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जब देवीलाल ने जड़ा था राज्यपाल को थप्पड़, गवर्नरों की अजब-गजब कहानी

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 28, 2019, 12:36 PM IST
जब देवीलाल ने जड़ा था राज्यपाल को थप्पड़, गवर्नरों की अजब-गजब कहानी
देवीलाल की पहले हरियाणा के राज्यपाल तपासे से बहस हुई और फिर उनका हाथ चल गया

जब भी राज्यपालों के पक्षपात की चर्चा चलती है तो सियासतदां ताऊ देवीलाल के उस थप्पड़ को जरूर याद करते हैं, जो उन्होंने साल 1982 में राज्यपाल के पक्षपात पर कहासुनी के बाद उन्हें जड़ा था.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 12:36 PM IST
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महाराष्ट्र (Maharashtra) के सियासी परिदृश्य में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat singh koshyari) की भूमिका ने फिर राज्यों में राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठा दिए हैं. देश के लोकतांत्रिक इतिहास में कई ऐसे राज्यपाल हुए, जिनके पक्षपात की कहानियां अब भी आम हैं. लेकिन तब पूरा देश हतप्रभ रह गया था जब राज्यपाल के पक्षपात से हरियाणा (Haryana) के दिग्गज नेता देवीलाल (Devilal) इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने उन्हें थप्पड़ ही जड़ दिया

इस किस्से को लोग अक्सर सुनाते हैं कि मामला क्या हुआ था. हरियाणा में 1982 का चुनाव हुआ था. 90 सीटों वाली विधानसभा में 36 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी लेकिन भारतीय राष्ट्रीय लोक दल का बीजेपी से चुनाव से पहले से गठबंधन था. इस गठबंधन को 37 सीटें मिली थीं.

किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. अब ये राज्यपाल पर था कि वो किस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं. उस दौरान हरियाणा में गणपतराव देवजी तपासे राज्यपाल थे. राज्यपाल ने पहले देवीलाल को 22 मई 1982 को सरकार बनाने के लिए बुलाया. इसी बीच भजनलाल कांग्रेस और निर्दलियों को एककर उसके नेता घोषित किये गए. उनके पास बहुमत के लिए जरूरी 52 विधायकों का समर्थन था.

तपासे ने तुरंत भजनलाल को बुलाया और मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. देवीलाल बहुत नाराज हुए. वो अपने और बीजेपी के विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे. उनमें और राज्यपाल के बीच विवाद होने लगा. ये विवाद इतना बढ़ा कि ताऊ देवीलाल राज्यपाल की ठुड्डी पकड़कर बात करने लगे. तभी लोगों ने गुस्से में ताऊ को तपासे को एक थप्पड़ लगाते देखा. हर कोई सन्न रह गया.



अगर सुरक्षा गार्ड नहीं बचाते तो हालत और खराब होती 
राज्यपाल के गार्ड तुरंत उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल ले गए. अन्यथा हालात और खराब हो सकते थे. इस थप्पड़ की गूंज बहुत दिनों तक भारतीय राजनीति में रही. तपासे पुराने नेता थे. महाराष्ट्र में लंबे समय तक राजनीति कर चुके थे लेकिन उनको अंदाज नहीं था कि ताऊ से कहा-सुनी यहां तक पहुंच जाएगी. हालांकि इस पर आगे कोई कार्रवाई किसी ने नहीं की.
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क्या थी असल में नाराजगी की वजह 
ऐसा भी माना जाता है कि भजनलाल ने देवीलाल के कई विधायकों को पटा लिया था. इसीलिए राज्यपाल के कदम पर देवीलाल की नाराजगी ज्यादा थी. देवीवाल अपने कुछ विधायकों को लेकर दिल्ली के एक होटल में चले गए, हालांकि फिर भी विधायक वहां से निकलने में कामयाब रहे.

रामलाल भी कम नहीं थे
दूसरे सबसे ज्यादा विवादित राज्यपाल रामलाल थे. वो हिमाचल प्रदेश में 1977 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने थे. वो 1983 से 1984 के बीच आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे. उनके एक फ़ैसले के बाद वहां की राजनीति में तब भूचाल आ गया था, जब उन्होंने बहुमत हासिल कर चुकी एनटी रामराव की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था. एनटी रामाराव हार्ट सर्जरी के लिए अमरीका गए हुए थे. राज्यपाल ने सरकार के वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया.

