डिस्लेक्सिया पीड़ित वो लड़का, जो बार-बार चीन को टक्कर देकर झुकाता है

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Updated: September 9, 2019, 11:03 PM IST
डिस्लेक्सिया पीड़ित वो लड़का, जो बार-बार चीन को टक्कर देकर झुकाता है
जोशुआ वांग

हांगकांग में प्रदर्शन की अगुवाई 22 साल का जो युवा स्टूडेंट करता है, वो तब14 साल का था, जब उसने पहली बार योजना बनाकर एक सफल आंदोलन किया था. वो कई बार जेल जा चुका है ये युवा वाकई चीन की आंखों की किरकिरी बन चुका है.

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22 साल का जोशुआ वांग दुनियाभर में सोशल मीडिया का हीरो है. पतला-दुबला युवा. आंखों पर चश्मा. माथे पर बेपरवाही से आए हुए बाल. एक साधारण सा लगने वाला लड़का. उसे शायद ही कोई नोटिस भी करे. वो हांगकांग में लाखों प्रदर्शनकारियों का लीडर है. चीन की ताकतवर सरकार की आंखों की किरकिरी. लेकिन इस लड़के ने कई बार चीन को झुकाया है. एक जमाना था जब वो 14 साल का था तब वो चीन के खिलाफ असरदार लीडर बनकर उभरा था.

वो जब कुछ बोलता है तो लोग सुनते हैं. उसके एक इशारे पर लाखों हांगकांगवासी किस तरह सड़कों पर आ जाते हैं, ये हम सबने पिछले दिनों देखा है. वो निडर होकर पिछले आठ साल में कई आंदोलनों की अगुवाई कर चुका है. कई बार जेल जा चुका है. उसे डर नहीं लगता. वो चीन की सरकार के खिलाफ ऐसा युवा नेता बनकर उभरा है, जो वाकई चीन को ललकारता है और झुकाता भी है. हाल में भी प्रत्यर्पण के मामले में चीन को फिर प्रदर्शनकारियों के सामने झुकना पड़ा है.

जोसुआ वांग की कहानी 2014 में तब शुरू होती है, जब वो हांगकांग के स्कूल में पढ़ रहा था. उम्र थी 14 साल. तब हांगकांग में चीन की नीतियों को लेकर जो विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, उसमें बड़ी भूमिका युवाओं की थी. स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों की.

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छात्रों का मजबूत संगठन खड़ा किया
बाद में हालात ऐसे हुए कि जोशुआ ने नेता बनकर उभरता चला गया. उसने अपने बूते जो पहला प्रदर्शन प्लान किया, वो इतना जबरदस्त रहा कि वो खुद हैरत में पड़ गया. इसी दौरान उसने छात्रों का एक संगठन स्कॉलरिज्म खड़ा किया. जो खासा ताकतवर हो गया. फिर उसने प्रो-डेमोक्रेसी पार्टी डेमिस्टोस खड़ी की, मौजूदा समय में वो इसका महासचिव है. हालांकि जोसुआ के सियासत की शुरुआत क्लास बॉयकाट के साथ हुई थी.


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लोग तब हैरान रह जाते थे जब 14 साल के जोसुआ को माइक पर बोलते देखते थे. वो कहता था, "ये लड़ाई हमारी है, इसे अगली पीढ़ी के लिए नहीं छोड़ सकते. ये लड़ाई हमारे जेनरेशन की है." हांगकांग में पांच साल पहले हुए व्यापक प्रदर्शनों के साथ अंब्रेला मूवमेंट की शुरुआत को भी वांग से जोड़ा जाता है.

जोशुआ वांग सामान्य युवकों जैसा है लेकिन जब वो बोलता है तो लोगों पर असर डालता है और योजनाकार तो गजब का है


चीन के तियानमन संहार के बाद पहली बार हांगकांग में पिछले कुछ सालों में लगातार बड़े प्रदर्शन हुए. चीन चाहकर भी उससे निपट नहीं पाया. हांगकांग में हालिया प्रदर्शनों में लगातार दस लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर आ जाते थे, वो भी तब जबकि चीन की सरकार ने इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी थी.

