़ा दिया.

- 15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई.

- 17 जून 1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया.

- 23 जुलाई 1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप निदेशक फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया.

- 21 अगस्त 1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मेराइश एथेंस में मार दिया गया.

- 10 जून 1986 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया.

- 21 अक्टूबर 1986 को पीएलओ के सदस्य मुंजर अबु गजाला को कार बम से उड़ा दिया गया.

-14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया.

इन आंकड़ों को देखने के बाद ये तो साफ हो जाता है कि मोसाद के एजेंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर करीब 20 साल तक हत्याओं को अंजाम देते रहे. अंत में तीन असफल कोशिशों के बाद मोसाद ने साल 1979 में म्यूनिख कत्ल-ए-आम के मास्टरमाइंड अली हसन सालामेह को भी बम धमाके में मार गिराया. म्यूनिख कत्ल-ए-आम का गुनहगार मारा जा चुका था लेकिन म्यूनिख हमले के 7 साल बाद तक चले मोसाद के ऑपरेशन में उसके एजेंट्स ने 11 में से 9 फलस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था. हालांकि कहा जाता है कि करीब 20 साल तक चले इस सीक्रेट ऑपरेशन में मोसाद ने कुल 35 फलस्तीनियों को मारा था.

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First published: February 20, 2019, 10:14 AM IST
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