जब गांधीजी के रुख ने हॉकी टीम को निराशा से भर दिया

1932 के ओलंपिक में हॉकी टीम के पास लास एंजिल्स जाने का पैसा नहीं था, उन्हें लगा था कि गांधीजी कुछ मदद कर सकेंगे

News18Hindi
Updated: August 29, 2018, 2:31 PM IST
जब गांधीजी के रुख ने हॉकी टीम को निराशा से भर दिया
गांधीजी
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Updated: August 29, 2018, 2:31 PM IST
1932 में जब भारतीय हॉकी टीम दूसरी बार ओलंपिक में हिस्सा लेने जा रही थी तो टीम के सामने आर्थिक समस्या खड़ी हो गई. ये लगा कि अगर गांधीजी टीम के लिए अपील कर दें तो पर्याप्त पैसा जुट जाएगा. इससे टीम लास एंजिल्स जाकर वापस लौट सकेगी. लेकिन जब गांधी ने पलटकर पूछ लिया कि ये हॉकी क्या होती है तो भारतीय हॉकी फेडरेशन के लोग समझ गए कि गांधीजी से मदद मांगने का कोई मतलब नहीं है. वो ज्यादा कुछ बोले खाली हाथ लौट आए. कहना नहीं कि गांधीजी के इस रुख से भारतीय हॉकी टीम बहुत निराश हुई.

1928 में टीम को किसी तरह चंदा जुटाकर एम्सटर्डम के ओलंपिक में हिस्सा लेने भेजा गया था. इस बार फिर वही हाल था. आईएचएफ के पास इतना पैसा ही नहीं था कि टीम को ओलंपिक में भेज सके. लास एंजिल्स बहुत दूर था. इसका खर्च भी इसीलिए पिछली बार की तुलना में दोगुना था.

आईएचएफ को लगा कि उन्हें गांधी जी से मदद मांगनी चाहिए. क्योंकि गांधी जी देश में अकेले ऐसे लोकप्रिय नेता थे, जिनकी एक आवाज पर जनता कुछ भी करने को तैयार रहती थी. उन्हें लगा कि अगर गांधी एक बार जनता से अपील कर देंगे तो बात बन सकती है.

महात्मा गांधी ने हॉकी फेडरेशन के लोगों को ऐसा जवाब दिया कि उन्होंने उनसे मदद की आस छोड़ दी


गांधीजी शिमला में थे
गांधी जी उस समय शिमला में थे. लार्ड इरविन के साथ उनकी बातचीत के दौर चल रहे थे. आईएचएफ ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर चार्ल्स न्यूमन को उनके पास भेजने का फैसला किया. न्यूमन वरिष्ठ पत्रकार थे. वह गांधी-इरविन की वार्ता को कवर भी कर रहे थे. इसी बीच में उन्होंने गांधी के व्यस्त समय में मिलने के लिए कुछ समय मांगा. समय मिल गया.

अब न्यूमन क्या कह सकते थे 
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जब न्यूमन गांधीजी से मिलने गए तो उन्होंने मिलने का कारण बताया. गांधी जी ने पलटकर पूछा,ये हॉकी क्या है? इसके बाद न्यूमन के लिए कहने को कुछ बचा ही नहीं. दूसरे गांधी जी का फोकस भी पूरी तरह से जनता को आंदोलनों के लिए जोडऩा था, लिहाजा वह अलग ट्रैक पर जाना नहीं चाहते थे.

हालांकि बाद के बरसों में ध्यानचंद और हॉकी टीम का नाम पूरे देश की जुबान पर बार बार आता रहा. यहां तक की कांग्रेस के कई बड़े नेता भी भारतीय हॉकी टीम और ध्यानचंद के मुरीद थे लेकिन लगता नहीं कि कभी ध्यानचंद की मुलाकात गांधी जी से हुई हो.

भारतीय हॉकी टीम को 1932 के लास एंजिल्स ओलंपिक में भेजने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से उधार लिया गया


पंजाब नेशनल बैंक से लिया गया उधार
गांधी जी से निराशा मिलने के बाद भारतीय हॉकी संघ ने अपने तरीके से पैसा जुटाने की कोशिश की. कोलकाता के पंजाब नेशनल बैंक से मोटी रकम उधार ली गई.

बाद में आईएचएफ से संबद्ध तमाम इकाइयों ने इस ऋण को उतारने की सामूहिक जिम्मेदारी ली. समस्या यहीं खत्म नहीं हुई. एक तरफ का टिकट तो हो गया लेकिन लौटने का टिकट नहीं हो पाया था. इसके लिए टीम को लौटते हुए यूरोप में कई मैच खेलने पड़े. उससे जो पैसे मिले, उसे जुटाकर उन्होंने लौटने का टिकट लिया.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि गांधीजी फुटबॉल को बहुत पसंद करते थे


फुटबॉल के मुरीद थे गांधीजी
हालांकि माना ये जाता है कि गांधीजी का खेलों से कोई रिश्ता नहीं है लेकिन इतिहास ये बताता है कि वो फुटबाल को पसंद करते थे. जब वो दक्षिण अफ्रीका में थे तो उन लोगों में शामिल थे, जिसने फुटबॉल के लिए आर्थिक मदद भी दी थी.

न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 1896 में गांधीजी ने ट्रांसवाल में इंडियन फुटबॉल एसोसिएशन को आर्थिक मदद दी थी.

योगेंद्र यादव ने पीस एंड कोलेबोरेटिव डेवलपमेंट नेटवर्क की वेबसाइट में लिखा, महात्मा गांधी फुटबाल को बहुत पसंद करते थे. ये बात उनके कई पत्रों, भाषणों और आर्टिकल्स से भी झलकती है.

उन्हें ये लगता था कि खेलों के जरिए पर्याप्त एक्सरसाइज हो सकती है. हालांकि ये भी संदर्भ मिलता है कि 1905 में गांधीजी क्रिकेट खेलते थे. हालांकि इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं
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