वो अमेरिकी राजदूत जो 1962 युद्ध में बना भारत का मददगार, IIT के लिए किया ये खास काम

वो अमेरिकी राजदूत जो 1962 युद्ध में बना भारत का मददगार, IIT के लिए किया ये खास काम
1962 भारत-चीन युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू अमेरिकी राजदूत गेलब्रेथ के साथ

1961 जॉन कैनेथ गेलब्रेथ को पहली बार अमेरिका ने भारत में राजदूत बनाकर भेजा. वो अच्छे इकोनॉमिस्ट भी थे. बहुत जल्दी नेहरू के भरोसेमंद बन गए. जब भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ा तो अमेरिका से मदद दिलाने में उन्होंने खास रोल अदा किया. ये अमेरिका का ही दबाव था कि चीनी सेनाओं ने युद्ध रोकने और पीछे लौट जाने का फैसला किया था

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1962 में जब भारत और चीन के दौरान युद्ध हो रहा था, उन दिनों भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन कैनेथ गेलब्रेथ कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए. वो तकरीबन रोज प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिलने लगे. बताने लगे कि अमेरिकी से क्या मदद मिलने वाली है और क्या हो सकता है. गेलब्रेथ की सक्रियता के चलते अमेरिका सीधे भारत के साथ आकर खड़ा हुआ. इससे चीन पर तब एक अतिरिक्त दबाव भी पड़ा.

गेलब्रेथ जाने-माने इकोनॉमिस्ट भी थे. उन्होंने इकोनॉमिक्स पर कई कई किताबें लिखीं. जो 50 के दशक से लेकर अब तक बेस्ट सेलर रही हैं. जिन दिनों 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ,तब अमेरिका में जान एफ कैनेडी राष्ट्रपति थे. जो गेलब्रेथ के करीबी मित्र भी थे.

जब उन्हें राजदूत बनाया गया तो पहली पोस्टिंग भारत की मिली. ये 1961 का साल था. वो यहां 1963 तक राजदूत रहे. कहा जाता है कि उनका कैनेडी पर इस कदर असर था कि वो अक्सर अमेरिकी विदेश विभाग को दरकिनार कर सीधे डिप्लोमेटिक केबल्स प्रेसिडेंट को भेज देते थे.



भारत में जब उन्हें पोस्टिंग मिली तो प्रधानमंत्री नेहरू के भरोसेमंद हो गये. माना जाता है कि आर्थिक मसलों पर भारतीय प्रधानमंत्री अक्सर उनसे सलाह लेते थे. गेलब्रेथ भारत छोड़ने के बाद भी वो भारत के मित्र और समर्थक बने रहे.
भारत में उन्होंने एक ऐसा काम किया, जो आज के दिनों में हमारे जीवन का अंग बन गया है. उन्होंने तब आईआईटी कानपुर में पहला कंप्युटर साइंसस डिपार्टमेंट स्थापित करने में मदद की. इससे पहले भारत में किसी शिक्षा संस्थान में कंप्युटर की पढ़ाई नहीं होती थी.

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1962 में जब भारत-चीन के बीच युद्ध शुरू हुआ तो भारत के सियासी हालात, सेना की हालत, राजनय के दावपेंच को उन्होंने जिस तरह महसूस किया, उसको डायरी में उतारा. इस डायरी के प्रकाशन को लंबा समय हो चुका है. उसके कुछ अंश -

26 अक्टूबर 1962, नई दिल्ली
मैं शाम को राष्ट्रपति राधाकृष्णन के साथ टहल रहा था.राष्ट्रपति के दिमाग में पूरी तरह चीन था. हर ओर भारत के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन की आलोचना हो रही थी. वह सेना में राजनीति खेल रहे थे. सेना को आपूर्ति, सैन्य अधिकारियों के असंतोष और टूटे मनोबल को दूर करने में नाकाम दिख रहे थे. कैबिनेट ने सभी सदस्यों ने फैसला किया कि वह प्रधानमंत्री नेहरू से मेनन को हटाने के लिए कहेंगे. ये आमधारणा थी कि उनकी रवानगी जल्दी हो जाएगी.
राष्ट्रपति ने मुझसे कहा कि अमेरिका पाकिस्तान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे ताकि उसकी ओर से कोई दिक्कत पैदा नहीं हो पाए. हम राष्ट्रपति भवन के ऊपरी कमरे में बात कर रहे थे. मैने उन्हें कभी इतना नाराज नहीं देखा था.