नोबल पुरस्कार के लिए नोमिनेट हुआ
दुनियाभर की नामी पत्रिकाएं और चैनल जोशुआ पर बड़ी बड़ी रिपोर्ट लिख चुके हैं. टाइम ने उसे "सबसे असरदार युवा" बताया तो फार्चुन मैगजीन ने "वर्ल्ड ग्रेटेस्ट लीडर". 2017 में उसका नाम नोबल पुरस्कार के लिए नामिनेट हुआ. जोशुआ स्मार्टफोन का एडिक्ट है. चीन जब-जब इंटनेट बंद करता है जोशुआ और उनके साथी एप के जरिए एक-दूसरे से संपर्क में रहते हैं. ये ऐसा एप जिसे चलाने के लिए इंटरनेट की जरूरत नहीं होती.

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डिस्लेक्सिया से था पीड़ित
जोशुआ बचपन में डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित था. स्कूल में बोर्ड पर लिखा उसे तरीके से नजर नहीं आता था. पढाई तरीके से दिमाग में नहीं घुस पातीं. धीरे धीरे उसने इस बीमारी पर काबू पाया. आप यकीन करेंगे वर्ष 2014 में 17 साल की उम्र में ही जोशुआ ने हांगकांग में चुनाव सुधारों पर पूरा डॉफ्ट तैयार कर डाला था. अब जोशुआ चीन की आंखों में खटकने वाला युवा नेता है. चीन मानता है कि जोशुआ हांगकांग में डेमोक्रेसी की योजना बनाने में जुटा है. आने वाले समय में वो फिर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करेगा.

चीन ने खूब डराया-धमकाया
चीन ने अपने तरीके से जोसुआ को डराया, धमकाया, दबाव डाला. यातनाएं दी. ये युवा गजब का हिम्मती निकला. टस से मस नहीं हुआ. दुनियाभर में कम उदाहरण हैं जब इस उम्र में किसी युवा ने लीडरशिप की ऐसी संभावनाएं दिखाई हों. जब ब्रिटेन ने हांगकांग को चीन को सौंपा तो जोशुआ महज एक साल का था.

जोशुआ मामूली निम्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से है. पिता आईटी के रिटायर्ड प्रोफेशन रहे हैं. सही काम के लिए लड़ने और डटने की प्रवृत्ति पिता से मिली, जो सर्वहारा और गरीब लोगों के लिए काम करते थे.

बचपन में जोशुआ डिलैक्सिया से पीड़ित था लेकिन बाद में उसने इस बीमारी पर जीत हासिल कर ली


उस प्रदर्शन ने जोशुआ को मंच दिया
जोशुआ वांग को कोई शायद ही जानता अगर वो उस प्रदर्शन में शामिल नहीं होता, जब सैकड़ों लोग हांगकांग में डेमोक्रेसी की मांग के लिए छोटा-मोटा प्रदर्शन कर रहे थे. सरकार के प्रतिनिधियों ने उनसे मिलने से मना कर दिया.

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तब कुछ युवाओं ने हांगकांग के प्रशासनिक आफिस की दीवार पर चढ़कर परिसर में कूदने का प्रयास किया. जोशुआ भी उनमें एक था. वो गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस छोड़ी, काली मिर्च पाउडर का इस्तेमाल किया. बल इस्तेमाल हुआ. दो दिन बाद उसी जगह हजारों लोग प्रदर्शन करने के लिए आ जुटे. फिर ये संख्या बढ़ती गई. यहीं से अंब्रेला मूवमेंट की शुरुआत हुई. लोग जोसुआ को पहचानने लगे. अक्सर उसे रास्ते में रोककर उसके साथ सेल्फी ली जाने लगी.