अमरीका से लौटने के बाद एनटी रामराव ने राज्यपाल के ख़िलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने विरोध प्रदर्शन कर रहे रामाराव और उनके समर्थकों को गिरफ्तार भी कराया, हालांकि उन्हें तुरंत रिहा भी करना पड़ा लेकिन ये मामला इतना विवादित हुआ कि रामलाल को इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ही इस्तीफा देकर दिल्ली लौटना पड़ा. दिल्ली में जब वो पत्रकारों से मुखातिब हुए तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

ये हैं जीडी तपासे, जो हरियाणा और यूपी के राज्यपाल रहे और देवीलाल से उनकी कहा-सुनी आज भी सियासी गलियारों में सुनाई जाती है


जब बोम्मई फैसला नजीर बन गया
अब वो राज्यपाल जिनके नाम पर बोम्मई फैसला एक नजीर बन गया. इस मामले की धुरी जिस राज्यपाल के चारों ओर घूमी वो पी. वेंकटसुबैया थे.

कर्नाटक में 1988 में जनता पार्टी ने हेगड़े की अगुवाई में दूसरी बार सरकार बनाई. टेलीफोन टेपिंग कांड के बाद जब हेगड़े ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. तब कर्नाटक के राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने विवादित फ़ैसला लेते हुए बोम्मई की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. राज्यपाल ने कहा कि सरकार विधानसभा में बहुमत खो चुकी है.

राज्यपाल के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. फ़ैसला बोम्मई के हक़ में आया और उन्होंने फिर से वहां सरकार बनाई. इस फैसले को आज भी मिसाल की तरह लिया जाता है.

बूटा सिंह के फैसले को कोर्ट ने कहा असंवैधानिक 
इसी मामले में एक बदनाम राज्यपाल बूटा सिंह भी रहे. जिन्होंने 2005 में ये ठान लिया था कि जद यू और बीजेपी की सरकार नहीं  बनने देंगे. कांग्रेस के अनुभवी नेता बूटा सिंह ने जदयू और बीजेपी के 115 एमएलए के समर्थन के दावे के बाद भी बिहार असेंबली भंग कर दी. बाद में इस मामले में उनकी बहुत आलोचना भी हुई.

वर्ष 2005 में राज्यपाल बूटा सिंह ने बगैर जदयू और बीजेपी के दावे पर ध्यान दिये बगैर बिहार विधानसभा भंग कर दी. बाद में कोर्ट ने उस फैसले को असंवैधानिक कहा


उस साल फ़रवरी में हुए चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ था. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ में थी. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. बूटा सिंह ने तब राज्य में लोकतंत्र की रक्षा करने और विधायकों की ख़रीद-फ़रोख्त रोकने की बात कह कर विधानसभा भंग करने का फ़ैसला किया था.

इसके ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने बूटा सिंह के फ़ैसले को असंवैधानिक बताया था.

कैसे कैसे राज्यपाल 
हालांकि इस लिस्ट में वर्ष 2016 के बाद उत्तराखंड में राज्यपाल केकेपॉल द्वारा हरीश रावत सरकार की जगह राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करना. गोवा में मृदुला सिन्हा द्वारा 2017 में सबसे बड़े दल कांग्रेस को नहीं बुलाकर बीजेपी की सरकार बनवा देना. मणिपुर में यही काम राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला के जरिेए किया जाना. वर्ष 2018 में राजखोवा द्वारा सबसे ज्यादा सीटें देने के बाद उनके दावे को अनदेखा कर देने जैसे मामले शामिल हैं.

भंड़ारी ने तीन दिन के लिए जगदंबिका पाल को बनाया था सीएम
वैसे चलते चलते यहां उत्तर प्रदेश में राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी का नाम नहीं लेना ठीक नहीं होगा. वो वाकई अलबेले राज्यपाल थे. रोज गोल्फ खेलने जरूर जाते थे. 1988 में जब तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार के लोकतांत्रिक कांग्रेस और जनता दल ने समर्थन वापस ले लिया तो राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उस सरकार को बर्खास्त कर दिया.

रोमेश भंडारी ने 1997 में यूपी में तुरत-फुरत कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया और जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी. हालांकि पाल केवल तीन ही सीएम रह पाए


नाटकीय घटनाक्रम के बीच जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. कल्याण सिंह ने इस फ़ैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी.

कोर्ट ने राज्यपाल के फ़ैसले को असंवैधानिक करार दिया. जगदंबिका पाल दो दिनों तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने.

पहला मामला 1952 में हुआ था 
वैसे राज्यपाल के पक्षपात का सबसे पहला मामला 1952 में हुआ था और ये खासी चर्चित भी हुआ. तब मद्रास राज्य के गर्वनर श्री प्रकाश थे. उन्होंने सी.राजगोपालाचारी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया, जबकि उन्होंने चुनाव ही नहीं लड़ा.

हालांकि 50 के दशक में राज्यपाल द्वारा सरकार गिराने का सबसे जबरदस्त मामला राज्यपाल बी. रामकृष्ण राव का था. उन्होंने ईएमएस नंबूदरीपाद की चुनी हुई लेफ्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया. क्योंकि राज्य में हालात अराजक हो रहे थे.

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First published: November 27, 2019, 8:53 PM IST
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