जब 1962 के दौरान भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तब अमेरिकी राजदूत गेलब्रेथ नियमित अपनी डायरी लिख रहे थे, जिसमें रोज के हालात के बारे में भी लिख रहे थे. इसे उन्होंने बाद में प्रकाशित भी कराया


28 अक्टूबर 1962, नई दिल्ली
लंच करने के बाद मैं आधे घंटे के लिए सो गया. तभी मुझको पाकिस्तान की स्थिति पर दो टेलीग्राम मिले. मैकाथी (पाकिस्तान में अमेरिकी राजदूत) पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अयूब खान से मिले थे. उन्हें शांति बनाए रखने के लिए कहा गया ताकि पाकिस्तान से लगी भारतीय सीमा पर कोई तनाव पैदा नहीं हो.
मुझसे नेहरू से मिलने के लिए कहा गया. काफी कोशिश के बाद मैं शाम पौने सात बजे उनसे मिल पाया. नेहरू मुझे कमजोर लगे, ऐसा महसूस हुआ कि वो अचानक और बूढे हो गए हों.

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29 अक्टूबर 1962, नई दिल्ली
जब मैं नौ बजे आफिस पहुंचा, तब मेनन का फोन आया हुआ था. उन्होंने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहते हैं. क्या वह खुद मिलने आ सकते हैं. प्रोटोकोल कभी नहीं कहता कि कोई मंत्री किसी राजदूत को फोन करे या मिलने आए लेकिन मेनन इन औपचारिकताओं की परवाह नहीं करते थे. वो मुझसे मिलने आ गए. मैने उनसे कहा कि मेरे पास प्रधानमंत्री के लिए एक पत्र है,जो उन्हें सबसे पहले मिलना चाहिए. उन्होंने तुरंत मेरी मुलाकात प्रधानमंत्री से करा दी. मुझे मालूम था कि मुझसे मिलते ही प्रधानमंत्री अमेरिका से आ रही मदद के बारे में पूछेंगे. तब मैने उनसे कहा कि इसके लिए आपको पहले अनुरोध करना चाहिए. ये तय हुआ कि हम रात में फिर मिलेंगे.
मैने उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति का पत्र दिया, उससे साफ लगा कि वह राहत महसूस कर रहे हैं.प्रधानमंत्री ने कहा उन्हें मदद की सख्त जरूरत है. ये अमेरिका से आनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वो सोवियतों से जितना दूर रह सकते हैं, उतना रहना चाहेंगे.

1963 में अमेरिका की फर्स्ट लेडी जैकलीन कैनेडी खासतौर पर भारत के दौरे पर आईं. उस दौरान वो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और अमेरिकी राजदूत गेलब्रेथ के साथ


05 नवंबर 1962, नई दिल्ली
मुझे पता लगा कि पिछले शुक्रवार को प्रधानमंत्री के साथ मेरी मुलाकात उम्मीद से कहीं ज्यादा सफल रही. उन्होंने ये भी उम्मीद जताई कि उन्हें अमेरिका से हर तरह के लडाकू जेट हासिल होंगे.

13 नवंबर 1962, नई दिल्ली
हम गंभीर समस्या का सामना कर रहे थे कि हम भारतीयों को उनकी रक्षा के लिए कौन से हथियार दें. अभी तक हमने जो दिया था वो कुछ लाख डॉलर की कीमत के उनकी पैदल सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सामान थे. अब उनका अनुरोध बड़े पैमाने पर हथियारों के निर्माण के लिए कच्चे माल, टैंकों, अन्य हथियारबंद उपकरण और एक वायुसेना तैयार करने को लेकर था. इन सबकी कीमत करोड़ों-अरबों डॉलर की थी.