सरकार को जनता से डरना चाहिए
जोशुआ मीडिया अटैंशन से बचकर रहता है. अपने भाषणों में एक खास बात बोलता है, "जनता को अपनी सरकार से डरना नहीं चाहिए बल्कि सरकार को अपनी जनता से डरना चाहिए."
कुछ साल पहले एक ओपन लैटर में खुद जोशुआ अपने बारे में लिखा था - " कुछ दिन पहले ही मैंने 18 वां जन्मदिन मनाया है. इन दिनों मैं हांगकांग ओपन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रहा हूं. साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा हूं, पिता बचपन से ही मुझसे गरीब और बेसहारा लोगों की दिक्कतों के बारे में चर्चा करते थे. वे चाहते थे मैं दूसरों की मदद करुं, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझूं. मेरा जन्म 1996 में हुआ 1997 में हांगकांग को चीन को वापस दिया गया लेकिन हांगकांग स्वायत्तशासी क्षेत्र है. जब मैं 15 साल का था, तब मेरे मन में सरकार की नीतियों को लेकर गहरी नाराजगी पैदा हुई. यह चीन समर्थित शिक्षा कार्यक्रम था, जिसे सरकार हमारे ऊपर थोप रही थी. मैंने और दोस्तों ने स्कॉलरिज्म नामक संगठन बनाया और जुट गए इसके विरोध में. आप कह सकते हैं स्कूली बच्चों का राजनीति से क्या लेना देना? मेरा जवाब साफ है, यकीनन हम छात्र उम्र में काफी छोटे हैं, फिलहाल किसी पेशे से नहीं जुड़े हैं पर सरकार की नीतियों का असर हमपर होता है. लिहाजा हमें सरकार के फैसलों की मुखालफत का पूरा हक है. यह हक हमसे कोई नहीं छीन सकता."

22 साल के इस युवा का कहना है कि जनता को सरकार से नहीं बल्कि सरकार को जनता से डरना चाहिए


सब हैरान थे कि ऐसा कैसे हो गया 
आगे लिखा, "आंदोलन 2012 में शुरू हुआ. रैली में हजारों छात्र-छात्राएं शामिल हुए. आंदोलनकारी छात्रों ने देश के तमान हिस्सों में तमाम सरकारी मुख्यालयों पर कब्जा कर लिया. युवा सड़कों पर उतर आए. हांगकांग ने पहली बार इस तरह का आंदोलन देखा था. हमारे देश की राजनीति में यह नई उम्मीद का आगाज था. सब हतप्रभ थे कि यह कैसे हो गया? किसी को यकीन नहीं हो रहा था, हांगकांग के युवा इतने जागरुक हो सकते हैं.  आखिरकार सरकार को वह शिक्षा कार्यक्रम वापस लेना पड़ा. "

2012 में जब हांगकांग में छात्रों ने सभी सरकारी बिल्डिंग्स पर कब्जा कर लिया और वो सड़कों पर उतर आए तो ये वहां के लिए एक नई उम्मीद की शुरुआत थी


गौरतलब है कि ब्रिटेन ने 99 साल की लीज खत्म होने के बाद इस शहर को चीन को सौंप दिया था. लेकिन इस शर्त के साथ कि ये शहर 2047 तक स्वायत्तशासी बना रहेगा. लेकिन चीन लगातार यहां की शासन प्रणाली और नीतियों को बदलने की कोशिश करता रहा हैं.

वाकई युवा नेता ऐसे ही होने चाहिए...दिखने में मासूम...दिमाग से तेज....वो जिनमें जोश के साथ होश भी हो...जो बंदूक और खूनखराबे की जगह शांति से विरोध करना जानते हो. जो टीम बनाएं और उसका सही तरीके से नेतृत्व भी कर सकें.

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First published: September 9, 2019, 9:07 PM IST
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