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भारत-चीन युद्ध के बारे पर्याप्त विवरण देने और अपना दृष्टिकोण बताने के लिए भारत में अमेरिकी राजदूत गेलब्रेथ ने प्रेसिडेंट जान एफ कैनेडी को दो लंबे पत्र भी लिखे


13 नवंबर 1962, नई दिल्ली
इसी दिन गेलब्रेथ ने अमेरिका में प्रेसिडेंट कैनेडी को एक पत्र लिखा.

प्रिय राष्ट्रपति महोदय
मैं दस दिनों से इंतजार कर रहा था कि आपको यहां की घटनाओं और हमारी कोशिश के बारे में विस्तार से जानकारी दूं. मैने विदेश विभाग को इस बारे में पूरे विवरणयुक्त डिस्पैच भेजे हैं. बेशक आपने इसे देखा होगा.
यहां पिछले तीन हफ्ते जबरदस्त बदलाव वाले रहे हैं. भारतीयों का चीनियों से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है. यहां नेहरू को छोडक़र कोई ऐसा नेता नहीं है, जो बहुत लोकप्रिय हो. उनकी पूरी जिंदगी अमेरिका और ब्रिटेन पर निर्भरता से खुद को परे रखने में बीती है-इसीलिए वो हमसे मदद मांगने से भी हिचकते रहे हैं. वो इसे पसंद नहीं करेंगे कि इसे प्रचारित किया, जिससे उनके स्वाभिमान को ठेस लगे.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि चीन के इरादे क्या हैं. शुरू मेंं मैने भी सोचा था कि ये महज सीमा विवाद है. चीनी खासी गंभीरता के साथ लद्दाख के अक्साई चीन इलाके पर अपना दावा कर रहे हैं.वो ये मानकर चल रहे हैं कि भारतीयों से दुश्मनी निभाने पर उनका बाल बांका भी नहीं होने वाला. इसलिए अपनी बढ़ी ताकत और साजोसामान का प्रदर्शन वो भारतीयों और खासकर एशियाई मुल्कों के सामने इस तरह से करना चाह रहे हैं.
मेरा मानना है कि हमारे प्रयास यहां बेहतर शक्ल में हैं। हमने खुद को एक बेहतर दोस्त के रूप में पेश किया है.
आपका भरोसेमंद
जॉन कैनेथ गालब्रेथ

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राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को दूसरा पत्र
नई दिल्ली
06 दिसंबर 1962
प्रिय राष्ट्रपति महोदय,
मुझे लगा कि मैं आपको केबल के जरिए प्राप्त जानकारी के अलावा यहां की प्रगति पर ज्यादा वास्तविक दृष्टिकोण दूं. मुझको लगता है कि आपको इस समय भारत के बारे पर्याप्त जानकारियों की जरूरत भी होगी.
मैं दो दिन के दौरे पर फ्रंट पर भी गया था. मैं वहां फारवर्ड पोजिशन तक गया कि खुद अपनी आंखों से स्थिति का जाएजा लूं. भारतीय सेना ने अब संतुलन बना लिया है. उसका मनोबल बढ़ रहा है. सैनिक दृढ लग रहे हैं. उनकी ट्रेनिंग अच्छी है. वो अनुशासित हैं. ये अच्छी बात है कि चीनियों को रोक दिया गया है. इस बात का कोई सवाल ही नहीं है कि वो गंगा के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकें. भारत के कुछ कमांडर बहुत अच्छे हैं लेकिन ज्यादातर फ्राड हैं, जो सेना में शांतिकाल के दौर में जोड़-तोड़ करके ऊपर तक पहुंच गए.
युद्ध से भारत की जनता के बीच अमेरिकी प्रतिष्ठा में खासी बढोतरी हुई है. प्रेस, सेना, नेता और समूचा देश रातों-रात हमें शुभचिंतक और दोस्त के रूप में देखने लगा है.
आपका भरोसेमंद
जान कैनेथ गालब्रेथ
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